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प्राची - नवंबर 2015 - तमिल कहानी : पुदुमैपित्तन की कहानी - शाप मुक्ति

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शाप मुक्ति

पुदुमैपित्तन

रास्ते में शिला-मूर्ति. थके हारे शरीर में भी वीर्य को भर देने वाला सौंदर्य, जिसे देखकर भ्रम उत्पन्न होता है, मानो एक अपूर्व शिल्पी ने भूलोक में सिर्फ इसीलिए अवतार लेकर, अपने स्वप्न को पत्थर में उतार दिया हो. पर उस प्रतिमा की आंखों में शोक-जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, व्याप्त था. जो देखने वाले को शारीरिक मोह से उबार कर, शोक-संतप्त कर देता. यह शिल्पी का स्वप्न नहीं था. शाप का परिणाम था, वही अहिल्या थी.


उस जंगली रास्ते में मूर्तिवत शोक-सी, शोक की तटस्थ आंखों से देखने वाली प्रकृति की गोद में पड़ी है. सूर्य तपता है, ओस गिरती है, पानी बरसता है, धूल, चिड़िया उस पर बैठती है, उड़ती है. वह संज्ञाहीन तपस्विनी-सी पत्थर के रूप में पड़ी है.


थोड़ी दूर पर दीमक की बांबी है. निष्ठा में लीन, आत्म-चैतन्य से रहित तपस्वी गौतम. प्रकृति उनका भी बिना किसी भेदभाव के संरक्षण करती है.
कुछ दूर इस दम्पति के पारिवारिक जीवन की भांति, इनको आश्रय देने वाली झोपड़ी भी पंचतत्व में लीन हो गयी है. दीवार भी गल चुकी है. केवल अवशेष बचे हैं जो इन दोनों के हृदय के घाव से लगते हैं. दूर गंगा की छलछलाती लहरें, माता गंगा इनके सीमाहीन शोक जानती है, कदाचित.
इसी तरह कई युग बीत गये.


एक दिन...
प्रथम पहर में सूर्य की धूप कुछ तेज अवश्य थी, फिर भी लताओं की हरी छाया, मंद गति से प्रवाहित वायु, दुख भरे संसार में विश्वास देने वाले दर्शन की तरह शीतलता प्रदान कर रही थी.
पुरुष सिंह की भांति विश्वामित्र, अपने कर्म की सफलता पर मुग्ध होता चला आ रहा है. मारीच और सुबाहु का कहीं नाम नहीं. ताड़का नाम की क्रूरता नष्ट हो चुकी है. तपस्या और धार्मिक विचारों में लीन व्यक्तियों को परम संतोष देने का साधन वह बन सका, उसका उसे गर्व है. बार-बार वह पीछे मुड़ता है. दृष्टि में कितना स्नेह है. दो बालक क्रीड़ा करते हुए चले आ रहे हैं. वे और कोई नहीं, राम-लक्ष्मण ही हैं. राक्षसों के नाश का उद्घाटन कर उत्तरदायित्व को नहीं समझते हुए खेल रहे हैं. भागने से धूल उड़ती है. आगे लक्ष्मण भागता है, पीछा करने वाला राम है. धूल की परत शिला पर पड़ती
है...


