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अंतरद्वंद्व / कहानी / रवीन्द्र कात्यायन

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“मे आई कम इन सर!” मेडिकल अफसर कैप्टन अजय ने कमांडर को सैल्यूट ठोका।     “यस कैप्टन। कम इन। बैठो” - कमांडर ने गंभीर वाणी में कहा।     “थैंक्...

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“मे आई कम इन सर!”

मेडिकल अफसर कैप्टन अजय ने कमांडर को सैल्यूट ठोका।
    “यस कैप्टन। कम इन। बैठो” - कमांडर ने गंभीर वाणी में कहा।
    “थैंक्यू सर !... सर ! कल हमारी बहुत ‘कैजुअल्टी’ हो गई..... हमारा काफी नुकसान हुआ।“
     “क्या करुँ अजय? मेरी कुछ समझ मे नहीं आ रहा। आखिर कब तक ऐसा चलेगा? सोच-सोच कर परेशान होता हूँ- अपने जवानों की हालत मुझसे देखी नहीं जाती। क्या करुँ? जाने कब खत्म होगी यह लड़ाई?”
       “सर कल फिर दो जवान बर्फ में जम गए। उनकी डेड बॉडी अभी आई है।“
ओss ! डेड बॉडी!..... किसकी - किसकी है?”
       “सर लेफ्टिनेंट सुखवीर और सिपाही बचन सिंह। लेफ्टिनेंट सुखवीर के कंधे में गोली लगी थी और सिपाही बचन सिंह की जांघ में।“
       “बहुत बुरा हुआ- बचन सिंह का तो और भी। यू नो अजय! उसके घर पर उसकी माँ अकेली है। अब वह और अकेली हो जाएगी।“
      “आई नो सर! मैँ यही बताने तो आपके पास आया हूँ। इन फैक्ट, बचन सिंह ने अपनी माँ के नाम एक पत्र छोड़ा है। आप इसे देख ले सर।“ कैप्टन अजय ने कमांडर को पत्र सौपते हुए कहा।
     “श्योर..... तुमने इसे पढ़ा कैप्टेन?”
     “यस सर”
     “फिर क्या प्रॉब्लम है? उसकी माँ के पास भेज दो।“
     “नहीं सर। मैँ डिसीज़न नहीं ले सकता। पहले आप पढ़ ले फिर जैसा कहें।“
     “ओ.के.”... पत्र देखता है- “लेकिन यह पत्र तो बहुत लंबा है। बचन सिंह ने इसे लिखा कैसे होगा? दर्द से लड़ते हुए उसने कैसे अपने अहसास को जिंदा रखा होगा? उस दिन मैंने तुमसे कहा था कैप्टन अजय! बचन सिंह बहुत जिद्दी है और उसकी जिद ही उसकी ताकत है। ....मुझे उसका बहुत अफसोस है कैप्टन! बहुत।“
     “यस सर”
     “ओ.के. अजय! पत्र पढ़कर मैं तुम्हें बुला लूँगा।“
     “ओ.के. सर। थैंक्यू सर” कैप्टन अजय सिंह सैल्यूट ठोककर टेंट से बाहर निकल जाता है।
चिंतित कमांडर टहलते हुए पत्र पढ़ता है।

   * * * * * * ** * * * ** * * * *

मेरी प्यारी माँ !
मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है... लेकिन.... पहले ये बताओ तुम कैसी हो? तुम्हारी तबियत कैसी है? आजकल तुम खाना तो खाती नहीं होगी। पता है माँ! मैं दिन में कई-कई बार सोचता रहता हूँ- सिर्फ तुम्हारे बारे में- कि तुम इस समय क्या कर रही होगी? और हर बार मुझे यही लगता है, कि तुम सिर्फ मेरे बारे में सोच रही होगी और युद्ध के बारे में, फौज के बारे में और...और आने वाले समय के बारे में और इस सबके बीच तुम सबसे अधिक परेशान होगी तो सिर्फ मुझे लेकर। लेकिन तुम मेरी चिंता न करो माँ! बिल्कुल नहीं। वैसे भी अब तुम्हें मेरे बिना रहने की आदत डालनी होगी।

