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मनोज कुमार श्रीवास्तव का आलेख - प्रकृति पुत्र हनुमान

मनोज कुमार श्रीवास्तव

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विचारशील लेखक के तौर पर ख्याति। गद्य एवं पद्य पर समान अधिकार। कविता के संसार से अलग, उनका गद्य विचार जगत की गहराईयों में जाता है। अपनी परम्परा से निरंतर संवाद करता इनका लेखन आधुनिकता के प्रचलित मुहावरों से भी बाहर जाता है। प्रकाशित कृतियां : कविता संग्रह - ‘मेरी डायरी से’, ‘यादों के संदर्भ’, ‘पशुपति’, ‘स्वरांकित’ और ‘कुरान कविताएँ’। ‘शिक्षा के संदर्भ और मूल्य’, ‘पंचशील वंदेमातरम्’, ‘यथाकाल’ और ‘पहाड़ी कोरबा’ पर पुस्तकें प्रकाशित। ‘सुन्दरकांड’ के पुनर्पाठ पर दस खण्ड प्रकाशित। दुर्गा सप्तशती पर ‘शक्ति प्रसंग’ पुस्तक प्रकाशित। सम्प्रति : १९८७ संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी।

सम्पर्क : shrivastava_manoj@hotmail.com

व्याख्या

तहां जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।

नाना तरू फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।

सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें।

वहां जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। मधु (पुष्परस) के लोभ से भौरें गुजार कर रहे थे। अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित थे। पक्षी और पशुओं के समूह को देखकर तो वे मन में (बहुत ही) प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उस पर दौड़कर जा चढ़े।

हनुमान प्रकृति के पुत्र हैं। अब वह क्षण आता है जब प्रकृति की सुषमा के एक दूसरे आयाम से साक्षात्कृत होने का मौका उन्हें मिलता है। समुद्र से धरती पर आने का आनंद। बायरन के शब्दों में कहूं कि There is a rapture on the lonely shore. समुद्रतट के अकेले किनारे हर्षोन्माद है। चंचरीक गूंज। कई तरह के द्रुम, सुमन, फल, विहग, चतुष्पद, गिरिश्रृंग। वे स्वयं वन में रहते रहे हैं तो अब वन में आ पहुंचना उनके लिये प्रकृतिस्थ होने का एक मौका है। हनुमान वहां जाकर वन की शोभा देखते हैं। वाल्मीकि ने इस अवसर पर इतना ही लिखा है ‘‘रास्ते में हरी-हरी दूब और वृक्षों से भरे हुए मकरंदपूर्ण सुगान्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्ग से जा रहे थे। तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान वनों से आच्छादित पर्वतों और फूलों से भरी हुई वन-श्रेणियों में विचरने लगे।’’ अधिकतर लोगों ने, जब वे थोड़ी देर के लिये भी वन में रुके हैं, एक नवीकृत दृष्टि एवं उद्देश्य की स्पष्टता (clarity of purpose) प्राप्त की है। कुछ लोगों को वनों में घर जैसा अहसास हुआ है। सिंहली भाषा (आखिर हनुमान वहीं तो पहुंचे हैं) में पेड़ को ‘रुकुला’ (rukula) भी कहा गया है जिसका अर्थ घर भी है। अलेक्जेंडर पोर्टिअस ने ‘फॉरेस्ट फोकलोर, माइथोलॉजी एंड रोमांस’ नामक अपनी पुस्तक में श्रीलंका का वर्णन करते हुए कहा है- The whole of the interior of Ceylon is one huge tropical forest where trees peculiar to the Tropics are found growing side by side with those of the Temperate Zone।

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तुलसी वन की बात करते हैं, पेड़ों की नहीं। वे वृक्ष-विशेष की बात नहीं करते। वे समुदाय की बात करते हैं, किसी वृक्ष-प्रजाति की नहीं। पुनः बायरन के शब्दों में There is society, where none intrudes/ By the deep sea and music in its roar। गहरे समुद्र के किनारे समाज है जिसमें किसी की घुसपैठ नहीं और समुद्री गर्जन में संगीत है। तुलसी तो संगीत के लिये अरण्य-अलिन्द को, वनभ्रमरों को चुनते हैं। अरण्य हमारी संस्कृति का केंद्र हैं। इन्हीं में हमारी संस्कृति का पालन-पोषण और विकास हुआ है। हमारी संस्कृति की मूल पहचान उसका ग्रामीण या शहरी होना नहीं है जैसा कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने हड़प्पा सभ्यता को शहरी और आर्य सभ्यता को ग्रामीण बताकर सिद्ध करना चाहा। हमारी संस्कृति आरण्यक है। ऋग्वेद के ऋषियों ने वन में ही अपने मंत्र रचे। आरण्यक तो नाम से ही वनों का सृजन लगते हैं। महावीर और बुद्ध को वन में ही ज्ञान प्राप्त हुआ। जॉन म्यूर ने शायद इसीलिए कहा होगा कि The clearest way into the universe is through a forest wilderness. वन एक अलग ही तरह की सार्वभौमता का अहसास जगाते हैं। जब हम उनसे होकर गुजरते हैं तो वे भी हमसे होकर गुजर रहे होते हैं। प्रकृति की शांत ऊर्जा जैसे हमारे भीतर भरती जाती है।