विश्वामित्र उनके उत्साह का कारण जानने के लिए पीछे मुड़ते हैं. देखते रह जाते हैं.
धूल की परत शिला पर पड़ती है.
युगों पूर्व रुकी हृदय-गति फिर चलने लगती है. जमा हुआ रक्त पुनः प्रवाहित होने लगता है. प्रतिमा      में चेतना फैल जाती है, वह जीवित हो उठी है.
अहिल्या आंखें खोलती है. प्रज्ञा लौट आती है. शाप मुक्ति! शाप मुक्ति!
भगवन! यह कलंकित शरीर पवित्र हुआ. मुझे फिर नया जीवन देने वाला यह दैवी पुरुष कौन है?
उसके चरणों की वन्दना करती है. राम आश्चर्य से ऋषि की ओर देखते हैं. विश्वामित्र समझ गये. यह अहिल्या है. उस दिन इन्द्र के छद्म-वेश से छली कलंकित कर लेने वाली स्त्री, गौतम की पत्नी. राम से सारी कथा कहते हैं. वह जो बांबी हैं, उसमें, जाल में फंसी मकड़ी की तरह गौतम तपस्या में लीन है. देखो, वह स्वयं ही उठ गया है.
तपस्या के बाद आंखें सान चढ़ी तलवार-सी तीखी हो गयी हैं. शरीर का कायाकल्प हो गया है. पत्नी के कुकृत्य से अपने को मुक्त न कर पाने की विवशता में धीरे से चलता हुआ आता है.
फिर वही दुख का जाल? शाप-मुक्ति के बाद जीवन कैसा होगा, इस विषय में तो सोचा ही नहीं था. अब वह विशाल वलय की तरह उसके जीवन के चारों ओर घूम रहा है. उसका मन उद्वेलित हो उठा है. राम की शिक्षा धार्मिक आंखों से देखती है. सब कुछ स्पष्ट हो गया है, पर अनुभव जन्य नहीं, जीवन की उलझनों को सहजता से सुलझाने वाले वशिष्ठ के उपदेश. पर संकीर्णता का नाम नहीं. नयी राह पर साहस के साथ चलने का साहस देने वाली शिक्षा.


विश्व की रीति इतनी विपरीत क्यों है? मन और कारण शक्ति की सावधानी के विपरीत जो घटना घट गयी हो, उसके पात्र को दण्ड? ‘मां’ कहते हुए उसके चरणों में राम गिर गये.
दोनों ऋषि (एक ने साहस को ज्ञान बना लिया है, दूसरे ने स्नेह को धर्म का आधार बनाया है) बालक के विचारों पर मुग्ध होते हैं. कितना सहज, स्नेहसिक्त किन्तु साहसपूर्ण सत्य है.
‘जिसने मन से विश्वासघात नहीं किया हो, उसे स्वीकार करना तुम्हारा धर्म है.’ विश्वामित्र ने धीमे से कहा.
ठंडी हवा में, उसके तर्क की कड़वाहट रस-भेद उत्पन्न कर गयी.
गौतम, उसकी पत्नी और अवशेष, उस स्थान से नहीं हटे. पहले निर्जीव पड़े स्थान पर जीवन आ गया. गति से दिशा देने वाली शक्तियां वहां से हट गयीं. मिथिला, सांयकाल तक पहुंचना है. विवाह मंडप दोनों हाथ फैलाये पुकार रहा है.


गौतम का साहस नहीं हुआ कि निष्कलंक होकर उससे बात कर सके. उस दिन उसे वारांगना कहना, उनकी जिह्वाा को आज जला गया है. क्या बोले? कैसे बोले?
‘क्या चाहिए?’ गौतम ने पूछा. सारा ज्ञान, भावुकता में बहकर एक अर्थहीन वाक्य को उछालने लगा.
‘भूख लगी है.’ अहिल्या ने बालकों-सा उत्तर दिया.
गौतम ने पास के उपवन से फलों को जुटाया. उस दिन, विवाह के प्रथम दिवस का सा स्नेह और कौतूहल उसके व्यवहार में घुल गया. ‘वह विवाह हृदय में राग उत्पन्न होने के बाद भले ही हुआ हो, पर छल में किया गया विवाह ही तो था. पशु की प्रदशिणा से प्राप्त की गयी स्त्री ही तो थी.’ गौतम का मन अपने आपको दोष देने लगा.
अहिल्या की भूख समाप्त हो गयी.


उनके मन में पूर्ण स्नेह व्याप्त हो गया था. पर दोनों दो प्रकार के संघर्षों से गुजर रहे थे.
‘क्या मैं गौतम के योग्य हूं.’ यह अहिल्या की चिन्ता थी.
‘क्या मैं अहिल्या के योग्य हूं.’ यह गौतम की चिन्ता थी.
पंथ के दोनों ओर खिले फूल उन्हें देख हंस दिये.
अहिल्या की इच्छानुसार अयोध्या की बाहरी सीमा में, निर्जन स्थान में सरयू नदी के किनारे एक कुटिया में गौतम
धर्म-साधना में लीन हो गया. अब गौतम को अहिल्या पर पूरा विश्वास था. इन्द्र की गोद में वह लेट भी जाये, उन्हें संदेह नहीं होगा. उनके विचार में वह पवित्र है. उसकी सेवा के बिना उनकी धर्म-साधना नष्ट हो जायेगी-ऐसा उनका विचार था.


