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हिन्दी और देवनागरी के कुछ यक्ष प्रश्न / आलेख / रामवृक्ष सिंह

 

डॉ. रामवृक्ष सिंह

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में कहा गया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी संघ की राजभाषा होगी। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि हिन्दी अन्य लिपियों में भी लिखी जा सकती है, किन्तु संघ की राजभाषा वही हिन्दी होगी जो देवनागरी में लिखी जाए। इस नाते हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि का चोली-दामन का या यों कहें की आत्मा और शरीर का साथ हो गया। हिन्दी यदि आत्मा है तो देवनागरी उसका शरीर। इसलिए जब-जब हिन्दी की बात होगी, अनिवार्यतः देवनागरी की बात भी होगी ही।

सरकारी स्तर पर हिन्दी और देवनागरी को आगे बढ़ाने की कोशिशें पिछले लगभग पैंसठ वर्ष से लगातार चल रही हैं। देश की पिछली दो-तीन पीढ़ियाँ इसी काम में खप गईं, किन्तु आज भी कुछ अनुत्तरित यक्ष प्रश्न जस के तस विद्यमान हैं। न केवल पुराने यक्ष प्रश्न विद्यमान हैं, बल्कि कुछ नए प्रश्न भी अकसर सामने आ खड़े होते हैं। पता नहीं, विभिन्न मंचों से आयोजित विभिन्न सम्मेलनों और बैठकों में इन पर चर्चा होती है या नहीं। किन्तु हिन्दी-सेवी होने के नाते मुझे ये प्रश्न अकसर सालते रहते हैं। इसलिए मेरा निवेदन है कि इनपर कुछ विचार कर लिया जाए।

मेरे जन्म से भी पहले से हिन्दी-प्रचारक अपने देश-वासियों से कहते रहे हैं कि हिन्दी सरल है, हिन्दी में काम करना आसान है। आप शुरू तो कीजिए। प्रचारक कहते रहे और जिन्हें हिन्दी में काम करना था, वे सुनते रहे। आज भी यही कहा जा रहा है, और आज भी लोग सुन रहे हैं। अब तक वही पुरानी बात कहते रहने की नौबत इसलिए आ रही है कि हिन्दी में काम न करनेवाले लोग आज भी बने हुए हैं। हिन्दी के सरल होने के बावजूद लोग उसमें काम नहीं कर रहे, तो क्यों? इस बात पर गौर करने की ज़रूरत है। इसका कोई बना-बनाया उत्तर नहीं हो सकता। लोग यदि हिन्दी में काम नहीं कर रहे हैं, या कम कर रहे हैं तो ज़ाहिर है कि किसी अन्य भाषा में कर रहे हैं, क्योंकि काम तो हो रहा है। और वह दूसरी भाषा है अंग्रेजी। कठिन होने के बावजूद लोग अंग्रेजी में काम क्यों कर रहे हैं? हम हिन्दुस्तानियों के लिए अंग्रेजी सीखना कठिन है, क्योंकि वह हमारे वातावरण में नहीं है, जबकि हमारी अपनी-अपनी मातृभाषाएं और उनकी लिपियाँ तथा हिन्दी और देवनागरी, हमारे वातावरण में किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। इसके बावजूद लोग अपनी मातृभाषा अथवा देश की प्रतिनिधि भाषा हिन्दी में काम न करके अंग्रेजी में काम करना पसंद कर रहे हैं तो क्यों?

