रविवार, 17 जनवरी 2016

प्राची - दिसंबर 2015 - मरा हुआ इन्सान / कहानी / कृष्ण खटवानी

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कृष्ण खटवाणी

(जन्मः वरुणशाह, सिन्ध, पाकिस्तान)

उपन्यास- 6, कहानी संग्रह- 9, कविता संग्रह- 2, नाटक- 1, अन्य 4 पुस्तकें प्रकाशित. किसी भी खास विचारधारा एवं लेबल से मुक्त. मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा सामी पुरस्कार (1981) और गौरव पुरस्कार (2006), भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता द्वारा (1991) तथा ‘याद हिक प्यार जी’ उपन्यास पर साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित (2005). रा. सि. बो. वि. परिषद द्वारा साहित्यकार सम्मान (2005).

मरा हुआ इन्सान

कृष्ण खटवानी

सने सोचना छोड़ दिया है. कोई भी घटना उसके मन पर असर पैदा नहीं करती. उसका दिल सूखी हुई रोटी की तरह है. वह देखते हुए भी नहीं देखता, शायद उसकी आंखें छायाचित्र निकालने की शक्ति खो बैठी हैं. वह नाम भी भुला बैठता है-दोस्तों के नाम, रिश्तेदारों के नाम, कभी तो घर के सदस्यों के नाम भी उसे याद नहीं रहते हैं. कभी तो वह अपनी पत्नी की तरफ भी अजीब निगाहों से देखता है कि वह कौन है? उन दोनों का नाता क्या है? उनके बीच में वह नाता कैसे और क्यों हुआ? कभी वह अपने एक कमरे वाले घर की ओर देखता है. उसके तसव्वुर में वे बड़े बंगले घूमते हैं जो चौड़े रास्ते के दोनों तरफ हैं. वह हैरान होता है कि यह एक कमरा उसका घर क्यों हुआ? वह बागवाला बंगला उसका घर क्यों नहीं बना? पर उसके पास अपने इन सवालों का एक भी जवाब नहीं होता. उसकी पत्नी उसे ऐसे प्यार क्यों नहीं करती जैसे किसी जमाने में वह हिन्दी फिल्मों में देखता था. उसकी पत्नी तो क्या, उसकी मां भी अब उसे प्यार नहीं देती. शायद वह उसे अपना बेटा होने के लायक नहीं समझती है, इसीलिये बेटी के पास रहती है. उसका छोटा बेटा उसकी ओर ऐसी अजीब निगाहों से देखता है जैसे वह कोई मशीन है जिसे जंग लग गया है, बेकार है, किसी के भी काम के लायक नहीं है.

वह अपने आप को धिक्कारने लगा. उसका खुद पर से विश्वास उठ गया है. कभी तो उसे शक होता है कि वह जिंदा है या मरा हुआ? उसे सिर्फ यह अहसास है कि उसके पास फैसले करने की शक्ति नहीं है, उसे कोई दूसरा चला रहा है.

‘‘सुन रहे हो, कल दूधवाला बिल के लिये दो बार लौट गया है और अनाज भी फकत एक दिन का बाकी बचा है.’’

वह सुनता है पर समझता नहीं है. वह भावहीन हो गया है और भावहीन के लिये सुनने और न सुनने में कोई फर्क नहीं होता. पर हमेशा तो ऐसा नहीं था वह.उसे तो वे दिन याद ही नहीं हैं. वह भुला बैठा है कि कभी वह जिंदा था, पर उसकी पत्नी कभी-कभी आंगन में बैठकर पड़ोस के बच्चों को खेलते हुए देखकर वे दिन याद कर लेती है. वह ऑफिस से लौटता था तो उसके होंठों पर मुकेश का गीत होता था. जब उसकी मां रसोई घर में या स्नानघर में हुआ करती थी, तो वह जल्दी से पत्नी के गाल को चूम लेता था. इतवार के दिन वह सुबह ही बेटे को मुकेश का राग सिखाता था और शाम को वे बस में चढ़कर पिक्चर देखने जाते थे. तब उसकी मां उसका सदका उतारती थी. पड़ोसी खुश होकर आवाज देते-‘‘आज एक कप चाय पीकर जाओ.’’ जब वह उसके लिये बैट-बॉल लेकर आया तो पड़ोस के सब बच्चे इकट्ठा हो आए और उसकी तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे सोच रहे हों कि काश! वह उनका बाप होता! तब सभी उससे प्यार करते थे, सब उसे इज्जत देते थे.

एक दिन वह शाम को ऑफिस से घर आया तो बेटे के साथ खेलने की बजाय कुछ सोचता रहा.

पत्नी ने चाय उसके हाथ में थमाई और सामने आकर बैठी.

‘‘क्यों आज ऑफिस में कुछ हुआ क्या?’’

वह चौंक उठा फिर पत्नी की ओर देखते हुए कहा-‘‘आज ऑफिस में एक अजीब बात हुई. एक ठेकेदार आया था और मुझे दो हजार देने लगा, जैसे मैं उसका बिल बिना जांच के पास कर दूं.’’