अहिल्या ने उसे सीमाहीन स्नेह से बांध लिया था. उसका विचार आते ही उसका हृदय और अंग नयी दुलहन की तरह उत्फुल्ल हो जाते. पर उसके हृदय में चढ़ा पत्थर नहीं हिला. उसकी इच्छा थी कि लोग उसके व्यवहार पर तनिक भी शंका न करें. यही कारण था कि उसकी चाल में सहजता समाप्त हो गयी और कृत्रिमता आ गयी. उसे अपने परिवेश का हर व्यक्ति इन्द्र सा लगता.
अहिल्या के हृदय में भय घर कर गया. उसकी बातें, खिलखिलाहटें समाप्त हो गयीं. किसी भी बात को कहने के पूर्व, हजारों बार उसे मन ही मन परखकर, तब कहती. गौतम की सहज बातों के पीछे भी अर्थ ढूंढ़ लेती.
उसे जीवन ही नरक लगने लगा.
उस दिन मरीचि आये थे. उसके पहले एक दिन दधीचि आये थे. मातंग ऋषि भी वाराणसी जाते हुए गौतम का कुशल क्षेम पूछने आये. उनके हृदय में स्नेह वर्तमान था, पर अहिल्या पश्चाताप के मारे गड़ी जा रही थी. उसका मन भी खिन्न था. अतिथि-सत्कार की औपचारिकता भी उससे निभायी नहीं जा रही थी. साधारण तौर पर देखने वाले की आंखों में देखने से घबराने लगी. कुटिया में छिपने लगी. गौतम का सिद्धांत ही अब बदल गया. धर्म की सीमाएं केवल जान-बूझकर पाप करने वालों के लिए हैं. आत्म-चेतना से रहित कोई पाप किया जाये, तो भले ही उससे सारी मानव जाति को हानि हो, वह पाप नहीं हो सकता. मन की इच्छा और उसकी प्रज्ञा से किया गया कार्य ही कलंकित होता है. अपनी टूटी झोपड़ी में रहकर गौतम ने अपनी चेतना को नयी दिशा दी. उन्हें अहिल्या निष्कलंक लगी. उन्हें लगा वे उसके योग्य नहीं हैं, शाप देने वाले उनके क्रोध ने उन्हें कलंकित कर दिया है.


राम और सीता, अकसर उस दिशा में रथ लेकर आते. यह अवतार पुरुष गौतम के मानस में लक्ष्य पुरुष की भांति लगा. उसकी हंसी और खेल ही धर्म शास्त्र के व्याख्यान से लगे. उससे नवदम्पति का आपसी स्नेह भी कितना गहन है. वह गौतम को अपने पहले जीवन की याद दिला देती.
अहिल्या के मन के भार को बांटने के लिए सीता आ गयी. उसे लगा, मानो सीता की हंसी उसके कलंक को धो देगी. जब भी वह आती अहिल्या के अधरों पर मुस्कुराहट खेल जाती. आंखों में उल्लास छा जाता.
वशिष्ठ की देख-रेख में बढ़ने वाले राज्य लक्ष्य जो हैं. सरयू नदी के किनारे दो पृथक संसार में विचरने वाले जीवों के मध्य पुराना उत्साह लाते रहे.
अहिल्या को कहीं बाहर जाने में अरुचि थी. सीता के सामीप्य ने उसके मन के भार को हल्का कर उसे साहस दिया.
पट्टाभिषेक के उत्सव में भाग लेना स्वीकार कर लिया था. पर महल में भावुकता ने कैसी करवट ली? एक ही सांस में, दशरथ को मृत्यु देकर राम को वनवास भेजकर, भरत को नदी ग्राम में बसाकर दम लिया.
मानवीय सीमाओं से परे, उस शक्ति ने आसुरी वेग से मानो चौपड़ के गोटे फेंककर पासा पलट दिया.
वशिष्ट ने कितनी सावधानी के साथ मानुष्य धर्म के विजय स्वरूप, इस राज्य की स्थापना के लिए प्रयास किया. उनके सारे हिसाब झूठे हो गये. नंदी ग्राम के दीपक में ही उनकी आशा सिमट गयी.
सरयू नदी की कुटिया भी ढह गयी. गौतम की सारी
साधना इस झंझावात में कहीं उड़ गयी. सारा विश्वास समाप्त हो गया. अहिल्या...उसके दुख की सीमा नहीं थी. उसकी समझ में कुछ नहीं आया. राम वन को चले गये. भाई ने भी साथ दिया सीता भी चली गयी. उसके मन में वही पहले वाला अंधकार छा गया. पर मन का बोझ असह्य हो उठा.