फौज की इस नौकरी में तो किसी को सोचने का वक्त है भी नहीं। पर माँ, मैंने बहुत सा वक्त निकाल लिया है- तेरे बारे मे सोचने के लिए। इसीलिए मैं यह लिख रहा हूँ, वरना जंग छिड़ी हो और फौजी पत्र लिखे- क्या संभव है? पर मेरी जंग अब बहुत थोड़ी शेष है। तुम हमेशा कहा करती हो- जो होना होता है, वह होके रहता है। उस पर किसी का जोर नहीं... न तेरा, न मेरा, न किसी का। और फिर, मैंने तो बस अपना फर्ज अदा किया। अपना कर्म किया। वैसे भी यह एक दिन होना ही था। जो परिस्थितियाँ आज हैं… जो दौर चल रहा है... इसकी परिणति ऐसी ही होनी थी। ऐसी ही।
      ...मैं तुम्हारी गोद में लेटना चाहता हूँ माँ। तुम्हारी बहुत याद आ रही है। काश! तुम मेरे पास होतीं... मेरा सारा दर्द मिट जाता। मेरा दायाँ पैर बेकार हो चुका है और चारों ओर बर्फ का दरिया.... । मुझे अब सहायता मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं रही। कुछ देर मे यह सारा बर्फ का समंदर अंधेरे में डूब जाएगा और मैं भी उस अंधेरे का एक बेजान हिस्सा बन जाऊँगा। सूर्य छिपने में थोड़ी देर है। तुम सोच सकती हो माँ! कि मेरे लिए इस सूर्य का अस्त होना इस समय क्या अर्थ रखता है? यह सूर्यास्त सिर्फ सूर्य का ही नहीं; मेरा भी होगा... मेरे और कई साथियों का भी.... क्योंकि वह इस बर्फ के रेगिस्तान मे निरीह पड़े जल्दी से जल्दी अपने शरीर को बर्फ में तब्दील हो जाने देना चाहते हैं। सभी जानते हैं- रात में सहायता मिलने की उम्मीद यहाँ नहीं होती। ऐसा सोचना मूर्खता है। फिर ... कौन है हमारे बारे में सोचने वाला? हमारा कमांडर? हमारी सरकार? हमारा देश?- एक तुझे छोड़कर।
यह वह जगह है माँ- जहाँ कोई इंसान नहीं आता... आ नहीं सकता। आ सकते हैं तो बस हम सिपाही। सिर्फ मरने.... माफ करना... सिर्फ शहीद होने। क्योंकि इस युद्ध से, इस लड़ाई से तो हम शायद बच जाएँ पर इस माइनस चालीस डिग्री टेंपरेचर से कैसे बच पाएँगे। यह सर्दी, यह बर्फ और.... और गोली खाई टांग। क्या करूँ माँ ? बहुत दर्द हो रहा है ! सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ रहा है और बर्फ में दफन हो जाने का अहसास मुझे अपने शिकंजे में कसता जा रहा है, पर मैं क्या करूँ ? मैं अपना पैर हिला भी नहीं सकता। मेरा खून बहकर बर्फ पर जमता जा रहा है और इस खून के साथ मेरा वजूद भी भीतर से निकलकर इस बर्फ पर फैलता जा रहा है। लेकिन मेरे इस खत्म होते वजूद के साथ जो शूल इस जेहन में चुभ रहे हैं- मैं उन्हें यूँ ही खुद को ख़त्म नहीं करने दूँगा। इसीलिए मैं जल्दी-जल्दी यह पत्र लिख रहा हूँ ताकि अंधेरे में खत्म हो जाने से पहले तुझसे अपने मन की बात कह सकूँ। शायद मेरा तुमको यह आखिरी पत्र होगा- अगर यह तुम तक पहुँच सका।

