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प्राची - नवम्बर 2015 - सत्यपाल निश्चिन्त की कहानी : विजय लक्ष्मी

विजय लक्ष्मी

सत्यपाल निश्चिन्त

भी-कभी भाग्य भी अजीब खेल खेलता है. ठाकुर विक्रम सिंह बैंक में सहायक मैनेजर के पद पर आसीन हैं. 4 साल पहले उनका विवाह उर्मिला से हुआ है. लेकिन भाग्य की विडम्बना है कि अभी तक उन्हें सन्तान की प्राप्ति नहीं हुई है. उन्होंने सभी जांच/टेस्ट करा लिए लेकिन सब कुछ नार्मल है. दोनों में कोई नहीं है. फिर भी अभी तक संतान का मुख नहीं देखा है.

मन अत्यन्त दुखी है. सब कुछ होते हुए भी संतान के लिए दोनों ही लालायित हैं. दोनों ही सुबह-सुबह 1 घंटे के लिए मार्निंग वाक पर निकल जाते हैं. इससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता ही है. साथ-साथ घूमने से विचारों का आदान-प्रदान भी हो जाता है, क्योंकि वर्तमान युग में मानव इतना व्यस्त हो गया है कि उसे किसी से बात करने का अथवा सुख-दुख बांटने का समय ही नहीं मिलता. सुबह घर से 9 बजे निकलते हैं, सायं को 9 बजे ही घर पहुंच पाते हैं. मैडम उर्मिला जी कन्या महाविद्यालय में सहायक अध्यापिका हैं. वह सुबह 7-7.30 बजे ही घर से निकल जाती हैं. खाना आदि बनाने व अन्य काम देखने के अलावा घर की देख भाल के लिए उन्होंने एक विधवा औरत को नौकरानी के तौर पर रख लिया है. उम्र 40-45 साल है. धन की अथवा किसी वस्तु की कमी नहीं है. हां कमी है तो संतान की.

आज इतवार का दिन है. सुबह-सुबह दोनों घूमने निकले तो सड़क किनारे झाड़ियों से किसी शिशु की आवाज सुनाई दी. दोनों ने जाकर देखा तो एक नवजात कन्या कपड़ों में लिपटी हुई विलाप कर रही थी. ‘‘उर्मिला जी, देखो भगवान देते हैं तो छप्पड़ फाड़ के देत ेहैं. संतान नहीं है यही सोच कर ईश्वर ने इस बालिका को लक्ष्मी के रूप में हमारे लिए भेज दिया है. मैं ठीक कह रहा हूं, न उर्मिला?’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन पता नहीं यह किस कुल्टा कुलक्षिणी का पाप है. न जात का पता, न बिरादरी का. हम इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं?’’ उर्मिला जी बुरा सा मुंह बनाकर कह रही थीं.

‘‘उर्मिला, तुम भी कमाल करती हो. पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो, शिक्षित हो और सबसे बड़ी बात यह है कि तुम सभी को शिक्षा देती हो, समाज सेवा करती हो. फिर ऐसी बात तुम्हारे मन में कैसे आ गई. नवजात शिशु तो ईश्वर का ही रूप होता है. फिर यह तो कन्या है. लक्ष्मी का रूप है.’’

लक्ष्मी बोली-‘‘ठीक है, यदि आप की इच्छा है तो इसे घर ले चलते हैं, लेकिन पालन पोषण में बड़ी कठिनाई होगी.’’

‘‘नहीं, कोई कठिनाई नहीं होगी. इसके लिए अलग से एक आया का प्रबंध कर देते हैं. वह इसकी पूरी देख भाल करती रहेगी और हां एक बात और...11 वें दिन इसका

धूमधाम से नामकरण संस्कार भी करायेंगे. इसी से इसका शुद्धीकरण भी हो जायेगा.’’

‘‘ठीक है जैसा आप का विचार है. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.’’

दोनों उस कन्या को लेकर घर पहुंचे तथा आस पड़ोस में सभी को इसकी सूचना भी दे दी. उसी दिन आया का भी

प्रबंध कर दिया तथा डॉ. को दिखाकर उसके स्वास्थ्य के बारे में पूर्ण जानकारी ले ली. 11 वें दिन उसका नामकरण कर के नाम रखा लक्ष्मी.

