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प्राची - दिसंबर 2015- पहचान पत्र व अन्य लघुकथाएँ / देवी नागरानी

पहचान पत्र

देवी नागरानी

चार घंटे बीत जाने पर मां थकी सी घर लौटी. चेहरा कुछ उतरा हुआ था.

पानी का गिलास सामने रखते हुए मैंने पूछा-‘‘क्यों क्या हुआ मां, जिस काम के लिये गई थी, वह हो गया?’’ ‘‘काम तो हो गया पर अजीब बात हो गई!’’ मां ने कुछ उलझन भरे तेवरों में कहा.

‘‘क्यों क्या आखिर, ये तो बताओ ...?

‘‘अरे मैंने हमेशा की तरह + 25 निकालकर उन्हें देते हुए पूछा-‘कितने देने हैं?’ ‘कुछ भी नहीं! अब आपको पहचान पत्र मुफ्त मिलेगा?’ ’’ उसने मेरा पहचान पत्र मुझे थमाते हुए कहा.

‘‘ये तो और अच्छा हुआ, तुमसे कुछ लिया भी नहीं और तुम्हें अपना पहचान पत्र दे दिया है.’’

‘‘अरे अच्छा खाक हुआ, मुफ्त में पहचान पत्र! जैसे मेरी पहचान का कोई मूल्य ही नहीं है. कोई जान लेगा तो क्या सोचेगा फ्री में मिली पहचान है.’’

‘‘अरे मां, तुम भी अब इस उम्र में कौन सा गणित ले बैठी हो. यहां अमेरिका में सत्तर साल के बाद पहचान पत्र नये सिरे से बनाना हो तो वे कुछ भी नहीं लेते.’’

‘‘क्यों नहीं लेते? पहले दो बार तो मैंने + 25-25 दिये हैं.’’

‘‘पर अब नहीं, तुम्हें इस खर्च से मुक्ति दी गई है.’’

‘‘मैं सब समझ रही हूं, मुक्ति नहीं, मुझे चेतावनी दी गई है कि अब तुम इस पहचान पत्र पर जितने साल निकाल सको निकाल लो. हां, एक बात अच्छी है वे बुरी बात भी अच्छे ढंग से कहते हैं.’’

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मोल-तोल

देवी नागरानी

र्मिनल पर स्थगित गाड़ी से उतरते ही, कुलियों का हुजूम और टैक्सी, आटो वालों की दलाली करते लोगों का झुंड आस-पास मंड़राने लगा...मंड़राने नहीं भिनभिनाने लगे.

‘कहां जाना है?’

‘बांद्रा!’

‘चलिये मां जी, आपसे ज्यादा नहीं 350 रुपए ही लूंगा.’

‘टैक्सी है या ऑटो?’

‘आटो!’

‘क्या आपका ऑटो मीटर से नहीं चलता?’

‘मां जी, लगेज-वगेज मिलाकर वही पड़ जाता है.’

‘चलो भैया, मुझे आगे बढ़ने दो.’ कहते हुए मैं अपनी ट्रॉली बैग को जोर-जबरदस्ती धकेलती आगे बढ़ी, और वह मेरे पीछे.

‘चलिए, आपको मां कहा है तो 300 रुपये ले लूंगा.’

‘ये हुई न बेटे जैसी बात! पर मैं दो सौ से ज्यादा नहीं दूंगी.’

‘माताजी न आपकी, न मेरी. 250 रुपए दे देना...दीजिये आपका थैला....!’

‘अब सौतेले बेटे-सी बात की है, चलो...!’ यह कहकर मैं हल्के मन से उसके पीछे चल पड़ी और घर पहुँच कर राहत की सांस ली.