प्रातः काल गौतम ने जप-तप समाप्त कर कुटिया में प्रवेश किया.
उनके पैरों को धोने के लिए जल लाती हुई अहिल्या के होठ फड़के, ‘यहां मेरा मन नहीं लगता. मिथिला चले जायें?’
‘चलो, चलते हैं, सदानंद को देखे भी कई दिन हो गये.’ गौतम बाहर निकल गये.
दोनों मिथिला की ओर चले. दोनों के मन में बोझ था. गौतम बाहर निकल गये.
दोनों मिथिला की ओर चले. दोनों के मन में बोझ था. गौतम कुछ रुके.
पीछे आती हुई अहिल्या के हाथ पकड़ लिए, चल पड़े, ‘डरो मत!’ वे बोले.
दोनों मिथला की ओर चल दिये.
प्रातःकाल का समय. गंगा के किनारे दोनों जा रहे हैं. नदी के बीच खड़ा कोई व्यक्ति ऊंचे स्वर में गायत्री का जाप कर रहा है.
जप समाप्त होने तक दोनों दम्पति किनारे प्रतीक्षा करते रहे.
‘सदानंद’ गौतम ने पुकारा.
‘मां, पिताजी!’ प्रफुल्लित मन से सदानंद ने प्रणाम किया. अहिल्या ने मन से उसका आलिंगन किया. बेटा सदानंद कितना पराया हो गया है. दाढ़ी-मूंछ रखवा कर ऋषि बन गया है.
गौतम को बेटे के तेज ने मुग्ध कर दिया.


सदानंद दोनों को अपनी कुटिया में ले गया. विश्राम करने के लिए सुविधाएं कर, जनक के विचार-मंडप के लिए रवाना हुआ.
गौतम भी साथ हो लिए. बेटा स्वयं उन्हें ले जाने को इच्छुक था. रक्त के स्नेह के कारण उसको उनकी थकान की भी चिन्ता थी. युगों तक तपस्या में लीन होकर भी जो शरीर नहीं थका, वह भला आज थकेगा. वे भी पीछे हो लिये. तत्व विचार की नयी दिशा को जानने के लिए पुत्र उत्सुक था.
मिथिला की सड़क से गुजरते हुए उन्हें लगा कि अयोध्या का शोक और मानसिक संताप यहां भी फैल गया है. रुकी हुई सांस मानों हवा में घुल रही है.
लोग जा रहे हैं, लौट रहे हैं, काम में तल्लीन हैं, सारे कार्य निष्काम कर्म की तरह हो रहे हैं, कहीं मोह नहीं, बंधन नहीं, जल-कलश ले जाते हुए हाथी की चाल में तेजी नहीं है,        साथ जाते हुए पुजारी के मुंह में दिव्य कौतूहल नहीं है. दोनों राजा के कोष्ठी-मंडप में पहुंचे. सत्संगी सेना भरी हुई थी. इस भीड़ में शोध कैसे होता होगा, गौतम चकराये. उनका विचार गलत था.
जनक ने दोनों को देखा.
वे भागते हुए आये. मुनि को अर्घ्य दिया और उन्हें अपने पास ले जाकर बिठाया.
जनक के मुख पर शोक छाया था. पर उनकी वाणी में कोई अस्त-व्यस्तता नहीं थी. उनका चित्त स्थिर था.
गौतम हिचके. वे समझ नहीं पाये, क्या बोला जाये.
‘वशिष्ठ ने अपने राज्य में भावुकता की पुलिया नहीं
बांधी.’ जनक ने दाढ़ी खुजाते हुए कहा.
जनक की वाणी मर्म को छू गयी.