देखिये ईश्वर की लीला...लक्ष्मी के घर में आते ही एक साल के बाद उर्मिला ने एक स्वस्थ्य पुत्र को जन्म दिया. पति-पत्नी लक्ष्मी को सबसे ज्यादा सौभाग्यशाली मानने लगे और उसका विशेष ध्यान रखने लगे. साथ ही उसे विशेष स्नेह भी देते. धीरे-धीरे लक्ष्मी भी बड़ी होने लगी. वह कुशाग्रबुद्धि की भी थी. तीसरा वर्ष पूरा होते ही उसकी शिक्षा का प्रबन्ध कर दिया गया. इधर उर्मिला जी ने भी तीन साल में ही एक और पुत्र को जन्म दे दिया. अब तो घर में प्रसन्नता ही प्रसन्नता थी. विक्रम सिंह का भी प्रमोशन हो गया. वह मैनेजर के पद पर आसीन हो गये.

इधर उर्मिला ने भी बच्चों की परवरिश को ध्यान में रखते हुए विद्यालय से अपनी नौकरी से त्याग देकर घर को स्वयं संभालने का बीणा उठा लिया. किसी ने ठीक ही कहा कि लड़की जाति बड़ी तेजी से बढ़ती है. लक्ष्मी भी शुल्क पक्ष के चन्द्रमा की तरह बड़ी तेजी से बढ़ने लगी. उसका स्वास्थ्य व सौन्दर्य निखरने लगा. उर्मिला मेम साहब स्वयं घर पर रहकर संतान की परवरिश तो करती ही हैं, साथ ही उन्हें भारतीय संस्कृति अनुशासन व चरित्र की शिक्षा भी स्वयं देती है. जिसका असर लक्ष्मी पर अधिक पड़ता है. लड़के तो वैसे ही माता-पिता के अनुशासन पर कम ही ध्यान देते हैं और खेल-कूद में मस्त रहते हैं. दसवीं कक्षा लक्ष्मी ने बड़ी मेहनत और लगन से पूरी कर ली है. वह प्रथम श्रेणी में पास हुई है.

उसने पूरे विद्यालय में भी प्रथम आकर माता-पिता का सिर ऊंचा कर दिया. प्रसन्न होकर लक्ष्मी को विक्रम सिंह अपने पास बुलाकर स्नेह से पूछते हैं-‘‘लक्ष्मी तुमने जिस परिश्रम व लगन से हम सभी का नाम रोशन किया है, उससे मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया है. अब आगे की शिक्षा कठिनतम ही होती जायेगी. तू अपनी इच्छा बता कि किस विषय की शिक्षा ग्रहण करना चाहती है जिससे तेरा भविष्य उज्जवल हो.’’

लक्ष्मी कहने लगी, ‘‘पिता जी आप बैंक में सेवा कर रहे हैं. मैं भी आप की तरह इसी क्षेत्र में जाकर समाज सेवा करना चाहती हूं, अतः कामर्स विषय लेकर आगे अध्ययन करने की इच्छा है.’’

‘‘ठीक है बेटी, जैसी तेरी इच्छा है, वही ठीक है.’’

समय गुजरता गया और लक्ष्मी लगन व कठिन परिश्रम के साथ अध्ययन करती रही और देखते ही देखते उसने एम.कॉम. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. इस बार भी उसने अपने महाविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया.

अब उसकी उम्र भी 21 वर्ष पूरी हो गई है. शरीर तो उसका सुगठित है ही, सौन्दर्य भी ईश्वर ने उसे अच्छा ही दिया. देखने में वह अति सुन्दर लगती है. अब उर्मिला को उसके विवाह की भी चिन्ता होने लगी.

एक दिन वह पति से बोली-‘‘अपनी लक्ष्मी अब विवाह योग्य हो गयी है. उसके लिए कोई अच्छा सा वर ढूढ़ो और हां वर भी ऐसा ढूंढ़ना जो ज्यादा अमीर न हो, न ज्यादा लालची हो और दहेज लेने वाला न हो तो ज्यादा अच्छा है. दहेज लोभी के घर हमारी बिटिया सुखी नहीं रह पायेगी. यह तो आप जानते ही हो कि जो व्यक्ति ईमानदारी से अपनी कमाई से घर गृहस्थी चलाता है, उस के पास दहेज देने की क्षमता नहीं होती. आज-कल साधारण शादी में ही 5-6 लाख व्यय होना तो आम बात है. उसका ध्यान अवश्य रखना.’’

