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आलेख : “सांस्कृतिक विजेता” एवं “कूटनीतिज्ञ” – “श्री राम”

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विवेक मणि त्रिपाठी

एवं

डॉ अखिलेश्वर त्रिपाठी

श्रीराम रावण युद्ध सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने वाला युद्ध भी था, जिसमे आर्यसंस्कृति राक्षस संस्कृति पर विजयी हुई I रामायण में तीन संस्कृतियों का विस्तार परिलक्षित होता है – आर्य,वानर और राक्षस संस्कृति I वानर संस्कृति जहाँ अपनी शैशवावस्था में थी, वही राक्षस संस्कृति रूपी धूमकेतु आर्य संस्कृति के सूर्य को आच्छादित किये जा रहा था I राक्षस संस्कृति का अग्रदूत रावण वर्तमान बिहार राज्य के बक्सर तक अपने गुप्तचरों (ताड़का) को स्थापित कर चुका था I

आर्यसंस्कृति का सर्वोत्तम स्वरुप तपोवनों में पल्लवित,पुष्पित तथा फलित हो रहा था I ये तपोवन ही हमारे ज्ञान – विज्ञान की उत्कृष्ट शोध – स्थलियाँ थी, जहाँ के कण – कण में अध्यात्म पिरोया हुआ था I इन तपोवनों में सुरक्षित आर्य (वैदिक) संस्कृति तथा उनके सरक्षंक ऋषियों एवं तपस्वियों की हत्याएं राक्षस संस्कृति के उन्नायकों द्वारा किया जाने लगा था I आत्मद्रष्टा ऋषियों के यज्ञादि जनित शोध कार्यों पर ग्रहण लग चूका था I वैदिक संस्कृति के स्थान पर रावण, राक्षस संस्कृति की स्थापना में सफल होता हुआ दिखलाई पड़ने लगा था I ऐसे ही सांस्कृतिक संक्रमण काल में अयोध्या की पावन धरणी तल पर श्रीराम का प्रादुर्भाव हुआ I

श्रीराम में विलक्षण प्रतिभा एवं संभावनाओं को देखकर, उस समय के राष्ट्रचिन्तकों ने उन्हें सुनियोजित ढंग से आर्य संस्कृति के नायक के रूप में तैयार करने का अभियान प्रारम्भ किया I श्रीराम के तीन महान गुरुओं में,परशुराम ने उन्हें शस्त्र तथा वशिष्ठ ने शास्त्र की शिक्षाएं दी I राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र के निर्देशन में उनके शस्त्र तथा शास्त्र ज्ञान का प्रायोगिक पक्ष सुदृढ़ किया गया I

दशरथ की वृद्धावस्था के कारण अयोध्या में राज्यसत्ता की केंद्रबिंदु विरांगना कैकेयी थी I राष्ट्रहित में अपने महान सांस्कृतिक एवं राजनैतिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए कैकेयी ने श्रीराम के प्रति अपने अतिशय प्रेम और स्नेह के बावजूद भी उनके लिए १४ वर्षों के वनवास का कठोर निर्णय लिया, जिसमे वशिष्ठादि ऋषियों से युक्त मंत्रिमंडल की भी गुप्त सहमति थी I राष्ट्रहित में इस गुप्त सहमति को गुप्त रखना आवश्यक था I यह श्रीराम के सांस्कृतिक विजय अभियान की प्रथम कूटनैतिक सफलता थी I इस कूटनैतिक निर्णय के कार्यान्वयन में कैकेयी को अपने सुहाग की बलि देनी पड़ी, पुत्र भरत के दुत्कार के साथ साथ प्रबल लोकोपवाद का सामना करना पड़ा, फिर भी कैकेयी राष्ट्रहित में आर्य संस्कृति की पुनर्स्थापना के अपने संकल्प से विचलित नहीं हुई I

श्रीराम के वनगमन में भारतीय राजनीति की विशिष्ट कूटनीति के समक्ष रावण जैसा विज्ञ पंडित भी पराभूत हो जाता है I हमारी मान्य परम्परा के अनुसार तपस्वी जन भारत के उत्तर दिशा में अवस्थित हिमालय के सघन वनों में अपनी तपोस्थली बनाया करते हैं I किन्तु राजकुमार श्रीराम .................? एक अकिंचन जरा – जूटधारी तपस्वी के रूप में अयोध्या से निकलकर दक्षिणी वन्य प्रदेशों में प्रविष्ट हो जाते हैं I महान कूटनीतिज्ञ रावण उन्हें मात्र एक निर्वासित तपस्वी राजकुमार समझता है , जोकि उसकी दृष्टिं में दया एवं सहानभूति के पात्र हैं I इससे श्रीराम को वन्यप्रदेशों में उपस्थित तपोशालाओं में निर्वाध रूप से अपनी गतिविधियों को संचालित करते रहने का स्वर्णिम सुअवसर प्राप्त हो जाता है I भारतीय संस्कृतियों के पुरोधा ऋषियों की प्रयोगशालाएं वनों में ही अवस्थित होती थी I श्रीराम ऋषियों के आश्रमों में जाते हैं तथा राष्ट्रहित में आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए उनके विशिष्ट ज्ञान एवं नवीनतम शोधों को सूर्य रश्मियों के समान अपने प्रखर तेज से अवशोषित करते हैं I श्रीराम के अलौकिक शक्तियों का आभास रावण को तब होता है , जब वे खरदूषण ,त्रिशिरा का वध करते हैं , किन्तु तब तक राम को समझने में रावण बहुत ही विलम्ब कर चूका था I