मेरी प्यारी माँ! मुझे बहुत दर्द हो रहा है... मुझे माफ कर देना.... तुम्हें यह सहना ही होगा। मुझे गर्व है कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया और शहीद होने जा रहा हूँ- शायद मजबूरी में ही सही, तुम्हें भी इसका गर्व करना होगा- शायद इसी से तुम्हारा दुख कुछ कम हो सके। पर माँ! एक बात कहूँ- मैं दुश्मन की गोली से नहीं मर रहा हूँ- न लड़ाई से, न किसी और से- मैं तो इस बर्फ के अनंत विस्तार में बर्फ बनता जा रहा हूँ। मेरी टाँगें अब अकड़ती जा रही हैं। रोशनी भी कम होती जा रही है। मैं कुछ कर नहीं सकता। मुझसे थोड़ी दूर पर एक नौजवान ढेर पड़ा है। वह मेरा अफसर था, पर उम्र में छोटा। मुझे उस पर बड़ी दया आ रही है। बहुत जोशीला था- बड़ा तेज- 23 वर्ष का। पर वह तो दो मिनट में ही ढ़ेर हो गया माँ। वह अपनी माँ को पत्र भी नहीं लिख सका। उसकी उम्र तो अभी पढ़ने-लिखने की थी। बहुत बातें करता था जवानों से। बड़ी-बड़ी बातें। क्या उसने यह नहीं सोचा कि उसने देश को क्या दिया ? मैं भी इस देश को क्या देकर जा रहा हूँ? या मेरे हज़ारों साथी....? इस लड़ाई का क्या मतलब है? क्या हम इस बर्फ के समुद्र के लिए लड़ रहे हैं? क्या यह देश सिर्फ मेरा है?... माँ! हम लोग तो इस युद्ध में सिर्फ घायल हुए हैं, पर शहीद इस बर्फ में हो रहे हैं और हमारी शहादत आज़ाद किसे करेगी? किसे आज़ादी मिल रही है?