‘‘दो हजार!’’ उसकी पत्नी ने हर्षित होते हुए कहा-‘‘फिर हम रेडियो लेंगे और कपड़ों के लिए अलमारी भी तो चाहिए.’’

सुनकर वह कुछ हैरान हुआ और कहने लगा-‘‘पर मैंने पैसे उसे लौटा दिये यह कहते हुए कि मैं रिश्वत नहीं लेता.’’

पत्नी के चेहरे पर पल-भर के लिये निराशा झलकी, फिर खुश होकर कहा-‘‘तुमने अच्छा ही किया, रिश्वत की कमाई कहां रास आती है! सच की कमाई से धीरे-धीरे घर बन जाएगा.’’ और फिर लफ्जों पर जोर देते हुए कहा-‘‘सच की कमाई का एक रुपया झूठ की कमाई के सौ रुपयों के बराबर है.’’

उसका चेहरा खिल उठा, ‘‘तुमने मुझे हिम्मत दी है. पता है, मेरे इन्कार करने पर उस ठेकेदार ने ऐसे चेहरा बनाया जैसे वह मुझे कच्चा खा जाएगा.’’

उसे यह बात याद न रही और उसकी पत्नी को भी. पर एक दिन अचानक उसके ऑफिस की मेज को सी.आइ.डी. के आदमी घेरकर पूरी तलाशी लेने लगे. उसके आश्चर्य की हद न रही जब मेज की दराज में से दो हजार के नोट निकले. वह कोई भी युक्त जवाब नहीं दे पाया. उसके खिलाफ केस दर्ज किया गया और जांच-पड़ताल के बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

उसके पड़ोसी कहने लगे-‘‘देखा, दिखाता ऐसे था जैसे कुछ जानता ही नहीं.’’

किसी ने कहा-‘‘आजकल कौन ईमानदार है? सारी दुनिया तो चोरों से भरी हुई है.’’

उसकी मां ने कहा, ‘‘मुझे यह पता नहीं था कि तू इतना भोला-भाला है. इस जमाने में कौन रिश्वत नहीं खाता, हाथ में आए पैसे भी गंवाए और संकट में भी पड़ गए.’’

उसकी पत्नी को भी अब उसकी अक्ल पर शक होने लगा और वह खुद भी अपने को संदेहात्मक निगाहों से देखने लगा. खुद पर से उसका विश्वास टूटने लगा. रात को भयानक ख्वाब उसे घेरने लगे. दिन भर वह दूसरों की निगाहों में गलत पड़ने लगा. धीरे-धीरे घर में हर एक बात दुश्वार होने लगी.

वह हर रोज सुबह नौकरी की तलाश में निकलता था और रात को दर्द से सुन्न टांगों के साथ वापस लौटता था. जान-पहचान वाले उसे शकी नजरों से देखते थे और अनजाने जानकारी के बिना नौकरी देने को तैयार न थे. देखकर उसे हैरत हुई कि इन्सान का अपने आप को बेचना कितना मुश्किल है, कोई भी उसे खरीदने के लिये तैयार न था.

एक दिन बाजार में उसने उसी ठेकेदार को कार में बैठे हुए देखा. वह सिगरेट पी रहा था. बगल में उसकी खूबसूरत पत्नी, पर्स में से आईना निकाल कर अपनी लिपस्टिक ठीक कर रही थी. पीछे बैठी आया की गोद में ठेकेदार का बच्चा चॉकलेट खा रहा था. वह कुछ देर तड़पती आंखों से ठेकेदार की तरफ देखता रहा. उसके अंदर बैठे जिंदा इन्सान ने चाहा कि दौड़कर ठेकेदार की गर्दन पकड़ कर कार में से नीचे उतार कर उसके पेट पर दो-तीन लातें मार दे, पर उसके भीतर का मरा हुआ इन्सान जिन्दा इन्सान पर हावी हो गया और वह एक हारे हुए इन्सान की तरह दुम दबाकर एक तरफ चला गया.

कभी-कभी उसके दिल को तसल्ली मिलती थी, जबवह उन सड़कों से गुजरता था जहां उस रास्ते के आवासी रहते थे. वह खुद को दिलासा देता था कि उसके पास फिर भी रात को सोने के लिये कोठरी है. पर यह बिचारे तो दिन रात खुले आसमान के नीचे रहते हैं.

पर एक दिन वह घर का मालिक न रहा. जब घर में खाने के लिये दाना न रहा, उसकी पत्नी, उसका बेटा उसकी तरफ यूं देखने लगे जैसे वह रास्ते का आवारा कुत्ता है जो बिना मतलब उनकी जिंदगी में घुस आया है. ससुराल में से बुलवाया था. मां ने बेटी से कहा-‘‘अब तुम ही इस उजाड़ घर की उम्मीद हो. तुम्हारा पति समर्थ है. उससे कह कर अपने भाई को कहीं नौकरी पर लगवा दो.’’