मेरे तईं इसका एक ही उत्तर है। अंग्रेजी हमारे देश के लोगों के मन में गौरव-बोध जगा रही है। अंग्रेजी का इस्तेमाल करना लोगों को शान की बात लगता है। इसमें उन्हें अपनी इज्जत और मान-मर्यादा बढ़ती दिखती है। हिन्दी और अन्य भाषाओं का इस्तेमाल करके लोग खुद को छोटा अनुभव करते हैं। इसलिए हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएं, चाहे लाख सरल हों और अंग्रेजी तथा रोमन को सीखना चाहे लाख कठिन हो, लोग अंग्रेजी भाषा व रोमन लिपि सीखेंगे और उसमें काम करेंगे। लोग टूटी-फूटी हिन्दी तथा अपने ज्ञानानुसार शुद्ध अथवा अशुद्ध हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में काम नहीं करेंगे, किन्तु टूटी-फूटी, आधी-अधूरी और प्रायः अशुद्ध अंग्रेजी में काम करने में उन्हें कोई गुरेज नहीं होगा।

जब लोगों से हम हिन्दी में काम करने का आग्रह करते हैं तो वे कहते हैं- अरे क्या करें, गलती हो जाती है। ठीक से लिख नहीं पाते। यही लोग अंग्रेजी में भी ठीक से लिख नहीं पाते, किन्तु उसमें धड़ल्ले से काम करते हैं। ऐसा क्यों? उन्हें कैसे पता चल जाता है कि हिन्दी में अशुद्ध लिख रहे हैं और अंग्रेजी में अशुद्ध नहीं लिख रहे। कबीर ने कहा था- ज्ञान क पंथ कृपान क धारा। ज्ञान होने पर सही-गलत का बोध होता है, ज्ञान ही न हो तो क्या सही और क्या गलत! क्योंकि हमें हिन्दी और अपनी-अपनी मातृभाषाओं का सम्यक ज्ञान है, इसीलिए तो हम जान जाते हैं कि हमने अशुद्ध लिखा या शुद्ध। किन्तु अंग्रेजी का पूरा-पूरा ज्ञान न होने के कारण हमें पता ही नहीं चलता कि हमने ठीक लिखा या गलत, और हम लिखते जाते हैं। इससे इतना तो सिद्ध हुआ कि गलत लिखने के डर से लोग हिन्दी अथवा अपनी मातृभाषाओं में नहीं लिखते और अंग्रेजी की सही जानकारी न होने पर भी लिखे जाते हैं, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी में हुई गलती का पता ही नहीं चलता। साथ ही, इससे यह भी सिद्ध हुआ कि लोग अंग्रेजी में काम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा करना उन्हें पसंद है। अच्छा लगता है। यदि अपनी भाषाओं को लेकर हमारे देश के लोगों का यह मनोभाव है, तो निश्चय ही बहुत शोचनीय है।

सन् 1956 में पाश्चात्य विद्वान सी.ए. फर्ग्युसन ने डायग्लोसिया नाम का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इसे हिन्दी भाषा-शास्त्रियों ने भाषा-द्वैत का नाम दिया। भाषा-द्वैत की स्थिति हर शिक्षित व्यक्ति के जीवन में होती है। शिक्षित व्यक्ति अपने कार्यालयीन कार्यों, औपचारिक बातचीत, पठन-पाठन, लेखन आदि में शुद्ध, परिनिष्ठित, ग्रान्थिक/किताबी भाषा और पारिभाषिक शब्दों का इस्तेमाल करता है। वही व्यक्ति अपने अनौपचारिक संभाषणों, निरक्षरों के साथ बातचीत में अपेक्षाकृत गंवारू भाषा और लोक-प्रचलित शब्दों का इस्तेमाल करता है। जैसी स्थिति होती है, वैसी उसकी भाषा का विन्यास होता है। इसे भाषावैज्ञानिकों ने कोड-स्विचिंग कहा। औपचारिक संदर्भों में प्रयुक्त भाषा को उच्च कोड की भाषा अथवा औपचारिक कोड की भाषा तथा अनौपचारिक संदर्भों में प्रयुक्त भाषा को निम्न कोड की भाषा अथवा अनौपचारिक कोड की भाषा कहा गया। ध्यान देने की बात यह है कि दोनों ही कोडों की भाषा में केवल शब्दावली का हेर-फेर होता है, जबकि दोनों की मूलभूत व्याकरणिक संरचना एक ही रहती है। इसके विपरीत अनपढ़ व्यक्ति के पास भाषा का केवल एक कोड होता है- अनौपचारिक अथवा निम्न कोड।

