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प्राची नवंबर 2015 - संपादकीय / राकेश भ्रमर

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महंगाई का राग
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राकेश भ्रमर
(संपादक प्राची)
हंगाई का राग सुनने में बहुत अच्छा लगता है, खासकर तब जब इसका आलाप खूबसूरत, गोरी-चिट्टी और मोटी-ताजी, गोल-मटोल, भरे-भरे गालों वाली, डिजायनर साड़ी पहने और सोने के गहनों से लदी-फदी महिलाओं के मुख से हल्की मुस्कान के साथ उनके मोडुलर किचर में टी.वी. कैमरे के सामने निकलता है. वह केवल दाल और सब्जी की महंगाई का राग आलापती हैं, जैसे सृष्टि के निर्माण के बाद से अब तक केवल इन्हीं दो चीजों के दाम बढ़े हैं, बाकी चीजें इतनी सस्ती हैं कि दुकानदार बिना दाम लिए ही उन्हें ग्राहकों को थमा देते हैं.

महंगाई के राग की एक विशेषता है-यह केवल मध्यमवर्गीय खाती-पीती, सुखी जीवन व्यतीत कर रही महिलाओं के मुख से ही निकलता है. वह भी तब जब महंगाई दर के घटने-बढ़ने के सरकारी आंकड़े जारी किए जाते हैं, और जब कोई टी.वी. पत्रकार उनके घर में पहुंचकर उनको महंगाई के बारे में सवाल करता है, ‘‘हां, महंगाई तो है.’’ फिर जैसे कोई उनको इशारा करता है कि उनके चेहरे की मुस्कान और हाव-भाव से यह नहीं लगता कि वह महंगाई से प्रभावित हैं, तो वह थोड़ा शरमाकर कहती हैं, ‘‘क्या करें, दाल के भाव ने मार दिया, हफ्ते में केवल एक बार बनाती हूं. बस सब्जी में गुजारा करना पड़ता है. महंगाई ने किचन को रोने पर मजबूर कर दिया.’’ गनीमत है, महंगाई से केवल किचन ही रो रहा है. कहीं वह खुद रोने लगतीं, तो गंगा-जमुना की धाराएं संगम के पहले ही मिलकर सैलाब से पूरे शहर को डुबो देतीं.

ये महिलाएं दाल और सब्जी की महंगाई का राग टी.वी. कैमरे के सामने आलापती हुई कहती हैं, ‘‘क्या बताएं, आलू इतनी महंगी है कि आलू के परांठे बनाने-खाने को तरस गये.’’

‘‘तब फिर आप नाश्ते में क्या बनाती हैं?’’

‘‘क्या बनाएंगे, कभी अण्डे उबाल लिए, कभी आमलेट बना लिया. ब्रेड-बटर से खा लिया, कार्न-फ्लेक्स और दलिया का नाश्ता कर लेते हैं. बच्चे तो देसी नाश्ता पसन्द नहीं करते. उनको तो सुबह-शाम नूडल्स, पाश्ता, पित्जा और बर्गर चाहिए. कभी डोमिनो से मंगा देते हैं, कभी घर में बना लेते हैं.’’ वह बताती हैं, और दर्शक सोचता है, काश, ऐसी महंगाई का शिकार वह भी हो जाए. महंगाई की शिकार जनता अगर दाल-सब्जी न खाकर अण्डे-आमलेट और बर्गर-पित्जा खाती है, तो ऐसी महंगाई की शिकार पूरे देश की जनता को होना चाहिए, परन्तु निम्नवर्ग के मजदूरों और कामगारों को तो अण्डा क्या मुर्गी के दर्शन दुर्लभ हैं. ऐसा दुःख (महंगाई का दुख) तो केवल मध्यवर्ग की महिलाओं के ही नसीब में है. यह वही वर्ग है, जिनके पति अच्छे पद पर रहते हुए दो नम्बर की कमाई करते हुए पद का सदुपयोग करते हैं. अपने बच्चों को महंगी रिश्वत देकर अच्छे स्कूलों में दाखिला दिलवाते हैं और अपनी गाढ़ी (काली) कमाई को बैंक-लॉकर में सुरक्षित रखते हैं.
हंसते-हंसते महंगाई का राग मधुर स्वरों में आलापने वाली ये धर्मपरायण और पतिव्रता स्त्रियां हर वर्ष करवा चौथ के मौके पर महंगी से महंगी साड़ी खरीदती हैं. और चांदी के लोटे को लेकर करवा चौथ की पूजा करती हैं. बिना फलाहार के इनका कोई व्रत-उपवास पूरा नहीं होता और धनतेरस के दिन यहीं स्त्रियां बिना मोल-भाव के तरह-तरह के बर्तन खरीदती हैं, दीवाली की पूजा के लिए चांदी की मूर्तियां और सोने के सिक्के खरीदती हैं. इन्हीं दिनों यह स्कूटर, कार और फ्लैट खरीदती हैं, परन्तु दाल महंगी होने पर केवल हफ्ते में एक बार दाल बनाती हैं या फिर होटल में खाना खाने जाती हैं, क्योंकि होटल का खाना घर के खाने से सस्ता होता है. बनाने का झंझट भी नहीं करना पड़ता है.