‘भावुकता के झंझावात में सत्य उत्पन्न होता है.’ गौतम बोले.
‘दुख भी तो जनमता है, यदि भावनाओं का सही उपयोग नहीं किया जाये. राज्य का निर्माण करना हो तो उसके लिए भी स्थान होना चाहिए, वरना राज्य नहीं रह सकता.’ जनक ने कहा.
‘आपका’ गौतम ने कहा.
‘मैं राज्य नहीं कर रहा हूं, शासन को समझने का प्रयास कर रहा हूं.’ जनक बोला.
दोनों कुछ देर मौन रहे.
‘आपकी धर्म-साधना, किस प्रकार की है.’ जनक ने विनम्रता से पूछा.
‘अभी प्रारंभ नहीं किया, अभी तो समझना है. कई प्रश्न उठते रहते हैं.’ कहते हुए गौतम उठ कर चले गये.
अगले दिन से वे जनक के मंडप को नहीं गये. कई समस्यायें हिमालय की तरह खड़ी हो गयीं. वे एकान्त चाहते रहे. पर एकान्त की खोज में दूसरे दिन जनक ने पूछा, ‘मुनिश्वर कहां हैं?’
‘वे हमारी कुटिया के सामने अशोक वृक्ष के नीचे समय व्यतीत कर रहे हैं.’
‘तपस्या में?’
‘नहीं, चिन्तन में.’
‘लहर शांत नहीं हुई.’ जनक बुदबुदाये.
अहिल्या को स्नान करने में अपार रुचि थी. गंगा के किनारे प्रातः अकेली कलश लेकर चली जाती.
दो-तीन दिन स्वेच्छा से अपने मन की भावनाओं को स्वतंत्रता के साथ फैलाती हुई स्नान करती रही. उसका मन शांत था. पर यह अधिक दिनों तक नहीं चला.
नहाकर सिर झुकाये, चली आ रही थी.


सामने बिछुओं का स्वर सुनाई दिया. कुछ ऋषि पत्नियां, वे भी नहाने जा रही थीं. उसको देखते ही, घूरती हुई दूर हट गयीं, मानो वह कोई शूद्र हो.
‘वही अहिल्या है’ शब्द उसके कान में पड़े. गौतम के शाप से अधिक इन शब्दों ने दुख दिया.
उसका हृदय श्मशान की तरह जलने लगा. चिन्तन भटक गया. ‘प्रभु, शाप-मुक्ति मिलने के बाद भी पाप-मुक्ति नहीं मिल  सकती.’ वह सुबक उठी. यंत्र की तरह उसने गौतम और सदानंद को खिलाया.’ पुत्र भी पराया हो गया, पराये भी शत्रु बन चुके हैं, अब यहां रहकर क्या करना है?’ अहिल्या के मन में यही बात गूंजती रहती. गौतम बीच-बीच में चैतन्य हुए व्यक्ति की तरह एक कौर खाकर, चिन्तन में लीन रहे.
सदानंद इन दोनों के अवश मन के भोर से ऊब कर बोला, ‘अत्रि मुनि जनक को देखने आये थे. अगस्त्य से मिलकर आ रहे हैं. मेरु की ओर जा रहे हैं. राम और सीता ने अगस्त्य के दर्शन किए हैं. उन दोनों को अगस्त्य ने पंचवटी में रहने का उपदेश दिया है. वे कहां रह रहे हैं?’
‘हम भी तीर्थ-यात्रा कर लें.’ अहिल्या ने धीमे से पूछा.
‘चलें.’ हाथ झटककर गौतम खड़े हो गये.
‘अभी, इसी समय?’ सदानंद ने पूछा.
‘समय का कैसा विचार!’ कोने में रखे हुए कमंडल को उठाकर बाहर निकल गये.
अहिल्या ने पीछा किया.
सदानंद का मन तपने लगा.
संध्या का समय. रेखायें लीन हो गयीं. दो व्यक्ति सरयू के किनारे अयोध्या की ओर आ रहे थे. चौदह वर्ष काल की गर्त में समा गये थे. सारे मुनिवरों के दर्शन वे कर चुके थे, सारे क्षेत्रों का दर्शन उन्होंने कर लिया था. पर मन को शान्ति नहीं मिली.
मूर्ख की बुद्धि के परे, शंकर के चिन्तन की तरह, लंगड़ों के चरणों के सामर्थ्य से परे कैलास पर्वत के दर्शन उन्होंने किये.
अपने दुखों के बोझ स्वरूप अविश्वास को रूप देने वाले स्थान को पार किया.
अपने चित्त की भांति जलते-ज्वालामुखी की प्रदक्षिणा की.
अपने जीवन के ऊंच-नीच को पार करते रहे.
‘कुछ दिनों में राम लौट आयेगा, अब जीवन का सूर्योदय होगा.’ उनके हृदय में आशा थी.
वे पुनः उसी स्थान पर पहुंचे जहां चौदह वर्ष पूर्व उनकी कुटिया बह गयी थी.
रातों-रात गौतम ने उसे बनाया. प्रातः होते-होते काम समाप्त हो गया.
दोनों सरयू में स्नान करने निकले.