पता है माँ! वह नौजवान अफसर जो थोड़ी दूर पर शहीद हुआ पड़ा है- क्या कह रहा था? कहता था- यह युद्ध ही गलत है। हम दुश्मन से कम, खुद से ज्यादा लड़ रहे हैं। इस मौसम से, इस सर्दी से, इन हवाओं से, इन बर्फीली वादियों से हम अपने आप को कैसे बचा सकते हैं वह यह भी कहता था माँ कि- यह युद्ध तो प्रायोजित है, यह देश के लिए नहीं लड़ा जा़ रहा है। और भी ना जाने क्या–क्या? उसकी सारी बातें मेरी समझ में नहीं आती थीं। समझकर करता भी क्या? यूँ भी सिपाही सोच समझ सकता ही कहाँ? उसे तो बस करना होता है- जो कहा जाए। पूछना मना है। सो मैं भी उससे क्या पूछता? और फिर उसे अधिक समय ही कहाँ मिला? गोली उसके कंधे में लगी और वह उठ न सका। मेरे सामने की बात है। वह मुझे बुलाता रहा पर मैं उसके लिए कुछ भी न कर सका। उसने मुझसे कहा कि अगर मैं जिंदा रहूँ तो उसके माँ-बाप को उसका अंतिम प्रणाम ज़रूर कहूँ- विशेष कर उसके पिता को जिसकी मर्ज़ी के लिए उसने इस जीवन को स्वीकार किया। उसका ब्याह भी तय हो गया था माँ। वैसे ब्याह तो तुम इस बार मेरा भी करतीं पर...
क्या यह अच्छा नहीं हुआ माँ कि मेरा ब्याह अभी तक नहीं हुआ। क्या एक और जिंदगी बर्बाद होने से नहीं बच गयी? मुझे इसका दुख है कि तुम बहू का इंतजार ही करती रहीं। माफ करना माँ! तुम्हारे भाग्य में बहू का सुख लिखा ही नहीं अन्यथा पिछली बार ही... पर नहीं,  तुम्हारे भाग्य में यह सुख नहीं, नहीं तो सब तय होकर क्यों टूट जाता- क्या यह इसलिए नहीं कि एक मासूम की जिंदगी बरबाद होने से बचनी थी। तब कितनी हाय-तौबा मची थी? लगता था जैसे सब कुछ बहुत ख़राब है। जीना कितना कठिन हो गया था... धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो चला। ज़िदगी फिर अच्छी लगने लगी। किसे पता था कि यह जो हो रहा है, मेरे अच्छे के लिए, उसके अच्छे के लिए, और तुम्हारे अच्छे के लिए। क्या तुम एक दुर्भाग्य को, अभिशाप को, जीवन भर ढोने से बच नहीं गयीं- एक पाप का अहसास- जवान विधवा बहू के साथ अकेले दुख के समुद्र में लगातार छटपटाती ज़िंदगी। तुम कम से कम दूसरे का दुख ढोने से बच गयीं और मुझे मालूम है कि अपना दुख भी तुम्हारे लिए कम नहीं होगा। किंतु तुम्हें इसे सहना होगा माँ! सहना ही होगा। जैसे मैं सह रहा हूँ.. खत्म होते हुए। शायद आधे घंटे बाद मेरी दुनिया अंधेरे में मिल जाएगी और अंधेरा मेरे अस्तित्व को ढँक लेगा तुम्हारे अस्तित्व को ढँक लेगा और इस अनिश्चित युद्ध में अंधेरे का एक और अध्याय जुड़ जाएगा...
बहुत कम लोग पर्दे के पीछे की कहानी जानते हैं माँ! जो दिखता है उसमें सच्चाई होती कितनी है? यहाँ की खबरें बाहर नहीं जा पातीं- जो आप पढ़ती, सुनती हैं- वे वही खबरें होती हैं जो हमारी सरकार तुम तक पहुँचाती है और हम, बाहर की खबरें सुन नहीं सकते। न हमारे पास साधन उपलब्ध हैं, न समय और न इसकी छूट है। पिछले एक महीने से तो बस बंदूक, गोली, स्टेनगन, कार्बाइन, गोले, बम- यही सब हो रहा है। इसका कोई अंत नहीं। किंतु मेरे लिए उसका अंत हो रहा है, बल्कि हो गया है। यहाँ आकर एक वितृष्णा जाग उठती है- श्मशान वैराग्य। क्या जीवन इतना सस्ता है? इस लड़ाई में अधिकतर मरने वाले, नहीं शहीद होने वाले नवयुवक हैं– पढ़े–लिखे, उत्साही नई उम्र के जवान। जो सोचते नहीं, क्योंकि सोचना मना है। सोचने का काम है ऊपर वालों का। किसको किस दिन, कहाँ ढेर होना है, यह हम नहीं जानते। हममें से सभी लोग इसी तरह अपना मार्ग तय करते हैं- जैसा कहा जाए- अच्छा या बुरा, सही या गलत, ज़िंदा या मुर्दा। कुछ अधमरे, भाग्यशाली बच जाते हैं, जो लूले-लंगड़े होकर ज़िंदा रहते हैं। कुछ इस बर्फ में दबकर या इस सर्दी में अकड़कर कुत्ते से भी बदतर मौत मरते हैं। बढ़ते दर्द के साथ वह अपने शरीर को बर्फ में जमता हुआ देखते हैं। उनके शरीर के साथ उनकी पीड़ा, उनकी आत्मा, दिल-दिमाग सब जम जाते हैं और मेरी तरह मिट जाते हैं। जिनकी साँसें कड़कती तोपों, सनसनाती गोलियों, दहाड़ती मशीनगनों, ए.के. फिफ्टी सिक्स., ए.के.फोर्टी सेवन की गर्जना में भी बाकी बच जाती हैं- वे इस मौसम द्वारा शिकार कर लिए जाते हैं। फिर वे कैसे शहीद हुए माँ? वह तो मरते हैं- बेबस और बदतर मौत। इस मौसम से लड़ने की तैयारी हमने कभी नहीं की, न आज ही इसके लिए तैयार हैं। और हम लड़ भी किनसे रहे हैं? किराए के आतंकवादी, उग्रवादी, लुटेरे, हत्यारे, मौत के क्रूर सौदागर! हमारा सामना किसी सेना के सैनिकों से नहीं है। सैनिक सिर्फ लड़ाका होता है- अपने देश की तथाकथित सुरक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाला, बलिदान करने वाला। लेकिन यहाँ तो बात ही अलग है- बिल्कुल दूसरे किस्म की लड़ाई। बताऊँ क्या कह रहा था मेरा बटालियन कमांडर चार दिन पहले– ‘यह अलग तरह की लड़ाई है और हमारी कैज़ुएल्टी ज्यादा हो रही हैं। हमारे जवानों के पास यहाँ के मौसम के लिए ज़रूरी किट भी नहीं है। हम इन्सा, एल.एम.जी, स्टेन एम.सी के साथ ए.के फोर्टी सेवन, ए. के फिफ्टी सिक्स, रॉकेट लांचर से नहीं लड़ सकते। युद्ध की हमारी तैयारी भी नहीं थी पर हमें जवानों का ‘मॉरल हाई’ रखना है और ‘एनी हाउ मैनेज’ करना है।

