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प्रमोद यादव का हास्य - व्यंग्य : नए साल का वादा

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(चित्र - नर्मदा प्रसाद टेकाम की कलाकृति)

 

‘एक बात कहूँ जी ?’ बिस्तर पर पतिदेव का सिर दबाते पत्नी बोली.

‘ हाँ..कहो..? ‘ पति आँखें मूंदे धीरे से बोला.

‘नया साल आ रहा है..बच्चों की छुट्टी चल रही है..क्यों न हम भी पी.एम. की तरह कुछ नया और अच्छा काम करें ?’

‘पी.एम. की तरह ? उन्होंने क्या नया और अच्छा कर दिया भई ?’ पति ने सवाल किया.

‘सब जानते हैं आप फिर भी पूछते हैं..अरे पिछले दिनों काबुल से लौटते एकाएक लाहौर में नहीं उतर गए थे ? ‘ पत्नी याद दिलाते बोली.

‘ तो ? ’

‘ वहां उनकी कितनी आवभगत हुई..वहां के पी.एम खुद इन्हें लेने हवाई अड्डा गए..अपने साथ हेलीकाप्टर में बिठा घर ले गए..इनके साथ अपना जन्मदिन मनाये.. उनकी नवासी की शादी थी तो उसे भी आशीर्वाद दिए..’

‘ और हमारे साहब ने उनकी माँ के पाँव छू आशीर्वाद लिए.. यही ना ? ‘ पति बोला.

‘ हाँ..बिलकुल यही..देखिये.. सारे विश्व में उनकी कितनी तारीफ़ हुई..मोगेम्बो (ओबामा) तक खुश हुए..जानी दुश्मन के घर बेखौफ उतर उन्होंने अपनी छप्पन इंची सीना होने का सही सबूत दिया..विपक्ष उनके इस नाप-जोख का हमेशा माखौल उड़ाया करते थे..अब भूलकर भी इस पर टिपण्णी नहीं करेंगे.. रिश्ते सुधारने का इनका स्टाईल पूर्ववर्ती प्रधान मंत्रियों से एकदम ही अलग और नया है..’ पत्नी एक सांस में बोली.

‘ वो तो ठीक है महारानी जी..पर फजीहत भी तो काफी हुई..उन्हीं के गठबंधन के कुछ लोग सवाल उठा रहे- वहां उतरे तो कम से कम “डान” को ही पकड़ लाते ?..तब छप्पन इंची सीने का धौंस समझ आता..दो देशों के सम्बन्ध सुधरते न सुधरते ..कम से कम हमारे सम्बन्ध तो सुधर जाते..सभी कह रहे कि बारबार चेतावनी के बाद भी जब वे सीमा पर बमबारी और घुसपैठ से बाज नहीं आ रहे तो ऐसे में उनका यूं वहां एकाएक जाना-एक तरह से सरेंडर करने जैसा है..कम से कम अवाम के लोगों से तो एक बार पूछना था जिन्होनें पी.एम.की कुर्सी पर उन्हें बिठाया...’ पति ने भी भाषण झाड़ते कहा.

‘ देखोजी..हर चीज के दो पहलू होते हैं-एक अच्छा और एक बुरा..अच्छे लोग हर काम में अच्छाई देखते हैं और बुरे लोग हर काम में बुराई..हमें तो इस दौरे में कहीं कोई बुराई नहीं दिखी ..एकाएक मन किया तो उतर गए..अब हर पल आपसे पूछते थोड़े ही रहेंगे कि जापान जाऊं कि चीन ? ओबामा को बुलाऊं कि पुतिन को ? भई..आफ्टर आल वे पी. एम. हैं..कहीं जाए...कहीं आए...पुतिन से मिलें या ओबामा से.. उनकी मर्जी..’ पत्नी हांफती सी बोली.

‘ सही पकड़ी हो..उनकी मर्जी..अब जरा अपनी मर्जी भी बता डालो..इस लम्बी-चौड़ी भूमिका का आशय बक ही डालो..’ पति ने हंसते हुए कहा.

‘ मेरी इच्छा है कि आप चार-पांच दिनों की छुट्टी लेते तो कहीं घूम आते..अरसा हो गया कहीं आये-गये नहीं..बच्चे भी बोर हो रहे..’ पत्नी प्यार से बोली.

‘बस..इतनी सी बात...चलो...तथास्तु...और खुशखबरी ये कि हमने छुट्टी आलरेडी ले ली है..हम भी चाहते हैं कि पी.एम. की तरह तीस-बत्तीस नहीं तो कम से कम एकाध-दो दौरे तो कर ही आयें..अब बताओ - कहाँ चलना है ? ‘ पति ने शेखी बघारते कहा.