अहिल्या पति की सेवा करती रही. दोनों का हृदय राम के स्वागत के लिए तैयार था. पर काल की सीमा मन से कभी बांधी जा सकती है?
एक दिन अहिल्या प्रातः स्नान के लिए गयी थीं. उसके पहले कोई विधवा स्नान कर लौट रही थी. अहिल्या उसे पहचान नहीं पायीं. पर सामने वाली स्त्री उसे पहचान गयी. लगभग भागती हुई अहिल्या के चरणों में आकर गिर गयी.
देवी कैकेयी : अकेली, परिजन परिवार से रहित तापसी?
कलश को उतार कर उसे दोनों हाथों से उठा लिया. कैकेयी के कृत्य को वह समझ नहीं पायी.
‘धर्मांधता में भरत ने मुझे अपने हृदय में स्थान देना अस्वीकार कर दिया है.’ कैकेयी ने कहा.
स्वर में क्रोध नहीं, कठोरता नहीं. कैकेयी के विषय में कैसी कल्पना की थी, वास्तविकता कैसी है. आधार के लिए तरसती कैकेयी के दुख को अहिल्या ने अनुभव किया. दोनों हाथ थामें सरयू की ओर चल दीं.
‘भरत के धर्म वैराग्य का कारण कौन है?’
अहिन्या ने पूछा. उसके होंठों के कोने में सहानुभूतिपूर्ण मुस्कान खेल गयी.
‘बच्चे के हाथ की अग्नि यदि नगर को जला दे तो बच्चे को मार डालना उचित होगा?’ कैकेयी ने पूछा.
अहिल्या का विचार था कि बच्चे और अग्नि के मध्य सीमा होनी चाहिए. ‘जलना तो जलना ही होता है न?’ अहिल्या ने पूछा.
‘जली हुई जगह को स्वच्छ किये बिना उसे समेटकर उसके पास बैठना कहां तक उचित है?’ कैकेयी का प्रश्न था.
‘राख समेटने वाला तो दो-तीन दिन में आ ही जायेगा.’ अहिल्या ने कहा.


‘हां,’ कैकेयी ने कहा. उसके स्वर में परम तृप्ति थी. राम की प्रतीक्षा भरत नहीं कैकेयी कर रही है. दूसरे दिन जब वह अहिल्या से मिली, उसका मुंह सूना हो गया था, मन चिन्तित था.
‘गुप्तचरों को चारों दिशाओं में भेजकर देख लिया है. राम का कहीं पता नहीं लगा. चालीस घंटे के भीतर कैसे आ जायेंगे. भरत प्रायोषवेश करेगा. अग्नि-कुंड के निर्माण की तैयारियां कर रहा है.’
‘भरत का अग्नि-प्रवेश, राज्य मोह के आरोप का प्रायश्चित है.’ कैकेयी की धारणा थी.
कुछ रुककर वह बोली, ‘मैं भी अग्नि-प्रवेश कर जाऊंगी. पर एकान्त में.’ उसका मन कठोर हो गया था.
चौदह वर्ष के बाद वही भावुकता का झंझावात. अयोध्या का शाप अभी पूर्ण नहीं हुआ?
अहिल्या का मन डोलने लगा. उसे संदेह होने लगा कि यह उसके पैरों के पाप की छाया है.
‘वशिष्ठ क्या उसे नहीं रोक सकते!’ अहिल्या ने पूछा.
‘भरत धर्म को सुनता है, वशिष्ठ की बात नहीं मानेगा.’ कैकेयी बोली.
‘मानव के अधीन जो धर्म नहीं है, यह मानव-जाति का शत्रु है.’ अहिल्या बिफर पड़ी.
शायद भरत उसके पति की बात मान ले-यह उसको आशा थी. कहीं पुनः अयोध्या में शोक की छाया न पड़ जाये-यह उसका भय है.
गौतम मान गये. पर उनकी बातों का असर नहीं हुआ.
भरत को समा लेने की इच्छा अग्नि की नहीं थी.