अब तुम ही बताओ माँ सिर्फ मॉरल हाई रखने से युद्ध जीते जाते हैं क्या? हमारी सेना बिना तैयारी के लड़ाई में कूद गई है- कहाँ उनके अत्याधुनिक अंतर्राष्ट्रीय हथियार और कहाँ हमारी टुटपुँजिया संगीनें, जो ज़्यादातर कवायद के काम आती रही हैं और कुछ गोलियाँ चलाकर ही गर्म होकर जाम हो जाती है। मेरे एक साथी की रायफल तो बैकफायर ही कर गयी। उसका राउंड बैरल के पहले ही फट गया। वह अभी किसी अस्पताल में जूझ रहा होगा। उसकी एक आँख तो वहीं समाप्त हो गई थी। शायद वह बच जाए पर देख सकेगा- इसमें संदेह है। इसी तरह न जाने मेरे कितने साथी कमज़ोर हथियारों के कारण मौके पर एक्शन नहीं ले पाए और दुश्मन का निशाना बन गए। ऐसी लड़ाई में हमारी जीत कैसे होगी माँ? कैसे? हमारी कुर्बानी बेकार हो जाएगी क्या? पता नहीं यह कुर्बानियाँ किसे जिता रही हैं ? सिपाही को? सेना को? राजनीतिज्ञों को? अथवा देश को?

सिपाही प्रतिबद्ध है- अपनी जान पर खेल जाने को- उसके लिए तो आर या पार की लड़ाई होती है। बच गया तो इस युद्ध के घाव भरे और अगली लड़ाई की तैयारी शुरू और मर गया तो शहादत, तमगे, शोहरत- कभी-कभी परिवारवालों के लिए कुछ रुपए-बस। किस्सा-खत्म। उसने ज़िंदगी में क्या जीता? जब तक ज़िंदा है- कैसा है? तुम जानती हो। दूसरी ओर सेना! क्या सेना जीतती है? हाँ भी और नहीं भी। हाँ यूँ- कि युद्ध के मैदान सर करने और दुश्मन को खदेड़ देने से सेना जीत जाती है। नहीं ऐसे- कि सेना सैनिकों का परिवार है और जब एक सैनिक शहीद होता है तो सेना का परिवार कमज़ोर होता है और कोई जाकर देखे उस वीभत्स दृश्य को- युद्ध के तुरंत बाद का दृश्य- स्वस्थ, सुंदर, नौजवान सैनिक- मृत, अपंग, घायल, लूले-लंगड़े इंसानों में तब्दील होते- रोते परिवार- माँ, बाप, भाई, बहन, पत्नी, बच्चे- असहाय और बेबस। नहीं माँ! नहीं! सेना कभी नहीं जीतती। सेना तो सिर्फ खोती है, बिखरती और कमज़ोर होती है। क्योंकि सेना कभी सोचती नहीं- सोच नहीं सकती- उसे सोचना मना है- युद्ध के कारण और निदान के बारे में तो कदापि नहीं। वह तो सिर्फ करती है- आदेश का पालन। आदेश मिला आक्रमण करो- तो आगे बढ़ चली- आदेश पीछे हटने का- वापस मुड़ गई- और जिस दिन राजनीति ने तय किया- लड़ाई बंद, तो सेना- “जैसी थी वैसी” । फिर उसकी जीत हार कब होती है? सच पूछो तो ऐसे युद्ध में अगर कोई जीतता है, तो राजनीतिज्ञ, नेता, सत्ता। वे और उनके स्वार्थ- उनका कैरियर- उनकी चुनावी रणनीति- उनकी सत्ता- उनकी कूटनीति जीतती है और जीतता है उनका छल- उस जनता जनार्दन से किया गया छल- जो उनका भाग्य विधाता है- उनका दोमुंहापन, कूटनीतिक चालें, दुरभिसंधियां, भ्रष्टाचार और उनकी बगुला भगत छवि। यह सब जीतते हैं माँ और इन सब के साथ देश जीतता है, राष्ट्र जीतता है। वे राष्ट्र के, देश के प्रतिनिधि हैं न, तो फिर उनकी जीत राष्ट्र की जीत, देश की जीत, समाज की जीत, जनता–जनार्दन की जीत- करोड़ों अनपढ़–गंवारों, शिक्षित–बेरोज़गारों की जीत- यह सब किसकी बिना पर- देश की गरीब जनता- जो कभी नहीं जीतती, पर जिसकी भावनाओं से यह खेलते रहते हैं। है ना माँ!... इसीलिए देश की जीत के लिए, देश के प्रतिनिधियों की जीत के लिए- सैनिक प्राण देते हैं। यह कोई शहादत नहीं- यह जनप्रतिनिधियों की, कूटनीतिज्ञों की, राजनीतिक और व्यक्तिगत महत्वकांक्षा के लिए चढ़ी बलि है, उसकी कीमत है। जनता कभी इस चाल को समझ नहीं पाती और उनके षड़यंत्र का शिकार हो जाती है। वे कामयाबी के नए शिखर चढ़ते हुए देश की जीत-हार की राजनीति तय करते हैं। जनता हमेशा दिल से निर्णय लेती है, दिमाग से नहीं और वह हमेशा दिल खोलकर दिमाग का उपयोग करते हैं। बस यही अंतर है- उनमें और जनता में और उनके बीच कुर्बान होने को तत्पर खड़ा है सैनिक- बेजुबान, निरीह, बलि का बकरा- बलिदान होने को, शहीद होने को, मरने को।

