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वसुदैव कुटुम्बकम की भाषा है - वैश्विक हिंदी / आलेख / सुनील जाधव

             10 जनवरी, १९७५ में हिंदी का पहला विश्व हिंदी सम्मेलन, नागपुर में हुआ था। यहाँ कई प्रस्तावों को रखा गया था। जिसमें दो मुख्य बिन्दुओं को देखा जा सकता है। एक पहला वैश्विक हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी को सम्पन्न होने के कारण इस दिन को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाना। आगे चलकर मनमोहन सिंह जी ने 10 जनवरी, २००६ को विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा की थी। और पहला विश्व हिंदी दिवस इसी दिन सम्पन्न हुआ था। इस सन्दर्भ में आधिक जानकारी हेतु विकिपीडिया के इस परिच्छेद को देखा जा सकता है, ‘’ विश्व हिंदी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना थाट हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिंदी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं |विश्व में हिंदी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिंदी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी, १९७५ को नागपुर में आयोजित हुआ था। इसीलिए इस दिन को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिह ने 10 जनवरी, २००६ को प्रति वर्ष विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी २००६ को पहली बार विश्व हिंदी दिवस मनाया था।’’


पहला विश्व हिंदी दिवस सुरेशचन्द्र शुक्ल जी की अध्यक्षता में नार्वे में सम्पन्न हुआ था। तब से लेकर आजतक विदेशों में विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। दूसरा यह कि हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार तथा वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए मारीशस के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम जी ने भारत के बाहर मारीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना करने का प्रस्ताव रखा था। जिसने ११ फरवरी, २००८ को औपचारिक रूप में कार्य करना आरम्भ कर दिया था।


वसुदैव कुटुम्बकम यह मात्र वाक्य या सूक्ति नहीं है। वह एक संस्कृति-संस्कार है। और हिंदी भाषा उसकी प्रबल वाहिनी है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में वसुदैव कुटुम्बकम की संकल्पना ने सम्पूर्ण विश्व को एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। इसमें भाषा का सबसे बड़ा योगदान होता है। हिंदी भाषा के तीव्र गति से वैश्विक रूप धारण करने के कारण उसने हमारे संकृति, अचार-विचार, साहित्य-फ़िल्म, रहन-सहन, वेशभूषा, समाज, धर्म, संस्कार, राजनीति, इतिहास, भूगोल को वैश्विक परिपटल पर विशाल रूप में अंकित किया। यही कारण है कि आज वह वैश्विक भाषा बन रही है। अर्थात वसुदैव कुटुम्बकम की भाषा है वैश्विक हिंदी।


विदेश में संस्थाओं का योगदान :-
पिछले 10 वर्षों से मारीशस, फिजी, नार्वे, गुयाना, त्रिनिनाद, कैनडा, यु.ए.इ. दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, अमरीका, इंग्लैण्ड आदि कई देशों में हिंदी भाषा को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका सबसे पहला कारण यह था कि इस अपनी भाषा को याद करना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना था। तो दूसरी और हिंदी का विदेशों में बोलचाल की भाषा बनाना। विदेशी भूमि पर अपनी भाषा का परचम लहराने के पीछे कई सम्मेलनों , प्रवासी भारतीयों , साहित्यकारों, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं का योगदान महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इस में सबसे पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का नाम लिया जाता है, जो प्रतिवर्ष विभिन्न देशों में आयोजित किया जाता है। इस सम्मेलन में कई देशों के शिक्षाविद, भाषा विज्ञानी, कवि, साहित्यकार, पत्रकार, सम्पादक आदि की सक्रिय सहभागिता को देखा जा सकता है। जब भी कोई व्यक्ति विदेश जाता है, तब मात्र उसका शरीर वहाँ नहीं जाता बल्कि उसके साथ उसकी भाषा, संस्कृति, धर्म, साहित्य भी जाता है। जब ऐसे कई वैश्विक सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है तब हजारों व्यक्ति हिंदी का प्रचार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर रहे होते हैं। अबतक नौ विश्व हिंदी सम्मेलनों की सफलता से आयोजन किया गया है। जयप्रकाश मानस जी के सृजन गाथा डॉट कॉम की ओर से विदेशों में अबतक ११ सम्मेलन हुए हैं। यह सम्मलेन हिंदी प्रचार- प्रसार एवं साहित्य के योगदान के लिए विभिन्न पुरस्कार देता है। जिससे हिंदी प्रचारकों, साहित्यकारों आदि को प्रोत्साहन मिलता है। अत: इस संस्था का योगदान महत्वपूर्ण है। दिल्ली के आशीष कंधवे जी के विश्व हिंदी परिषद द्वारा अबतक तीन सम्मेलनों का आयोजन हुआ है। यह संस्था भी हिंदी प्रचार-प्रसार, योगदान, साहित्य के लिए पुरस्कृत करती है। श्रीलंका, मारीशस, बाली इन्डोनिशिया जिसे देशों में हिंदी का प्रचार कर रही हैं।