राजभाषा के रूप में हिन्दी का जहाँ-जहाँ इस्तेमाल हो रहा है, उन सब कार्य-क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दावली का इस्तेमाल होना बिलकुल लाज़िमी है। पारिभाषिक शब्दों को हटाकर कार्यालयीन काम-काज नहीं किया जा सकता। इसलिए भाषा को सरल बनाने के नाम पर पारिभाषिक शब्दों को इस्तेमाल से बाहर नहीं किया जा सकता।

लेकिन आज की दफ्तरी हिन्दी कठिन है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। आज की दफ्तरी हिन्दी प्रायः पूरी तरह अंग्रेजी से अनूदित है। इसका अनुवाद जिन लोगों ने भी किया, उनके सामने अनुवाद-सिद्धान्त के कुछ प्रतिमान रहे होंगे। अनुवाद की एक परिभाषा के अनुसार- ‘एक भाषा की विषयवस्तु को बिना कुछ जोड़े या घटाए हुए दूसरी भाषा में ले जाना अनुवाद कहलाता है।’ किसी-किसी अनुवाद-विद्यालय में तो यह भी सिखाया जाता है कि स्रोत भाषा की सामग्री में जितने शब्द हैं, सामग्री के अनुवाद के बाद उतने ही शब्द लक्ष्य भाषा की सामग्री में भी होने चाहिए। किसी ने यह भी कहा कि अनुवाद केवल अर्थ का नहीं, बल्कि शैली का भी होना चाहिए। अनुवाद विद्यालय से यह सब सीखकर आने के बाद अनुवादक ने उसे व्यवहार रूप में परिणत किया। उसने न केवल स्रोत-भाषा यानी अंग्रेजी में कही गई विषयवस्तु को लक्ष्य-भाषा यानी हिन्दी में उतारा, बल्कि उसकी शैली को भी उतारा। उसने कोशिश की कि अनुवाद सर्व-समावेशी हो। न कुछ कम, न कुछ अधिक। अनुवादकों के इस प्रयास से पिछले लगभग सत्तर वर्ष के दौरान एक नए प्रकार की हिन्दी निर्मित हो गई है। यह हिन्दी कहीं-कहीं बहुत असहज और सच कहें तो बेतुकेपन की हद तक असहज है। इसे भी लोग कठिन हिन्दी कह रहे हैं। कई बार तो कहा जाता है कि इस हिन्दी को अनुवाद करके समझना पड़ता है।

तो होना क्या चाहिए? होना यह चाहिए कि हिन्दी को कठिन कहकर उससे पल्ला न झाड़ा जाए। अनुवादकों ने अंग्रेजी की तर्ज़ पर अनुवाद कर-करके हिन्दी को असहज और कठिन बना दिया। हिन्दी अनुवादकों की मौरूसी जागीर नहीं है। वह तो सबकी है, हर हिन्दुस्तानी की है। इसलिए बेहतर यह होगा कि हिन्दी को केवल अनुवादकों के रहमो-क़रम पर न छोड़ दिया जाए। उसमें लोग मौलिक रूप से काम करें। यह न हो कि अधिकतर लोग अंग्रेजी में काम करते रहें और थोड़े से अनुवाद-कर्ता उनके अंग्रेजी में लिखे पाठ का अनुवाद करते रहें। यदि अनुवाद अच्छा हुआ तो ठीक, लेकिन अनुवाद अच्छा न हुआ (जो कि प्रायः होता है) तो? इससे तो हिन्दी का स्वरूप और भी बिगड़ता चला जाएगा।