‘ आगरा कभी नहीं गए जी..एक बार ताजमहल ही देख आते..देखूँ तो सही कि उस दौर के शौहरों में बीबी के प्रति इतना आकर्षण और प्रेम कैसे हुआ करता था कि बीस साल तक उनके लिए ताजमहल ही बनवाते रहे..आजकल के शौहर तो बीबी के लिए एक जून का खाना भी नहीं बना पाते..’

‘ तुम्हें शायद मालुम नहीं भागवान कि ताजमहल उन्होंने उनके मरने के बाद बनवाया था..जीते जी तो उन्होंने भी मुमताज के लिए शायद ही कभी खाना बनाया हो....पगली..सच्चा प्रेम तो मरने के बाद ही उमड़ता है..’ पति ने समझाया.

‘इसका मतलब कि अभी आप मुझसे प्रेम नहीं करते ? ‘ पत्नी बिफरी.

‘ अरे..ऐसा मैंने कब कहा ? खैर..छोडो..आगरा जाने की तैयारी करो..सुबह रिजर्वेशन करा आऊंगा..दोपहर की ट्रेन है..अब ताजमहल के विषय में कुछ पढ़कर सो जाओ..वहां मुझसे कुछ मत पूछना..( ज्यादा कुछ मुझे भी नहीं मालूम ) ‘

दूसरे दिन पति-पत्नी और दोनों बच्चे आगरा के लिए निकल गए..वहां दो दिन खूब घूमे-फिरे.. सुबह की ट्रेन से उन्हें वापस घर लौटना है..पति-पत्नी आगरा के होटल में बिस्तर पर बैठे बतिया रहे-

‘ दो दिन कैसे गुजरे ,पता ही न चला..’ पत्नी बोली.

‘ हाँ..तुम्हें न चला..लेकिन मुझे चला..जब-जब पेमेंट किया..पता चला कि मंहगाई कितनी बढ़ गई है..तुम तो ठाठ से पी.एम. की तरह नए-नए लिबास बदल घूमती रही..खाती रही..तुम्हें कैसे पता चलेगा..एंटी से नोट निकले तो पता चले कि एक दौरे में कितने दौरे पड़ते हैं ? ‘ पति बोला.

‘छोडिये भी..क्या बच्चों सी बातें करते हैं ? घूमेंगे तो खर्च तो होंगे ही ना ? अच्छा ये बताओ..अभी से घर जाकर करेंगे क्या ? दो दिन की छुट्टी तो बाकी है..अब लौटते में क्यों न रास्ते में ही एकाध ऐसी जगह रुक जाएँ जहां एक पैसे भी खर्च न हो ? ‘ पत्नी रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोली.

‘ अब उस “स्वर्ग” का नाम भी बता डालो जहां एक पैसे भी खर्च नहीं होंगे ?..’ पति ताना देते बोले.

‘ अरे..महकाखुर्द..मन्नू मामा के यहाँ..’ पत्नी बोली.

‘ पगला गई हो क्या ? चार साल से उनसे कोई बोलचाल नहीं..कोई दुआ-सलाम नहीं..अरसे से जो हिस्से-बंटवारे को ले माँ से धुंआधार लड़ते रहे, उनके घर ? बिलकुल नहीं ! वो तो हमें देखना भी पसंद नहीं करेंगे..वे घर में घुसने भी नहीं देंगे..देखते ही गोली मार देंगे..समझी ? ‘

‘ अरे..हमारे पी.एम. की तरह कोशिश तो करो..सम्बन्ध सुधरना न सुधरना बाद की बात..आप मोबाइल तो लगाओ..बात नहीं बनेगी तो सीधे बढ़ चलेंगे..’ पत्नी समझाईश देते बोली.

पति ने फोन लगाया तो रिंग गया पर किसी ने उठाया नहीं..दोबारा किया..फिर भी “नो आंसर”..अंतिम बार ट्राई किया तो आवाज आई- ‘ हेलो.. हेलो..कौन ? ‘

‘ मामाजी ..मैं..सुनील..सुनील..हम आपके यहाँ आ रहे हैं..’

‘ ठीक है.. ठीक है..आ जाओ..’ उधर से आवाज आई.

‘ मामाजी..स्टेशन पर लेने आते तो अच्छा रहता..अरसा हो गया..कहीं घर न भूल जाऊं ?..सुन रहे हैं न ?..हेलो..हेलो.. हेलो..हेलो.. ’ पति चिल्लाता रहा.

फोन कट गया..पति उलझन में कि अब क्या करे ? पत्नी बोली – ‘ जब बता दिए हैं तो जाना ही चाहिए..देखना वो हमें लेने स्टेशन जरुर आयेंगे..’