बेटी ने उंचे स्वर में कहा-‘‘अम्मा, नौकरियां तो कई मिलेंगी, इन को सारा शहर जानता है और कोई भी उन्हें इन्कार नहीं करेगा. पर किसी को भी कहते हुए डर लगता है. कहीं दादा वहां भी गबन न कर दें. फिर तो हम कहीं के न रहेंगे.’’

यह वाक्य उसने भी सुना और उसकी पत्नी ने भी और घर के सदस्यों ने भी. उसकी हालत ऐसी थी कि वह शर्म के मारे दीवारों की ओर भी नहीं देख सका. पर उसकी पत्नी को वह दिन याद आया जब उसकी सास बेटे से कह रही थी-‘‘बेटे, इस तरह घर फूंककर बहन को क्यों दे रहे हो? वादे से एक पैसा भी ज्यादा देना नहीं चाहिए.’’

बेटे ने हंसकर मां से कहा था-‘‘मेरी एक ही तो बहन है अम्मा, इसकी शादी धूमधाम से करने दे. मेरी बाजुओं में दम है, फिर कमा लूंगा.’’

उस रात घर में खाने के लिये कुछ नहीं था और बहन हमदर्दी जताने के लिये मां को अपने घर ले आई.

रात को घर में बत्ती नहीं जली. उसकी पत्नी शाम से रो रही थी. कभी उसका रोना सिसकियों में बदल जाता तो कभी वह अचानक बादलों की तरह विलाप करती-‘‘इससे तो बेहतर होता जो मैं मर जाती. किस मुंह से इस घर में बैठे हो, किसी के सामने मुंह भी नहीं उठा सकते.’’

रोते-रोते उसकी पत्नी वहीं सो गई जहां वह बैठी थी. वह आधी रात तक वहीं दीवार के सहारे बैठा रहा, फिर लेट गया. पर सारी रात आंखें फाड़ कर अंधेरे में देखता रहा. उसमें सोचने की ताकत न रही थी. पर अस्त-व्यस्त डगमगाते कुछ ख्याल उसके दिमाग में चक्कर काटते रहे. उसकी मां उसे छोड़कर गई क्योंकि उसकी बहन के पास पैसा है. क्या उसकी पत्नी भी उसे छोड़कर चली जाती, अगर उसके मैके खुशहाल होते? सभी इन्सान जानवर हैं, जहां खाना देखा वहीं मुड़ गए.

सुबह उसकी आंखें जल रही थीं, पर वह उठा. मुंह धोया, कपड़े बदले और पानी का गिलास पीकर घर से बाहर निकला. उसमें चलने की शक्ति न थी, पर फिर भी चलता रहा. जब वह उस सुंदर बंगले के पास पहुंचा तब सूरज काफी चढ़ आया था. उस वक्त सुबह के दस बजे थे. कुत्तों का भौंकना सुनकर नौकर बाहर निकल आया. लगा जैसे वह उसी वक्त नींद से उठा था. उसे दालान में मेंजी पर बिठाकर अन्दर मालिक को बुलाने गया. लगभग आधे घंटे के बाद ठेकेदार बाहर आया. उसके होेंठो के बीच सिगरेट की बजाय चुरुट था और उसके मुंह से रात पी हुई शराब की गंध आ रही थी. उसका बदन भी कुछ भारी हो गया था.

ठेकेदार के चेहरे पर चौड़ी मुस्कान फैली और अभिमान का जज्बा वहीं हाजिर हुआ. उसे अपनी अहमियत का अहसास हुआ-इन्सान का सबसे प्यारा अहसास.

‘‘तुम दोपहर के बाद मेरे ऑफिस में आना. इस समय मेरे पास सिर्फ चपरासी की जगह खाली है. छः आठ महीने में तुम्हारा ओहदा बदलकर तुम्हें तरक्की दी जाएगी.’’

ठेकेदार ने एक कुत्ते को गोद में उठाया, उसे चूमते हुए भीतर चला गया.

अब वह हर रोज घर में दो जून खाना खाता है और ऑफिस में एक कप चाय पीता है. वह इसलिये जिन्दा है. वह अब वे सब काम करता है जो आम आदमी करते हैं. मिसाल के तौर कभी अनजाने में ठहाका लगा बैठना, औरों पर टीका-टिप्पणी करना, कभी पत्नी के साथ प्यार व लड़ाई वाली फिल्म भी देख आता है. कभी रात में पत्नी के साथ संभोग भी कर लेता है. कभी खुद को अपने बच्चे का बाप भी समझता है.

ठेकेदार ने अपना अंजाम पूरा किया है. चपरासी से उसकी तरक्की करके उसे क्लर्क बनाया है. पर उसकी तनख्वाह वही चपरासी वाली ही है. पर अब उसे किसी के लिये भी शिकायत नहीं है. हां, एक तसल्ली है कि उसकी तरह मरे हुए इन्सान जिंदगी कैसे जीते हैं. चारों तरफ फैले हुए हैं ऐसे लोग, सच में यह दुनिया मरे हुए इन्सानों का ही घर है. बस कुछ उसकी तरह मर गए हैं, कुछ ठेकेदार की तरह.

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