अंग्रेजी की प्रेत-छाया पड़ जाने के कारण हिन्दी का स्वरूप बिगड़ गया है। इसलिए वह सरल नहीं लगती। यह तर्क समझ आता है। लेकिन हिन्दी में से पारिभाषिक शब्दों को हटा दें, या नए हिन्दी शब्द बनाएँ ही नहीं- इससे हिन्दी सरल हो जाएगी। यह तर्क आत्मघाती है। इससे तो हिन्दी का विकास रुक जाएगा। इसका परिणाम यह होगा कि हिन्दी में अनुसंधान और विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। अनुसंधान और विकास न हो तो दुनिया की कोई भी संकल्पना आगे नहीं बढ़ सकती। सरलता लाने के नाम पर हिन्दी की प्रगति को बाधित करना कहाँ की समझदारी है?

हिन्दी की दुनिया में आज बहुत-से विदेशी शब्द आ रहे हैं। ये विदेशी शब्द अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं के साथ-साथ चीनी, जापानी आदि भाषाओं के भी हो सकते हैं। इन विदेशी शब्दों को ले लेने में कोई बुराई नहीं है। किन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं होना चाहिए कि हम केवल विदेशी शब्द ही अपनी भाषाओं में भरे जाएँ और स्वदेशी स्रोतों के शब्दों की अनदेखी करें, या जान-बूझकर उन्हें अपने भाषा-क्षेत्र से बाहर करते जाएँ। अपनी भाषाओं यानी संस्कृत, हिन्दीतर भारतीय भाषाओं और बोलियों से हमें अधिक से अधिक तत्सम, तद्भव और देशज शब्द अपने शब्द-कोशों में लेने चाहिए। न केवल लेने चाहिए, बल्कि उनका इस्तेमाल भी करते रहना चाहिए। दुःख की बात है कि हमारे बहुत-से शब्द प्रचलन से बाहर होते चले जा रहे हैं, और हमारा शिक्षित समाज उन शब्दों के स्थान पर खूब मेहनत कर-करके अंग्रेजी के शब्द प्रचलित कर रहा है। इससे क्या होगा? इससे तो हमारा स्वभाषा-शब्दकोश सिकुड़ता चला जाएगा। क्या हिन्दी और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के लिए यह प्रीतिकर स्थिति है?

लिहाज़ा, आगत शब्दों यानी विदेश से भारत आ रहे शब्दों के भारतीय प्रतिशब्द बनाने की प्रक्रिया हमें निरन्तर जारी रखनी चाहिए। सहज रूप में जो भाषा विकास हो रहा है, वह तो ठीक है, किन्तु नियोजित विकास की प्रक्रिया भी हमें पूरे जोर-शोर से जारी रखनी चाहिए और सभा-सेमिनार, प्रकाशन-प्रचार आदि के ज़रिए इन शब्दों को आम जन तक पहुँचाते रहना चाहिए। हो सके तो समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टेलिविज़न, रेडियो आदि, और सरकारी दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं आदि में इन शब्दों का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार और इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि लोगों का उनसे अपरिचय समाप्त हो जाए और वे धीरे-धीरे लोक-व्यवहार में आ जाएँ। डॉ. रघुवीर ने ऐसे बहुत-से शब्द अपनी कॉम्प्रीहेंसिव इंग्लिश-हिन्दी डिक्शनरी में सुझाए थे। उनमें से बहुत-से शब्द आज प्रचलन में हैं। हालांकि उनके बारे में हिन्दी जगत में कटूक्तियाँ भी कम नहीं हैं। तो क्या! डॉ. रघुवीर के कर्तृत्व की महानता से आज कौन इनकार कर सकता है?

