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प्राची - नवंबर 2015 - स्मृति शेष : भावना शुक्ल का संस्मरण - मेरी ममतामयी मां

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मेरी ममतामयी मां

डॉ. भावना शुक्ल

ध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर नगरी की प्रतिदिन प्रसिद्ध शिक्षा सेवी, कथा लेखिका, कवयित्री तथा संगठन कर्मी स्व. डॉ. गायत्री तिवारी मेरी पूज्या माता थीं.

वे मेरी मां थीं, मुझे प्रिय थीं, यह सहज स्वाभाविक है. विशेष यह कि वे सर्वप्रिय थीं, अजातशत्रु थीं. जो भी उनसे एक बार मिलता, वह उनके अपनत्व से उनका परिवारजन बन जाता.

27 दिसंबर 1947 को पं. रामनाथ तिवारी श्रीमती बेनीबाई तिवारी की पुत्री के रूप में जन्मी, राधा कन्या पाठशाला, हितकारिणी हाई स्कूल, दीक्षित पुरा; होमसाइंस कालेज और हितकारिणी बी.एड. कॉलेज में शिक्षित दीक्षित मां गायत्री ने हिन्दी और समाजशास्त्र में एम.ए., बी.एड. और साहित्य रत्न की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं. विद्यावाचस्पति और विद्यासागर की उपाधियां अर्जित कीं.

29 जून 1965 को उनका विवाह तेजस्वी कवि लेखक सम्पादक श्री राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ से हुआ, जो डॉ. राजकुमार सुमित्र के रूप में चर्चित प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित हैं.

मां ने शिक्षकीय कार्य से जीवनारंभ किया. पीढियों को शिक्षित किया और उच्चश्रेणी शिक्षिका के रूप में सेवा निवृत्त हुईं.

मेरे पिता डॉ. सुमित्र की सतत् प्रेरणा से मां ने अपने साहित्यिक स्वरूप का निखारा. उनका कहानी संग्रह ‘कोबरा’ और काव्य संग्रह ‘जागती रहे नदी’ तथा बाल कविता संग्रह प्रकाशित हुए.

मां को उनकी कहानी, ‘कोबरा’ पर मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा 21 हजार का पुरस्कार प्राप्त हुआ. जबलपुर की संस्था कादम्बरी, हिन्दी लेखिका संघ भोपाल, भाषा सम्मेलन, पटियाला, बाल साहित्य केन्द्र अकादमी, मारीशस तथा पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, शिलांग, तुलसी अकादमी भोपाल ने उनकी सेवाओं को सम्मानित किया.

वे जबलपुर की प्रसिद्ध संस्था त्रिवेणी परिषद की वर्षों तक सक्रिय सचिव रहीं. पाथेय संस्था, पाथेय प्रकाशन और पाथेय साहित्य कला अकादमी की संस्थापना में उनका प्रमुख योग था.

डॉ. गायत्री तिवारी ने अभिनव नारी निकुंज, शिवम् नारी निकुंज तथा शब्द गरिमा का सम्पादन भी किया.

वे आर्थस गिल्ड ऑफ इंडिया, हिन्दी साहित्य सम्मेलन,

मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, मध्यप्रदेश लेखक संघ, हिन्दी लेखिका संघ तथा मासिक बाल प्रहरी की आजीवन सदस्य थीं. जबलपुर नगर की संस्थाओं- मित्रसंघ, हिन्दी मंच भारती, वर्तिका, गुंजनकला सदन, परिणीता, जागरण साहित्य समिति महिला परिषद से उनका गहरा जुड़ाव था.

हमारा घर, नवनीत, समाज कल्याण, शब्द सरोकार, प्राची, कर्मनिष्ठा, स्थानीय समाचारपत्रों के साथ ही अमेरिका और मारीशस की हिन्दी पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती थीं. आकाशवाणी से निरंतर उनकी कहानियों का प्रसारण होता रहा.

गायत्री जी मेरी मां थी. उनका प्यार उनकी ममता के साथ-साथ अच्छे संस्कार और उनका संरक्षण मिला, यह मेरा सौभाग्य था.

मेरे पिता डॉ. सुमित्र का कहना है कि शास्त्रों में नारी के जितने गुण बताये गये हैं, वे सब गायत्री में थे. वे सुगृहणी, समर्पित पत्नी, ममतामयी मां, कुशल शिक्षिका और उत्साही समाज सेवी थीं. उनमें परम्पर के प्रति प्रेम था तथापि वे रूढ़ियों के विरुद्ध थीं. उनका मेरे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था. उन्होंने मुझे फकीर से बादशाह बनाया. उन्हें खोकर लगता है कि मैं कुबेर से कंगाल हो गयी हूं.

8 सितम्बर 2015 को चिर विदा लेने वाली प्यारी मां को सजल श्रद्धांजलि!

संपर्कः डब्लू.जेड./21, हरिसिंह पार्क,

मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-110056,

मो. 9278720311

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