हनुमान आये. अग्नि बुझ गयी. दिशाओं का शोक हर्ष में परिवर्तित हो गया. धर्म नृत्य करने लगा.
वशिष्ठ के होंठों में हंसी खेल गयी. उन्हें लगा चौदह वर्ष पूर्व का उनका स्वप्न साकार हो जायेगा.
गौतम उस हर्ष को देखकर लौट गये.
अहिल्या यह सोचकर प्रसन्न होती रही कि राम और सीता उसे देखने आयेंगे.
स्वागत उत्सव की समाप्ति के बाद दोनों परिवार को छोड़ उन्हें देखने आये.
रथ से उतरते राम के माथे पर अनुभव ने रेखायें खींच दी थीं. सीता का लावण्य अनुभव के कारण खिल गया था. दोनों के हास्य ने मोक्ष-सा आनन्द प्रदान किया.
राम को लेकर गौतम बाहर टहलने निकल गये.
अपने गर्भ से जनमी पुत्री के वात्सल्य के साथ अहिल्या उसे भीतर ले गयी. दोनों के चेहरों में मुस्कान थी.
रावण द्वारा हरण, दुख, फिर मुक्ति-सीता ने सारी घटनाएं सुनाईं. राम के पास लौट आने के बाद उसे अब दुःख कहां?
अग्नि प्रवेश की बात कही. अहिल्या तड़प उठी.
‘उन्होंने कहा था क्या? तूने क्यों किया?’
‘उन्होंने आदेश दिया, मैंने प्रवेश किया.’ सीता ने शान्त होकर उत्तर दिया.
‘उसने आदेश दिया?’ अहिल्या चीख उठी. उनके मानस पटल में ‘कण्णगी’ का उन्माद छा गया.
अहिल्या के लिए एक न्याय. अपने लिए दूसरा न्याय?
धोखा. यानी गौतम का शाप, न्यायसंगत था, दोनों मौन रहीं.
‘संसार को प्रमाण भी तो देना था.’ सीता धीमे से हंसी.
‘मन को स्वीकार हो, पर्याप्त है? सत्य सारे विश्व को कैसे प्रमाणित किया जा सकता है?’ अहिल्या ने कहा. शब्द सूख गये.
‘प्रमाणित कर देने पर, वह सत्य हो जायेगा? यदि उसे मन स्वीकार न करे तब भी? रहने दो, लेकिन संसार क्या है?’ अहिल्या ने पूछा.
बाहर आहट हुई. वे लोग लौट आये.
सीता प्रासाद में लौटने के लिए बाहर आयी. अहिल्या नहीं आयी.
राम का मन संतप्त हो गया, पैरों की धूल उन्हें जलती-सी लगी.
रथ चल पड़ा. पहियों का शब्द लीन हो गया.
गौतम विचार में लीन रहे. आधार-हीन त्रिशंकुवत् उनका दिल डोलने लगा.
उनके मन में एक नया विचार कौंध गया. मन के बोझ को हटाकर, पुराने बंधन को पुनः जीवित करने के लिए एक पुत्र क्यों नहीं प्राप्त किया जाये? उसके नन्हें हाथ, मन के बोझ को हल्का कर देंगे.
अन्दर गये.


अहिल्या की प्रज्ञा समाप्त हो गयी थी. फिर से इन्द्र का नाटक. भुला देने वाला वह नाटक, उसके मानस पटल पर चल रहा था.
गौतम ने उसका आलिंगन किया.
गौतम, उसे छद्मवेश में इन्द्र ही लगे. उसका मन कठोर हो गया. ओह कितनी शान्ति!
गौतम की बाहुपाश में एक शिला.
अहिल्या फिर से शिला बन गयी.
मन का बोझ हल्का हो गया.
कैलास पर्वत की ओर एक मानव आकृति बर्फीले रास्ते पर तेजी से गुजरती जा रही थी. उसके पैरों में पूर्ण विराग छा गया था.
वही गौतम हैं...वह सन्यासी हो गये हैं.

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