जैसाकि पहले कहा गया भाषा यदि आत्मा है तो लिपि उसका शरीर। लिपि में क्षमता न हो तो भाषा का लेखन कैसे हो? हिन्दी की लिपि देवनागरी है। हालांकि इसे रोमन में लिखने के प्रयास भी हुए और वकालत भी। हाल ही में, अंग्रेजी लेखक चेतन भगत ने हिन्दी को रोमन में लिखने की वकालत की है। ज्ञातव्य है कि देवनागरी को दुनिया की सबसे सर्वांग-पूर्ण लिपियों में शुमार किया जाता रहा है। इस विषय में कुछ प्रसिद्ध विद्वानों की उक्तियाँ यहाँ उद्धृत करना समीचीन रहेगा-

· मानव के मस्तिष्क से निकली हुई वर्ण-मालाओं में ‘नागरी’ सबसे अधिक पूर्ण वर्ण-माला है। -जॉन गिलक्राइस्ट

· संसार में यदि कोई सर्वांगपूर्ण अक्षर हैं तो देवनागरी के हैं। - आइजक पिटमैन

· देवनागरी अक्षरों से बढ़कर पूर्ण और उत्तम अक्षर दूसरे नहीं हैं। - प्रो. मोनियर विलियम्स

· देवनागरी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। - राहुल सांकृत्यायन

उक्त सभी मत देवनागरी के मानकीकरण से पहले के हैं। पिछले कुछ दशकों में, और खासकर वैश्वीकरण के उपरान्त हिन्दी के शब्द-विन्यास में बहुत बदलाव आया है। मानकीकरण के पश्चात् हिन्दी वर्णमाला के पाँचों वर्गों (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, और प-वर्ग) के अंतिम वर्ण (ङ, ञ, ण, न और म) के लिए कतिपय स्थिति में केवल अनुस्वार का विधान करने के कारण बहुत विसंगतिपूर्ण स्थिति पैदा हो गई। नागरी लिपि के साथ यह समझौता इसलिए करना पडा, क्योंकि उस समय टंकण-यन्त्र के कुंजी-पटल पर स्थान/कुंजियों का अभाव था। क्या विसंगतिपूर्ण स्थिति पैदा हुई, ज़रा इसका मुजाहिरा कर लें।

परंपरागत वर्तनी

मानकीकरण के पश्चात् वर्तनी

संभावित भ्रष्ट उच्चारण (जो हिन्दी पहली बार सीखने वाला व्यक्ति कर सकता है)

कङ्घा

कंघा

कन्घा, कम्घा, कँघा

चञ्चल

चंचल

चन्चल, चम्चल. चँचल

ठण्डा

ठंडा

ठन्डा, ठम्डा, ठँडा

तन्तु

तंतु

तम्तु, तँतु

पम्प

पंप

पन्प, पँप,

पञ्चम वर्ण की छुट्टी करके अनुस्वार लाने का सबसे बड़ा नुकसान तब नज़र आता है, जब हम आगत शब्दों को देवनागरी में लिखने की कोशिश करते हैं और लिख नहीं पाते। उदाहरण के लिए निम्नलिखित शब्दों की बानगी देखें-

आगत शब्द (रोमन में)

आगत शब्द (आज के लेखन में)

आगत शब्द (परम्परागत वर्तनी में)

Hong-Kong

हाँग-काँग /हांग-कांग

हॉङ्ग-कॉङ्ग

Song

साँग/सांग/सॉन्ग

सॉङ्ग

यह एक बानगी मात्र है। किन्तु इससे इतना तो स्पष्ट है कि कुछ आगत शब्दों को लिपिबद्ध करने की क्षमता मानकीकरण के पश्चात देवनागरी में नहीं रह गई है। अब चूंकि यूनिकोड के प्रादुर्भाव के फलस्वरूप देवनागरी के पारंपरिक वर्णों का अंकन संभव है, इसलिए उन्हें पुनः प्रचलन के लिए स्वीकार किया जाए।

आगत विदेशी/स्वदेशी ध्वनियों एवं शब्दों को लिपिबद्ध करने में और भी कठिनाइयाँ हैं, जिनपर दृष्टिपात कर लेना उचित रहेगाः

आगत शब्द (मूल ध्वनि)