लंकापति रावण और किष्किन्धापति बालि के मध्य एक सैन्य समझौता हुआ था , जिसके अनुसार एक दुसरे के अधीनस्थ पर बाह्य आक्रमण की स्थिति में दोनों देशो की सैन्यशक्ति मिलकर सामूहिक रूप से उसका प्रतिकार करेगी I इस संधि के कारण बालि के रहते वानर जाति से सहायता प्राप्ति श्रीराम के लिए असंभव था I मानवी शक्ति,राक्षसी शक्ति की तुलना में अल्प बलशाली थी , जिनके द्वारा रावण जैसे मायावी से मुकाबला करना असंभव था I फलतः कूटनीति विशारद श्रीराम ने अपने विशिष्ट दूत तथा गुप्तचर शिरोमी हनुमान के प्रयासों से सुग्रीव से मित्रता कर बालि का वध किया तथा वानर जाती की सहायता प्राप्त कर रावण जैसे दुर्दांत शत्रु को विजित किया I यंहा भी विजयश्री के वरण में श्रीराम की कूटनीति का उत्कर्ष विभीषण को मित्र बनाने तथा उसके द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण गुप्त जानकारियों के रूप में स्वयं सिद्ध है I

श्रीराम अयोध्या तथा मानव जाति की सहायता के बिना रावण पर विजय प्राप्त करते हैं तथा इस प्रलयंकारी युद्ध में भारतभूमि को किसी भी प्रकार से कुप्रभावित नहीं होने देते हैं, यह उनकी कूटनीति का चरमोत्कर्ष है I श्रीकृष्ण भी महान कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं , किन्तु जहाँ श्रीकृष्ण की कूटनीति भारतवर्ष के लिए विध्वंसात्मक थी ,वहीँ श्रीराम की कूटनीति भारतीय संधर्भ में पूर्ण सृजनात्मक है I इस प्रकार भारतीय दृष्टिकोण से श्रीराम ,श्रीकृष्ण की तुलना में महान कूटनीतिज्ञ सिद्ध होते हैं I

किष्किन्धा तथा श्रीलंका को विजीत करने के बावजूद भी श्रीराम वंहा से कुछ भी नहीं लेते हैं I अपने दो परम मित्रों सुग्रीव तथा विभीषण का ,किष्किन्धा एवं लंका में क्रमशः राज्याभिषेक करा देते हैं I इनके शासन काल में किष्किन्धा तथा लंका में भी आर्य संस्कृति का पूर्ण विकास तथा विस्तार हुआ I भारत में तो रामराज्य की गाथा आज भी हमारी संस्कृति की अक्षुण्य निधि बनी हुई है I ऐसे सांस्कृतिक विजेता का हमारा कोटिशः नमन ...................... I

लेखकद्वय परिचय – clip_image002

१. नाम - विवेक मणि त्रिपाठी

पिता का नाम – डॉ. अखिलेश्वर त्रिपाठी

जन्मस्थान – बेतिया, बिहार, भारत

जन्मतिथि – ०१ -०५ -१९८७

संपर्क सूत्र - +८६ -१३०७६७४८०६२

ईमेल – vmtripathi@gdufs.edu.cn, 2294414833@qq.com

शिक्षा

२००३ – २००६ – काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से चीनी भाषा एवं साहित्य में स्नातक ,

२००६ – २००८ – काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से चीनी भाषा एवं साहित्य में स्नातकोत्तर,

२००८ – २०११ – मगध विश्वविद्यालय बोधगया ,बिहार में चीनी भाषा एवं साहित्य के सहायक प्रोफेसर

२०११– २०१४ – चीन के शनयांग नार्मल विश्वविद्यालय से चीनी भाषा एवं साहित्य में स्नातकोत्तर,

२०१४ – २०१५ – गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर में चीनी भाषा एवं साहित्य के सहायक प्रोफेसर,

सितम्बर २०१५ से अब तक  – चीन के कुआन्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय,कुआन्ग्चौ में हिंदी के सहायक प्रोफेसर,

शोध एवं आलेख

चीन के शनयांग नार्मल विश्वविद्यालय में ‘आधुनिक चीनी साहित्य एवं संस्कृति ’ पर शोध पत्र प्रकाशित ,

‘चीन में आयुर्वेद - योग का इतिहास ’ विषय पर लेख प्रकाशित,

चीनी मीडिया में भारत –चीन सम्बन्ध पर चर्चा में भागीदारी,

‘चीन एवं दक्षिण पश्चिम एशिया’ पुस्तक प्रकाशाधीन,

२. डॉ. अखिलेश्वर त्रिपाठी- कशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में पीएचडी की उपाधि ,सम्प्रति बिहार के महंत रामरूप गोस्वामी महाविद्यालय में संस्कृत साहित्य के प्रोफेसर .

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