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प्राची - नवंबर 2015 : प्रभात दुबे की लघुकथा - इतिहास

इतिहास
प्रभात दुबे

कमरे में मां-बाप और बेटा-बहू कुल चार लोग ही थे. मां का हृदय आशंका से कांप रहा था. तभी बोझिल वातावरण की लम्बी खामोशी को तोड़ते हुए इंजीनियर बेटे ने अपना अन्तिम फैसला सुनाते हुए कहा- ‘‘पिताजी अब हम लोग इस घर में रहना नहीं चाहते. हम अभी और इसी वक्त यह घर छोड़कर जा रहे है.’’
पिता ने दुखी स्वर में कहा- ‘‘ठीक है बेटे, जैसा तुम उचित समझो.’’
बेटे-बहू ने दोनों के पैर छुए और अपने-अपने सूटकेस उठा कर तेजी से घर के बाहर चले गये. उनके जाते ही बेटे की मां ने रोते हुए अपने पति से कहा- ‘‘कैसे निष्ठुर बाप है आप? आपने उन्हें न तो जाते हुए रोका, न यह पूछा कि कहां जा रहे हो? अब कभी वापिस लौट कर आओगे भी या नहीं?’’
पिता ने डबडबाई हुई आंखों से अपनी पत्नी को देखा. उसके कंधे पर अपना थरथराता हुआ सांत्वना से भरा हुआ हाथ रख कर भर्राई हुई आवाज में कहा- ‘‘सावित्री, यदि हम उन्हें रोकते तो क्या वो रुक जाते, हरगिज नहीं; क्योंकि बरसों पहले जब मैंने तुम्हारे साथ, अपने मां-बाप का घर छोड़ते समय, अम्मा-बाबूजी से कहा था कि हम यह घर छोड़ कर जा रहे हैं तो मेरे बाबूजी ने हमसे क्या कहा था, तुम्हें याद है?’’
पत्नी ने सुबकते हुए पूछा-‘‘क्या कहा था?’’
‘‘यही कहा था कि बेटे याद रखना, तुम्हारे जीवन में भी एक दिन ऐसा आयेगा-जब तुम्हारा बेटा इसी तरह तुम्हारा घर छोड़ कर जायेगा, क्योंकि मुझे मालूम है कि इतिहास कभी न कभी अपने आपको दोहराता जरूर है. बस यही सोच कर मैंने उनसे कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं देख रहा था कि आज हमारे सामने हमारा इतिहास अपने आपको दोहरा रहा
था.’                               

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