नागरी में लेखन

वास्तविक उच्चारण/टिप्पणी

Pen, Pain, Pane

पेन, पेन, पेन

पहले शब्द में पे का शीघ्रता से उच्चारण, दूसरे व तीसरे में पे का दीर्घीकृत यानी खींचकर किया गया उच्चारण। इसके लिए नागरी में एक चिह्न प्रयोग होता रहा है, जिसे पुनः वापस लाने की ज़रूरत है।

पराळकर

पराड़कर

बेहतर होगा हम ळ को नागरी में शामिल कर लें

कन्निमोइ/कन्निमोझि/ कन्निमोड़ि, कोझिकोड़/कोषिकोड़,

अलप्पुझा/ अलप्पुड़ा

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तमिल/मलयाली ध्वनि इ है या झि या षि या ड़ि हमें ज्ञात नहीं। संभवतः इन चारों में से कोई भी नहीं। यदि उस ध्वनि का ठीक-ठीक अंकन नागरी में करना है, तो उसके लिए हमें कोई नया लिपि-चिह्न बनाना चाहिए और ठीक उच्चारण से समस्त भारत-वासियों को अवगत कराना चाहिए।

हिन्दी को अखिल भारतीय स्तर पर कामकाज की भाषा बनाने की आकांक्षा रखनेवाले हम हिन्दी-सेवियों को देवनागरी लिपि के सामने आ रही इन सीमाओं को दूर करने के प्रयास करने चाहिए।

हिन्दी में संक्षेपाक्षर और परिवर्णी शब्द रचने की प्रवृत्ति प्रायः बिलकुल ही नहीं दिखती। हमने लगभग यह मान लिया है कि यह काम हिन्दी में हो ही नहीं सकता। इसके लिए खास तौर से देवनागरी की प्रकृति को दोष दिया जाता है, जिसमें वर्णों के आगे-पीछे, ऊपर नीचे मात्राएं लगती हैं। अंग्रेजी की लिपि रोमन में मात्राएं नहीं होतीं, इसलिए उसमें संक्षिप्तियाँ बनाना सरल पड़ता है। यह ऐसी बड़ी बाधा नहीं है, जिसे हम पार न पा सकें। आवश्यकता है तो केवल इच्छा-शक्ति की। नागरी में कुछ प्रचलित और प्रस्तावित संक्षिप्तियाँ और परिवर्णी शब्द यहाँ तालिकाबद्ध किए जा रहे हैं।

भारतीय रेल, उत्तर रेलवे, पश्चिम रेलवे, पूर्वी रेलवे, दक्षिण रेलवे, मध्य रेलवे

भारे, उरे, परे, पूरे, दरे, मरे

नागरिक उड्डयन विभाग, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण

नाउवि, भाविप्रा

राष्ट्रीय कृषि एवं वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद्

राकृवैअप

व्यावसायिक परीक्षा मंडल, केन्द्रीय माध्यम शिक्षा मंडल

व्यापम, केमाशिम

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम

सूलम उद्यम

अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक, कार्यपालक निदेशक

अप्रनि, कानि

मुख्य महाप्रबन्धक, महाप्रबन्धक, सहायक महाप्रबन्धक, प्रबन्धक, सहायक प्रबन्धक

मुमप्र, मप्र, समप्र, प्र, सप्र

सरल मोबाइल संदेश, यथाशीघ्र, प्रारूप अनुमोदनार्थ प्रस्तुत,

समोसं, यशी, प्राअनुप्र

इस बानगी से इतना तो स्पष्ट है कि हिन्दी में भी संक्षिप्तियाँ और परिवर्णी शब्द बखूबी बनाए जा सकते हैं। बस आवश्यकता है तो इस बात की कि हम अपनी रचनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए इस कमी को दूर करें और ज्यादा से ज्यादा संख्या में संक्षिप्तियाँ व परिवर्णी बनाएँ। साथ ही, हिन्दी भाषा का इस्तेमाल करनेवालों से अपेक्षा की जाती है कि वे तंगदिली त्यागकर, खुले मन से हिन्दी और देवनागरी का इस्तेमाल करें और इसकी कमियों को दूर करने में योगदान करें।