आह ! बहुत डर लग रहा है माँ। जाने क्या-क्या लिख गया? पता नहीं चला। सूर्य कब का अस्त हो गया। मेरे पैर अब बर्फ में जम चुके हैं। बर्फ जैसे मुझे अपने आगोश में खींचती जा रही है। रोशनी मिटने में बस कुछ ही मिनट बचे हैं। और माँ! अब मुझे किसी दर्द का एहसास नहीं रह गया। मैं खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ। मेरा दर्द अब जम चुका है। मैं बहुत थोड़े समय में बहुत अधिक लिखना चाहता हूँ- पर अंधेरा अब मुझे घेर रहा है। मुझे बहुत भूख लगी है माँ। जाने कितने दिनों से भूखा हूँ। कुछ पता नहीं- क्या खाता रहा हूँ इन दिनों? कभी तो मिला ही नहीं। जैसे भूख भी खो गयी थी। तुम्हारी याद मेरी भूख जगा गई- पर अब मैं अधिक नहीं लिख सकता। अक्षर धुंधले होते जा रहे हैं। जैसे दर्द जम गया है- भूख भी जम जाएगी और कुछ देर में- मैं भी। सच मान माँ! यह अंधेरा बड़ा डरावना है, और जब तक मैं ज़िंदा हूँ मुझे डसता रहेगा- अंधेरे का डर, मौत का डर, तुझसे दूर जाने का डर। तुम परेशान मत होना माँ। यह एक अंधा युद्ध है- जो कभी भी समाप्त नहीं होता। मैं या तुम कुछ नहीं कर सकते। कुछ नहीं।

अब लिखना बंद कर रहा हूँ माँ। तुम तक पहुँच सके तो यह पत्र सभी को दिखा देना-शायद एक सिपाही की आत्मा शांति से मर सके। मुझे माफ कर देना- मैं तुम्हें बीच में ही छोड़कर जा रहा हूँ। मेरी चिंता न करना- थोड़ी देर में मेरा डर भी जम जाएगा और मैं भी- फिर सब कुछ एक जैसा- अंधेरे और बर्फ का हिस्सा। बस। अच्छा माँ! विदा... मुझे माफ कर देना... अपनी तबियत का ध्यान रखना।... अंतिम विदा। तुझे अंतिम प्रणाम...

..... तुम्हारा बेटा- बचन सिंह ।

             ***********************

कमांडर अपनी कुर्सी पर बेहद निराश, कमजोर और बेबस नजर आ रहा है। उसकी मेज पर दबा बचन सिंह का पत्र फड़फड़ा रहा है, जो टेलीप्रिंटर के रोल से फाड़े गए लंबे कागज़ के टुकड़े पर लिखा गया है। उसे कैप्टन अजय की प्रतीक्षा है। यही एक जूनियर चिकित्सा अधिकारी है जिसे वह अपना सबसे विश्वस्त मानता है और अपने मन की बातें उससे खुलकर कह सकता है। बचन सिंह के पत्र ने उसकी अंतरात्मा को झकझोर दिया है। सिपाही बचन सिंह से वह बहुत प्रभावित था। कारण, उसका माँ के प्रति प्रेम। यह पत्र पढ़ कर तो वह बचन सिंह की और इज़्ज़त करने लगा है। उसे कभी भी महसूस नहीं हुआ कि एक सिपाही भी इतना सोच सकता है, इतने गंभीर चिंतन को अपने सीने में छुपाए फिर सकता है। उसकी प्रमुख समस्या इस पत्र को लेकर है। यूँ तो इस प्रकार की वस्तुएँ फौजी के परिवार को पार्सल कर दी जाती हैं या किसी फौजी के हाथों भिजवा दी जाती हैं। लेकिन यहाँ तो समस्या ही दूसरे किस्म की है- इस पत्र को बचन सिंह की माँ के पास भेजा जाए या नहीं।