विक्रम का समाज में अच्छा मान-सम्मान भी. उन्होंने अपनी बिटिया के लिए वर खोजना आरम्भ कर दिया. शीघ्र ही उन्हें एक एम.ए. पास लड़का मिल गया. वह एक विद्यालय में शिक्षक था. लड़का बोलचाल में सभ्य, देखने में स्वस्थ व सुन्दर था. बात आगे चलाई गई और सभी मिलने-जुलने वालों से राय मशवरा करके शादी भी तय कर दी.

विक्रम सिंह ने पूरे प्रयास से घर-परिवार की सुविधा हेतु शादी का सभी सामान इकट्ठा कर लिया, जिसमें छः लाख का बजट तैयार हो गया. उन्होंने एक लाख रुपया अलग से रख लिया, ताकि आवश्यक पड़ने पर काम आ सके.

उर्मिला भी शादी का प्रबंध देखकर प्रसन्न थीं.

नियत तिथि पर शादी के लिये उनके द्वार पर बारात आ गई. आस-पड़ोस के सभी संबंधी तथा बाराती भी विक्रम सिंह जी के शादी के प्रबन्ध से प्रसन्न थे. लेकिन अचानक एक घटना ऐसी घट गई जिसका किसी को भी ज्ञान नहीं था. जैसे ही फेरों का समय आया वर के पिता ने एक अड़चन डाल दी. बोले-

‘‘विक्रम सिंह जी, सच को तुमने छुपाये रखा. हमें आज पता चला है कि लड़की तुम्हारी सगी बेटी नहीं है. तुम उसे सड़क से झाड़ियों से उठाकर लाये थे. इसके मां-बाप और जाति-बिरादरी का कुछ अता-पता नहीं है. पता नहीं वह किसका पाप है.’’

विक्रम सिंह सन्न् से खड़े रह गये. उन्हें ऐसी अनहोनी की आशंका भी नहीं थी. वर के पिता आगे कह रहे थे-

‘‘और अब बात काफी बढ़ गई है. हमारा खर्च भी काफी बढ़ गया है. अतः इस बात को छुपाने के लिए इसी समय आपको दो लाख रुपये देने होंगे. तभी मेरा बेटा फेरों पर बैठेगा, अन्यथा हम अभी बारात वापस ले जा रहे हैं.’’

विक्रम सिंह बोले-‘‘लक्ष्मी मेरी ही बेटी है. आपसे किसने कह दिया वह पराई है. और मैं इस अवस्था में नहीं हूं कि आपको दो लाख रुपये अभी लाकर दे सकूं. देखिए, यह इज्जत का सवाल है. अगर बारात वापस चली गयी तो बदनामी होगी ही, मेरी बिटिया के दिल पर इसका इतना बुरा असर पड़ेगा कि उसका जीना दूभर हो जायेगा. सो मुझे क्षमा करें और शादी की रस्म पूरी करें.’’

दूल्हे का बाप बोला-‘‘बिना दो लाख के शादी नहीं हो सकती है. हम बारात लेकर वापस जा रहे हैं.’’

तभी लक्ष्मी बोली-‘‘पिता जी रुकिये, चिन्ता मत करिए. मुझे अनुमान था कि ऐसा समय भी आ सकता है. सो मैंने अपनी सहेली को यह समस्या बताई थी. उसके पिता काफी

धनी हैं. उन्हें आवश्यक पड़ने पर तुरन्त दो लाख का प्रबन्ध करने के लिए कह रखा है. मैं अन्दर जाकर सहेली को फोन कर देती हूं. कुछ ही देर में वह पूरा प्रबन्ध करके यहां आ जायेगी.’’

लक्ष्मी की बात सभी ने सुनी. वर का पिता बोला, ‘‘विक्रम जी, आपसे ज्यादा तो आपकी बेटी समझदार है. बेटी जा पैसे का जल्द प्रबन्ध कर दे. हम प्रतीक्षा करते हैं.’’

लक्ष्मी घर के अन्दर चली जाती है. अन्दर जाकर उसने पुलिस अधीक्षक को फोन किया. सारी बात बता कर समस्या से अवगत कराया. पुलिस अधीक्षक भी एक महिला थीं. उन्होंने आश्वासन दिया कि इस समस्या का समाधान हो जायेगा.