इसी वर्ग की इन स्त्रियां को अल्टो जैसी कार घटिया लगती है और ये सामाजिक रुतबा बढ़ाने के लिए अपने पति को होण्डा सिटी कार खरीदने के लिए बाध्य करती हैं. बेचारा पति बैंक से कर्जा लेकर कार भी खरीदता है और पांच वर्ष तक 20,000 रुपये प्रति माह की किश्त भी भरता है. इतनी बड़ी किश्त पति को चाहे भारी लगती हो, परन्तु पत्नी नामक जीव के लिए तो यह हाथ का मैल है. बस उसे दाल और सब्जी महंगी लगती हैं, क्योंकि इसे बनाने में पसीना बहाना पड़ता है, जबकि एसी कार में बैठकर सड़ी और बदबूदार गर्मी से निजात मिलती है.

महंगाई का राग गाने और सुनने दोनों में अच्छा लगता है, परन्तु इसे केवल मध्यमवर्ग के लोग ही गाते हैं, क्योंकि उन्हीं के पास एक नम्बरी और दो नम्बरी कमाई होती है और वहीं सबसे ज्यादा खरीददारी करते हैं. उच्चवर्ग सम्पन्नता के वैभव में इतना गहरे तक डूबा होता है कि उसे महंगाई के घटने-बढ़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. जिस प्रकार समुद्र का न जाने कितना पानी भाप बनकर उड़ जाता है, परन्तु किसी कोने से एक बूंद कम होती दिखाई नहीं पड़ती. इसी प्रकार उच्च वर्ग की धनी स्त्रियां चाहे जितना खर्च करें, उनका बैंक बैलेन्स कम नहीं होता. जितना वह खर्च करती हैं, उससे ज्यादा तो उनके खाते में प्रति माह ब्याज आता है. ये घनी स्त्रियां मोल-भाव में समय बर्बाद नहीं करती. बस वस्तुएं पसन्द करती हैं. और कहती हैं, ‘‘पैक इट’’ पेमेंट भी वह क्रेडिट या डेबिट कार्ड से करती हैं. बिल आंख मूंद कर साइन करती हैं, इसलिए उन्हें बाजार भाव का पता नहीं चलता. फिर भला वो महंगाई का राग क्यों गाएंगी.

इसी प्रकार अपनी विपन्नता को अपनी खुद्दारी से गौरवान्वित करने वाला निम्न से निम्नतम वर्ग का व्यक्ति न सावन की बरसात से सुखी होता है, न भादों के सूखे से दुःखी. उसके जीवन में न तो चांदनी की शीतलता सुख देती है, न जेठ की तपती धूप उसे जलाती है. वह महंगाई का राग कभी नहीं आलापता है, न टी.वी. पत्रकार कभी उसकी झोंपड़ी में पहुंचता है, क्योंकि पत्रकार यह अच्छी तरह जानता है, कि न तो उसके पास खरीदने-खाने के लिए कुछ है, न कुछ बोलने के और सुनने के लिए. उसे न सब्जी-दाल की महंगाई से कुछ लेना-देना है, न उसके खरीदने-बेचने से. जब पैसे हुए, कुछ खा-बना लिया, वरना भूखे पेट सो गया. जीवन से निर्लिप्त ऐसे व्यक्ति महंगाई का राग तो क्या किसी भी दुःख का राग नहीं आलापते, बल्कि हमेशा खुशी के गीत गाते रहते हैं.