विदेश में पत्रिकाओं का योगदान :-
वैश्विक हिंदी बनाने में विदेश की धरती से निकलने वाली हिंदी पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन पत्रिकाओं ने मात्र हिंदी का प्रचार-प्रसार ही नहीं किया बल्कि वहाँ की धरती से वैश्विक साहित्यकारों को जन्म दिया। उन्हें पहचान दी। इतना ही बल्कि वहाँ रचे बसे साहित्यकारों का वहाँ के परिवेश को अभिव्यक्त कर उस परिवेश को एक परिवार बना दिया है। उसे पढ़ते समय ऐसा लगता है कि वह भूमि भी अब हमारी है और हमारी भूमि उनकी अर्थात वसुदैव कुटुम्बकम की भावना देखी जा सकती है। प्रवासी अनिवासी भारतीयों में विदेश की धरती से सबसे पहली पत्रिका भारत दर्शन-रोहित शर्मा, न्यूज़लैंड से प्रकाशित हुई। जो लगातार सक्रियता बनाये हुए हैं। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने हिंदी का वैश्विक झंडा गाड़ा है| उनमें प्रमुखता से नाम लिया जा सकता है। प्रवासी दुनिया- हिंदी चेतना-सुधा ओम ढींगरा-अमरीका, विश्व हिंदी संस्थान, मारीशस, अनुभूति-अभिव्यक्ति-पूर्णिमा वर्मन-यू.ए.ई,प्रयास- प्रो.सरन घई-कैनडा, स्पाईल दर्पण-सुरेन्द्र शुक्ल–नार्वे, अमेलस्टलगँगा-पोलैंड आदि। उक्त पत्रिकाओं द्वारा विभिन्न प्रतियोगिता ली जाती है एवं पुरस्कृत किया जाता है।


विदेशों में नेताओं का योगदान:-
आज विदेश में डेढ़ सौ से अधिक विश्व विद्यालयों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जाती है। हिंदी की व्यापकता और प्रचार-प्रसार के महत्त्व को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने 10 जनवरी,२००६ को विश्व हिंदी दिवस मनाने के लिये कहा था। ‘’ भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम होने के साथ-साथ हमें समाज के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा सामयिक पहलुओं से भी परिचित करवाती है। विगत कुछ वर्षों से भारतीय प्रतिभा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए आगे आ चुकी है। विदेशी बाजार भी भारत की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। ऐसे में हन्दी भाषा का महत्त्व और भी बड़ा है। हिंदी ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर ली है।’’ वहीं वर्तमान देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जी ने कहा,’’आज हिंदी भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में बोली और समझी जानेवाली विश्व भाषाओं में अपनी पहचान स्थापित कर चुकी है। विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर मैं सभी हिंदी प्रेमियों और हिंदी भाषियों को बधाई और शुभकामनायें देता हूँ।’’ अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी का योगदान हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।


विदेशों में साहित्यकारों का योगदान :-
पश्चिमी देशों में हिंदी ने अपनी जड़े जमा ली है और वह दिन ब दिन फल फूल रहीं है |पर यूरोप में हिंदी का प्रचार-प्रसार अन्य देशों की तुलना में कम रहा था किन्तु अब हिंदी अध्यापन, पत्रिकाओं, फिल्मों, साहित्यकारों द्वारा हिंदी का भी सम्पर्क भाषा के रूप में विकास हो रहा है। इस सन्दर्भ में ह्यमबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी के प्रवक्ता, संशोधक, हिंदी प्रचारक डॉ.रामप्रसाद भट्ट जी ने कहा है, ‘’हिंदी समझने एवं बोलनेवालों की संख्या तो अवश्य रूप से बढ़ी है और हिंदी ने सम्पर्क भाषा का रूप भी ले लिया है।’’
संक्षिप्त रूप में कहा जा सकता है कि जब कोई भाषा विश्व की सम्पर्क भाषा का रूप धारण कर लेती है तो वह वैश्विक परिवार की बोलचाल, व्यवहार, आर्थिक उन्नति, सम्पर्क की भाषा बन जाती है। वह वसुदैव कुटुम्बकम की भाषा बन जाती है। इसीलिए हिंदी विश्व परिवार की भाषा है कहना असंगत नहीं होगा। 10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस के रूप में भले ही विदेशों में मनाया जाता है किन्तु ऐसे अवसर हिंदी को संगठित और मजबूत बनाते हैं इसीलिए हमें भारत में भी विश्व हिंदी दिवस मनाना चाहिये। तब वह सही मायने में विश्व हिंदी दिवस कहला सकता है।

डॉ.सुनील जाधव
नांदेड
भारत
+91 9405384672

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