दूसरे दिन.. कस्बानुमा महकाखुर्द स्टेशन..कोई ख़ास भीड़ नहीं..एकदम ही खाली..दोपहर के एक बजे..सबके पेट में चूहे कूद रहे..मामाजी का दूर-दूर तक कोई नामो-निशान नहीं..पति-पत्नी दोनों स्टेशन के बाहर एक-दूसरे का मुंह ताक रहे..तभी एक रिक्शेवाले ने इशारा किया..वे बीबी-बच्चों और सामान सहित उस पर सवार हो मामाजी के घर की ओर रवाना हुए..कई गली-कूंचो और पुल-पुलियों को पार करते पहुंचे तो सन्न रह गए..घर के मेन दरवाजे में बड़ा सा ताला लटक रहा था..पति ने उतरकर इधर-उधर देखा..दो-चार मरियल कुत्ते और जुगाली करते गाय-बैल के अलावा कुछ न दिखा..उसने मोबाइल निकाल काल किया..तो बाजूवाले घर से एक ग्रामीण धोती-कुरता पहने..कान में मोबाइल टिकाये निकला ..दोनों “हेलो-हेलो” करते आमने-सामने हो गए..

‘ ये तो मामाजी का नंबर है जी ..’ पति ने कहा.

‘ हाँ जी..मैंने कब कहा कि नहीं है...मुझे पूरे गाँव वाले मामाजी ही कहते हैं..’ ग्रामीण ने जवाब दिया.

‘ कल मैंने फोन किया तो आपने क्यों नहीं बताया कि आप वो नहीं जो हम सोच रहे ?’

‘अरे..हमें क्या मालूम कि तुम क्या सोच रहे ? तुमने कहा-आ रहे हो..हमने कहा- आ जाओ .. ‘

‘ अच्छा..ये बताईये.. मेरे मन्नू मामाजी का नंबर आपके पास कैसे ? और घर में ताला क्यों लटका है ? कहाँ गए सब लोग ? ‘

‘ अच्छा.. अच्छा..तुम मन्नू की बात कर रहे हो..सप्ताह भर पहले ही ये मोबाइल उसने मुझे बेच दी..कोई नया सेट ख़रीदे हैं ..सिम सहित..’

‘वे हैं कहाँ ? मामीजी और बच्चे कहाँ हैं ?’

‘ अरे..मन्नू को कल ही पुलिस पकड़ कर ले गई..किसी जमीन के लफड़े को लेकर लालूराम से उनकी मार-पीट हो गई..तब से उनकी पत्नी बच्चों के साथ मायका चली गई..अब कुछ रूपये लेकर आएगी तब मन्नू छूटेगा..वैसे..तुम तो उनके भांजे हो न ?..सही समय पर इधर पधारे हो ..अब चलो ..तुम ही उसे छुड़ा लाओ ..मैं थाने तरफ ही जा रहा हूँ..चलो ..’

पति ने भूख से बेहाल पत्नी और बच्चों की ओर देखा..और मामाजी से पूछा-‘ यहाँ कोई लाज या रेस्टारेंट है क्या मामाजी..इन्हें वहीँ छोड़ आगे बढ़ते..’

‘ हाँ..हाँ..वो रिक्शा आ रहा है..उसमें बिठा दो..और तुम हमारी सायकल के पीछे बैठ जाओ..’

थानेदार को पूरे सात हजार देकर मामाजी को छुड़ाया..लाज आकर पत्नी को किस्सा सुनाया तो पत्नी लजा सी गई क्योकि इस आकस्मिक दौरे की करता-धरता वही थी..मामाजी लाज में आते ही पसर गए- ये कहते कि मच्छरों ने रात भर थाने में सोने नहीं दिया..ऊपर से कहते रहे कि एक-दो दिन रुक जाओ तो मामी को लेकर आऊं तब मिलकर जाना..जैसे ही वे खर्राटे भरने लगे..पति-पत्नी सामान बाँध लाज का पेमेंट कर स्टेशन निकल भागे और सामने खड़ी ट्रेन में बैठ वापस घर आ गए..

घर आकर भी पति-पत्नी दोनों चुप.. आख़िरकार पति ने चुप्पी तोड़ते कहा- ‘ आगरा में जितना खर्च हुआ उससे तीन गुना ज्यादा तुम्हारे “स्वर्ग” में हो गया..दो दिन और रहता तो स्वर्गीय हो जाता..’

‘ हम शर्मिंदा हैं जी.. माफ़ भी कर दो.. अब पी.एम. स्तर का कोई काम नहीं करेंगे..नए साल का वादा है..’ पत्नी सिर झुकाए बोली.

पतिदेव उसकी भोली बातें सुन हंस पड़े और उठकर उसे बाहों में भरते बोले-‘ तो चलो पति के स्तर का ही काम कर दो..नए साल की बोहनी करा दो..’

पत्नी ‘ हाय दैय्या..दिन-दहाड़े..? ‘ कहती, बांह छुड़ा शरमाते हुए भाग गई.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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