मध्यमवर्गीय व्यक्ति ज्यादातर सरकारी कर्मचारी/अधिकारी होते हैं. केन्द्र सरकार साल में दो बार महंगाई भत्ता बढ़ाती है, जो एक जनवरी और एक जुलाई से लागू होता है. यही महंगाई भत्ता राज्य सरकार के कर्मचारियों पर भी लागू होता है. महंगाई बढ़े या न बढ़े, परन्तु सरकारी कर्मचारी बड़ी उत्सुकता से इस भत्ते के घोषणा की प्रतीक्षा करता रहता है. घोषणा होते ही उसकी प्रतिक्रिया होती है. ‘‘यार! इस बार महंगाई भत्ता बहुत कम बढ़ा. लगता महंगाई दर काफी नीची थी.’’ कम महंगाई भत्ता मिलने पर उसका महंगाई का राग दब जाता है. उसके स्वर से निराशा का भाव झलकता है. उसे इस बात से घोर कष्ट होता है, कि महंगाई भत्ते का प्रतिशत पांच प्रतिशत से कम क्यों है? और जब यही भत्ता आठ या नौ प्रतिशत होता है, तो उसके चेहरे पर उसी प्रकार खुशी आ जाती है जैसे गधे के चेहरे पर वैशाख के महीने में खुशी आती है. इससे यह साबित होता है कि कोई भी व्यक्ति महंगाई घटने-बढ़ने से सुखी या दुःखी नहीं होता है. वह सुखी और दुःखी केवल महंगाई भत्ते के बढ़ने-घटने से होता है. जिस व्यक्ति को महंगाई से वाकई दुःखी होना चाहिए, वह बारहों महीने खुशी का राग आलापता है, परन्तु जो पैसे से मालामाल होते हैं, शॉपिंग मॉल में जाकर बिना जरूरत के हजारों का माल खरीदकर घर में भरते हैं, डोमिनों या डोनाल्ड में जाकर अपने बच्चों को विदेशी फास्ट फूड खिलाते हैं, के एफ.सी में जाकर चिकन की हड्डियां कड़कड़ाते हैं, वहीं सबसे ऊंचे स्वर में महंगाई का राग आलापते हैं. यह राग भी उनके मुख से तभी निकलता है, जब इस वर्ग की महिलाओं को कोई टी.वी. पत्रकार शॉपिंग करते हुए धर दबोचता है या घर में आकर उनका एन्टरव्यू लेता है.

महंगाई का राग गाने वाली महिलाएं कभी भुखमरी तो दूर भूख का भी शिकार नहीं होती. ये महिलाएं आटो में सौ-दो सौ रुपये किराया-भाड़ा खर्च करके पांच रुपये किलो कम में सब्जी-दाल खरीदने 50 किलोमीटर दूर जाती हैं और पांच सौ रुपये की दाल-सब्जी खरीदकर घर लाती हैं. फिर वह गर्व से कहती हैं कि उन्होंने इतना सस्ता सामान खरीदकर सौ रुपये बचा लिए. परन्तु आने-जाने में जो दो सौ रुपये ऑटो के भाड़े में खर्च हुए, उसको वह खर्चे में नहीं जोड़ती. सारा दिन बर्बाद किया, सो अलग...

हाय री! महंगाई की मारी महिलाओं! महंगाई का राग आलापने के साथ-साथ थोड़ा अपनी बुद्धि पर भी तरस खा लेती, तो शायद महंगाई से इतना दुख न मिलता.

















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