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प्रवचन

देवी नागरानी

हात्मा प्रवचन करते रहे. बंद करने का नाम ही नहीं ले रहे थे. काफी देर के पश्चात बीच-बीच में एक-एक करके बहुत सारी महिलाएं उठ कर चली गईं. एक घंटे पश्चात उन्होंने प्रवचन समाप्त किया तो देखा-फकत एक ही महिला सब्र का दुशाला ओढ़े, बड़े धीरज के साथ बैठी उन्हें ताकती रही. उसे देखते ही महात्मा बोले, ‘‘बहन, बड़ी देर हो गयी है, तुम भी चली जाती!’’

महिला ने आंखें झुकाकर कहा, ‘‘महाराज चली गई होती, पर आप जिस चटाई पर बैठे है, मुझे वह घर लेकर जानी है.’’

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गरीबी-रेखा

देवी नागरानी

‘साब! मैं बहुत गरीब आदमी हूं, आपके पैसे नहीं दे पाऊंगा.’

डॉक्टर ने हाथ में पकड़ी हुई मरीज की नब्ज छोड़ते हुए कहा-‘कितना कमा लेते हो?’

‘महीने में पांच सौ साब! पहले हफ्ते गरीबी रेखा के ऊपर रहता हूं, बाद में नीचे ही नीचे...!’

उसकी बात बीच में ही काटते हुए डॉक्टर ने अगला सवाल किया-‘क्यों 500 सौ कहां खर्च करते हो?’

‘साब कारण एक हो तो बताऊं. मां की दवा का खर्च, बाप को दारू के पैसे देने के पश्चात खुद के लिए यह चिंता का मर्ज लिए गरीबी-रेखा के तले जी लेता हूं.’

‘यह सब किस तरह संभाल लेते हो?’

‘साब, गरीबी-रेखा के नीचे जीने का अपना मजा है, और बहुत सारे फायदे भी हैं.’

डॉक्टर ने हैरानी से सवाली नजरें मरीज पर टिका दीं. ‘साब, घर फ्री, बच्चों की फीस फ्री, दवा फ्री, और हर माह 500 रुपये भी मुफ्त में बैठे बिठाये मिल जाते हैं. इसलिए मैं हमेशा इस रेखा के नीचे रहना पसंद करता हूं.’

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मरने से बच गया

देवी नागरानी

न्यूयार्क से यार्क तक कार से 3-चार घंटे तो लग ही जाते हैं. हैरिसबर्ग एयरपोर्ट से सहेली को 11 बजे लेते हुए जाना था. आठ बीस के निकले हुए थे, ट्रैफिक भी बेहद था. दस चालीस को गाड़ी रोकी. स्टारबक्स से कॉफी खरीदी और अभी पीने को ही थे कि फोन की घंटी बजी. सहेली ने बताया प्लेन लैंड कर चुका है.

‘‘अरे हां, गयारह तो बजे हैं. हम अभी तक यहीं हैं.’’

‘‘कहां हो?’’

‘‘घंटे भर की दूरी पर.’’

‘‘बस एक घंटे का इंतजार करना पड़ेगा.’’

‘‘क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है’’

‘‘समय पर निकले तो थे, पर वक्त पर न पहुंच पाये, हाइवे पर एक जबरदस्त एक्सीडेंट हुआ था और ट्रेफिक जेम है!’’ मैं ड्राइविंग सीट पर बैठी बेटी की बात सुनकर हैरान हुई, कि अपनी नादानियों की कीमत किसी गरीब को बेवजह अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है. जब एयरपोर्ट पहुंचे तो सहेली बाहर आई और मेरी बेटी से गले मिलते हुए कहने लगी.

‘‘अरे यह तो बुरा हुआ.!’’ मेरी ओर रुख करते हुए उसने कहा-‘‘आप तो ठीक हो न आंटी? कैसे हुआ यह एक्सिडेंट!’’ ‘‘कैसे हुआ और क्यों हुआ यह तो नहीं मालूम बेटे, पर वह बिचारा मरने से बच गया.’’

‘‘कौन?’’

‘‘वहीं...’’ और मेरी बेटी पहले मेरी ओर फिर अपनी सहेली की ओर देखकर मुस्कराने लगी.

 

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