फौजियों के सारे पत्र सेंसर होते हैं- युद्ध के समय तो विशेष रूप से। अगर वह यह पत्र बचन सिंह की माँ के पास यूं ही भेज देता है, तो फ़ौज के नियमों का उल्लंघन करता है- जो कतई क्षम्य नहीं और यदि वह इसे न भेजे तो बचन सिंह और उसकी माँ दोनों के साथ अन्याय होगा- जो वह पसंद नहीं करता। इसी उधेड़बुन में बैठा वह कैप्टन अजय के आने का इंतजार कर रहा है।

      “ मे आई कम इन सर!”

      “ यस कैप्टन कम!”

      “ थैंक्यू सर!.... सर आपने पत्र पढ़ लिया?”

      “ पढ़ लिया....अजय! तुम्हीं कहो- बचनसिंह ने जो लिखा है- गलत है क्या?”     

      “नो सर गलत तो नहीं है पर इसे भेज देना ठीक रहेगा क्या?”

      “ मेरी चिंता भी यही है कैप्टन। इस पत्र ने मुझे बहुत परेशान कर दिया है। एक सिपाही भी इतना सब सोच सकता है! इतना तो मैंने भी कभी नहीं सोचा... समझ में नहीं आता क्या करूँ?”

      “ मैं भी यही सोच रहा था सर। इसलिए मैंने आपको परेशान किया, वरना आपको पहले ही कम टेंशन हैं क्या?”

      “ नहीं अजय तुमने बहुत अच्छा काम किया जो यह पत्र मुझे पढ़ा दिया। अब सोचना यह है कि इसका क्या किया जाय... तुमने एक चीज़ ग़ौर की है...”

      “ क्या सर”

      “ बचन सिंह ने इस लड़ाई की जीत के बारे में क्या लिखा है?... गज़ब का दिमाग है उसका। कैप्टन अजय! उसने बहुत सही लिखा है- सैनिक कभी जीतता नहीं, न सेना । जीतते हैं तो राजनीतिज्ञ, नेता, सत्ता, मंत्री। सेना और सैनिकों का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, किसके लिए किया जाता है? तुम्हीं बताओ कैप्टन, यदि इस लड़ाई में हम तुम जिंदा बचे भी तो क्या हम- तुम जीतेंगे? क्या अपने सैनिकों को रोज मरता देखकर हमें अपना भविष्य नहीं दिखता है? क्या बचनसिंह या सुखबीर वापस आ सकते हैं? इनकी शहादत ने इन्हें क्या दिया, हमें क्या दिया, देश को क्या दिया?”

       “ आप ठीक कह रहे हैं सर। अपनी सरहदों की रखवाली तो हर देश करता है, पर यह लड़ाई किसी देश के लिए नहीं बल्कि कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने राजनीतिक लाभ के लिए लड़वायी जा रही है। और अगर पहले से ही इसे रोक दिया जाता तो आज यह हालत नहीं होती सर।”

       “ एक्ज़ैक्टली.... कई महीनों तक इंतजार किया गया। घुसपैठिए आते रहे और युद्ध की घोषणा ऐसे समय पर की गयी जिसका लाभ उन्हें मिला। इस जीत या हार पर हमारा तुम्हारा कोई वश नहीं अजय। कोई वश नहीं। उच्च स्तरीय वार्ताएँ हो रही हैं, अंतर्राष्ट्रीय बहसें जारी हैं, दुनिया की महाशक्तियाँ इसके खिलाफ हैं- फिर भी क्या वे इसे रुकवा सकीं? उधर युद्ध रोकने के प्रयास जारी हैं, इधर मौत अपना तांडव रोक नहीं रही। मौत किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। यह ग्लेशियर, यह हिमालय की वादियाँ इस युद्ध की साक्षी हैं- इन सैनिकों के त्याग, बलिदान की साक्षी हैं, परंतु इनके बारे में किसी को चिंता नहीं। यह युद्ध ‘प्रोक्सी वॉर’ है। इसे छ: महीने पहले तक दबाया जा सकता था, जब यह बीज की तरफ फूटा था। उन्होंने इसे विशाल विष-वृक्ष बन जाने दिया और अब इसे काटना चाहते हैं। पर यह विष वृक्ष जाने कितनों को डसेगा।“