लक्ष्मी बाहर आकर बोली कि पैसे का इंतजाम हो गया है. वर का पिता बोला, ‘‘शाबास! मेरी लक्ष्मी तू बहुत ही समझदार है.’’

थोड़ी देर में पुलिस अधीक्षक प्रोमीला देवी पुलिस बल के साथ आ गयीं. वर और उसके पिता को दहेज मांगने के

अपराध में कैद करके कहा, ‘‘आप लोगों को इस अपराध के लिए कड़ी से कड़ी सजा और आर्थिक दण्ड भरना पड़ेगा.’’

बाकी बारातियों को अपने-अपने घर जाने का आदेश दे दिया गया.

तभी विक्रम सिंह जी बोले, ‘‘दोषियों को तो सजा मिल ही जाएगी, लेकिन मुझे जो आर्थिक व सामाजिक हानि व पीड़ा हुई है, उसका भी तो कोई समाधान होना चाहिए.’’

सभी लोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे. तभी बारातियों में एक ह्रष्ट-पुष्ट जवान सामने आकर कहने लगा-‘‘इस समस्या का समाधान है. यदि आप सभी की अनुमति हो तो मैं विनय करूं.’’

अधीक्षक प्रेमिला जी बोली-‘‘हां हां कहिए, समस्या का समाधान क्या है?’’

‘‘मेरा नाम अजय है. मैं भी ठाकुर विक्रम सिंह की जाति का ठाकुर हूं. भारतीय सेना में कैप्टन के पद पर सेवारत हूं. मैं इस बहादुर बाला से विवाह करने का इच्छुक हूं. यदि आप सभी व कन्या सहमत हो तो इसी मुहूर्त में शादी हो सकती है. मेरे पिता जी इसी बारात में उपस्थित हैं. मुझे विश्वास है मेरे निर्णय से वह भी खुश होंगे, और अपनी अनुमति दे देंगे.’’

ठाकुर विक्रम सिंह बोले-‘‘मैं तो इस प्रस्ताव की अनुमति के लिए बेटी लक्ष्मी के विचार जानना चाहता हूं.’’

लक्ष्मी ने सिर झुकाकर कहा, ‘‘पिताजी, जो व्यक्ति बिगड़ी हुई बात और हम लोगों की लाज को बचाने के लिए निर्भीक होकर सामने आया है., मैं उनका सम्मान करती हूं और यदि मुझे उनकी अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य मिलता है तो स्वयं को धन्य समझूंगी.’’

पुलिस अधीक्षक प्रेमिला जी कहने लगीं, ‘‘फिर देर किस बात की है? लग्न का समय है ही. पंडित जी से कहिए, विवाह संस्कार आरम्भ करें जिससे हम भी वर कन्या को आर्शीवाद दे सकें. क्यों ठाकुर विक्रम सिंह जी ठीक है न?’’

‘‘हां बिलकुल ठीक है, पर पहले वर के पिता जी से तो अनुमति ले लीजिए.’’विक्रम सिंह जी बोले.

ठाकुर सुल्तान सिंह वहीं थे. बुलाकर उनसे बात की गयी. वह तुरन्त सहमत हो गये. बोले, ‘‘मेरी अनुमति की आवश्यकता ही नहीं है. मेरा बेटा तैयार है तो मुझे क्या एतराज हो सकता है. घरवालों को बाद में मना लिया जाएगा. विवाह संस्कार सम्पन्न कराया जाये.’’

तुरन्त तैयारियां आरंभ हो गयीं. फेरों के पहले ठाकुर सुल्तान सिंह ने कहा, ‘‘आज से लक्ष्मी का नाम विजय लक्ष्मी होगा. शादी के बाद मेरी बहू इसी नाम से जानी जाएगी, क्योंकि इसने बिगड़ी हुई परिस्थितियों पर बड़े सुलझे हुए विचार से विजय पाई है.’’

किसी को क्या एतराज हो सकता था. उसी समय अजय सिंह और विजय लक्ष्मी परिणय सूत्र में बंध गये. गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर सभी का आर्शीवाद के प्राप्त किया.

 

संपर्कः म.सं स-613 जलवायु टावर, सेक्टर-47,

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