हिन्दी के लेखन के लिए प्रयुक्त देवनागरी लिपि में अक्षरों की संख्या रोमन की तुलना में दुगनी से भी अधिक है। लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि ये सभी वर्ण बहुत वैज्ञानिक पद्धति से रचित हैं। देवनागरी वर्णमाला को सीखने-सिखाने के लिए हमें वैज्ञानिक तरीका ही अपनाना चाहिए न कि चलताऊ और शॉर्टकट।

यह देखकर बहुत क्षोभ होता है कि हिन्दी-भाषा प्रान्तों में भी प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में विद्यार्थी हिन्दी के पर्चे में ही फेल हो जाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ है कि जो भाषा उनके रोज़-मर्रा के जीवन में रची-बसी है, उस भाषा को पढ़ानेवाले शिक्षक उनके मन में उस रोज-मर्रा की भाषा के लिए भी अनुराग नहीं जगा पा रहे। साथ ही, जब बच्चे छोटा आ, बड़ा आ, छोटी ई, बड़ी ई, छोटा ऊ और बड़ा ऊ कहकर हिन्दी के स्वरों और व्यंजनों की पढ़ाई करते दिखते हैं, तो बड़ा क्लेश होता है। जिस वर्णमाला को उच्चारण के अनुकूल तैयार किया गया था, उसे छोटा और बड़ा कहकर पढ़ाने की क्या ज़रूरत है? शिक्षक के लिए यह वरेण्य है कि बच्चों को सही उच्चारण के साथ अक्षर का ज्ञान कराए। इसी प्रकार ङ को ड़ पढ़ने वाले बहुत बड़े-बड़े विद्वान हिन्दी में हैं।

इस अंतिम बिन्दु से क्या सिद्ध होता है? हिन्दी के प्रति स्वयं हिन्दी-भाषियों में गंभीरता और अपनत्व की कमी है। इसे अंग्रेजी में ओनरशिप कहते हैं। भारत के हिन्दी प्रान्तों में हिन्दी से अधिक ओनरशिप तो आज अंग्रेजी की है। इसीलिए अंग्रेजी न जानकर भी लोग उसी टूटी-फूटी अंग्रेजी में गिट-पिट करते हैं और हिन्दी जानते हुए भी उसके प्रति अनभिज्ञता जताते हैं- क्या करूँ मुझे हिन्दी नहीं आती। अज्ञानता की ऐसी निस्पृहतापूर्ण स्वीकारोक्ति! हिन्दी न जानने के प्रति ऐसा निस्संगतापूर्ण दृष्टिकोण! गोया हिन्दी न जानना बड़े गर्व की बात है! इस लेख के माध्यम से मैं हिन्दी नहीं जानने वाले हिन्दुस्तानियों के समक्ष हिन्दी सीखने के लिए एक चुनौती पेश करता हूँ। जैसे आप अपनी बुद्धिमत्ता के दम पर दुनिया के अन्यान्य कला-कौशल सीख लेते हैं, वैसे ही हिन्दी भी सीखिए। यदि कम्प्यूटर पर काम करते हैं तो यूनीकोड सक्रिय करके इन्स्क्रिप्ट में उपलब्ध डीओई कुंजी-पटल पर हिन्दी टंकण सीखिए।

इस लेख के माध्यम से मैंने हिन्दी और देवनागरी के समक्ष उपस्थित कुछ यक्ष प्रश्नों को अनावृत किया है। साथ ही, उनके समाधान भी सुझाए हैं। हिन्दी जगत से मेरी प्रार्थना है कि स्वयं हिन्दी के हित में इन पर समुचित रूप से विचार करे और यदि उपयुक्त पाए तो इन्हें व्यवहार में लाए।

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