      “और सर! आजकल मीडिया जवानों की मौत को किस तरह ग्लोरीफाई कर रहा है? लोग किसी की मौत से भी फायदा उठाने से नहीं चूकते। आम जनता को किस तरह इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं? वह कभी सच्चाई तक नहीं पहुँच पाती... सच्चाई उस तक पहुँचने नहीं दी जाती।”

      “सच्चाई तो इस पत्र में भी है कैप्टन! एक सैनिक की मौत को इस तरह ग्लोरीफाइ किया जाता है पर उसका लिखा पत्र उसकी माँ तक पहुँचाया नहीं जा सकता। इसमें जो प्रश्न उठाए गए हैं- उनका जवाब किसी के पास नहीं है। उस माँ को यह पत्र भेजा जाए या नहीं? सरकार और फौज इसकी इज़ाज़त नहीं देतीं। किस खतरनाक मौसम में हम जी रहे हैं- इसकी चिंता किसी को नहीं। ज़रूरी ‘किट’ और उपयुक्त हथियारों के बिना हम किस तरह घिसट रहे हैं अजय? क्या कोई इसके विषय में सोच रहा है? मुझे बचन सिंह का चेहरा याद आ रहा है। कितना प्यार था उसे अपनी माँ से। और सुखवीर!... यह लड़ाई हम जीतें या हारें कैप्टन, क्या बचन सिंह की माँ को उसका बेटा वापस मिल सकेगा? वह तो सिर्फ हारेगी, तुम्ही बताओ कैप्टन अजय, इस पत्र का क्या किया जाए?”

     “सर, अगर यह पत्र मीडिया के हाथों लग गया तो बात बहुत बिगड़ जाएगी। पर मैं सोचता हूँ कि इसे बचन सिंह की माँ तक ज़रूर पहुँचना चाहिए, नहीं तो बचनसिंह की आत्मा को शांति न मिलेगी। लेकिन यह भी है कि हम इस समय कोई रिस्क नहीं ले सकते सर।”

     “नो नो। हमें बहुत सोच समझकर कदम उठाना है।.... यू नो अजय! जरा सी लापरवाही हमारा जीना हराम कर देगी। मुझे नहीं लगता कि हम कोई निर्णय ले सकते है....”

     “यह पत्र किसी और ने भी पढ़ा है क्या?”

     “नो सर”      

     “देन डू वन थिंग...”

     “ट्रिन ट्रिन”- फोन की घंटी बजती है... कमांडर फोन उठाता है –

     “यस......”

     “...........”

     “ओ के”

     “............”

     “ठीक है! मैं कैप्टन अजय को भेज रहा हूँ”- कमांडर फोन रख देता है।

     “कैप्टन अजय! ट्रांन्जिट कैंप में मेरी पत्नी इंतजार कर रही है। उसे चंडीगढ़ की फ्लाइट लेनी है। तुम दो एस्कार्ट और जिप्सी ले जा सकते हो- उसे एयरपोर्ट तक छोड़ दो।.... कैन यू मैनेज?”

     “श्योर सर”

     “गुड!.... और हां! तुम शाम तक वापस आ जाओगे तो अच्छा रहेगा।“

     “यस सर!.... और सर.... यह पत्र”

     “लीव इट टु मी... ओ के देन”

     “ओ के सर”- कैप्टन अजय ने जोरदार सैल्यूट ठोंका और पीछे मुड़ तेज़ चल हो लिया।

     “......... और हाँ कैप्टन अजय!....थैंक्स.......”

     “थैंक्यू सर!” 

                      *******************************************

- डॉ. रवीन्द्र कात्यायन
अध्यक्ष, हिंदी विभाग एवं संयोजक, पत्रकारिता एवं जनसंचार
मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय,
वल्लभभाई रोड, विले पार्ले (प),
मुंबई-400056.

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रचनाकार: अंतरद्वंद्व / कहानी / रवीन्द्र कात्यायन
अंतरद्वंद्व / कहानी / रवीन्द्र कात्यायन
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