वन पवित्रता के प्रतिनिधि नहीं हैं, साक्षात् पावित्र्य हैं। वहां यदि हनुमान ने ‘देखी बन सोभा’ या ‘खगमृग बृंद देखि’ या ‘सैल बिसाल देखि’ तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ हनुमान ही दृष्टा होंगे। जंगलों का पूरा वन्य जीवन तरु, पक्षी, पशु, भ्रमर, पर्वत भी उन्हें देख रहा होगा। ऐसी जगहों पर आप अकेले भी जाएं तो आप अकेले नहीं होते। पता नहीं कितनी आँखें अपनी-अपनी जगह से आपको देख रही होती हैं। हनुमान चूंकि स्वयं वनवासी रहे हैं, इसलिए वह सेंस ऑफ मिस्ट्री तुलसी ने नहीं बताया। इस वन में तो जैसे एक संगीत तैर ही रहा है। ‘गुंजत’ में वही बात है। इतनी दूर से चले आए हनुमान की सारी थकान, सारी क्लान्ति इस वन- सुषमा को देखकर जैसे दूर हो गई होगी। हालांकि पवनपुत्र थकान जैसे शब्दों से अपरिचित है। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा था : Trees can reduce the heat of a summer's day, quiet a highway's noise, feed the hungry, provide shelter from the wind and warmth in the winter. You see, the forests are the sanctuaries, not only of Wildlife, but also of the human spirit. And every tree is a compact between generations. हनुमान को प्रकृति के बीच आकर दिल से खुशी होती है। उन्हें भ्रमरों की गुंजन भी अच्छी लगती है।

भट्टिकाव्य में भी कहा गया (२/१९) : ऐसा कोई भ्रमर न था जो मधुर गुंजार न कर रहा हो और ऐसी कोई गुंजार न थी जो मन को न लुभा रही हो। ‘न षट्पदौऽसौ न जुगुंज यः कलं/न गुंजितं तन्न जहार यन्मनः।’ हनुमान मधुकर की उस मधुर ध्वनि से मुदित हो जाते हैं। यदि ये मधु को इकट्ठा करने वाले भ्रमर हैं तो ये मादा भ्रमर ही होंगे। हनुमान रास्ते भर स्त्री-शक्ति के ही विभिन्न रूपों से ही मिलते आये हैं। उन्हें कभी सुरसा मिली है तो कभी सिंहिका। आगे जाकर लंकिनी मिलेगी। मादा मधुप को ‘वर्कर’ मधुप कहा जाता है। श्रमिक भृंग। उनका श्रम असाधारण होता है। एक पौंड मधु इकट्ठा करने के लिये वे ५५,००० मील उड़ती हैं और बीस लाख फूलों पर बैठती है। हनुमान स्वयं लांग डिस्टैन्स कव्हर कर आ रहे हैं। आगे भी वे ऐसा ही करेंगे। पूर्व में वे ऐसा करते ही रहे थे। हनुमान स्वयं वर्कर श्रेणी के हैं। आगे जाकर उन्हें भी कीट की तरह छोटा रूप ही धारण करना है। श्रमिक भृंग-कॉलोनी में सबसे छोटे होते हैं। वैसे तो इन षट्पादों में बड़े आकार वाली megapis भी होती हैं, लेकिन दक्षिण एशिया में पाई जाने वाली Apis florea जैसी बहुत छोटी पुष्पंधय भी होती हैं। Apis florea इतिहास में काफी पुराने भी माने जाते हैं। वे ‘श्रृंगार-युग्म गत’ कभी नहीं होते।

यह ध्यान दीजिए कि मधु को इकट्ठा करने वाले चंचरीक सामाजिक जीव होते हैं। वे एक कॉलोनी में रहते हैं और उस कॉलोनी में कई हजारों-५० से ६० हजार-श्रमिक-भृंग होते हैं। उनकी सम्पूर्ण कॉलोनी के बने रहने में हर सदस्य की अपनी भूमिका और अपना कर्त्तव्य होता है। वे अकेले जीवित नहीं रह सकते हैं। उनका श्रम-विभाजन समूह की आवश्यकतानुसार होता है। षट्पाद हनुमान को सबसे पहले नोटिस में आते हैं क्योंकि हनुमान भले ही इंडीवीजुअल ब्रिलियंस के अद्वितीय मुकाम पर हों, लेकिन हैं वे राम-रत समुदाय के ही अंग। वे हैं उस समाज के ही सदस्य। उस रामभक्त समाज की उत्तरजीविता के लिये समर्पित। उनका सब कुछ दूसरों के लिये है। लाला लाजपतराय कहा करते थे : No form of labour is degrading which serves social ends and which society needs. कि ऐसा कोई भी श्रम छोटा नहीं है जो सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो और समाज को जिसकी आवश्यकता हो। ये शहद की मक्खियां समाज को कितना लाभ पहुंचाती हैं, यह इसी से स्पष्ट है कि एक अनुमान के अनुसार हर साल बेहतर फसल पैदा होने- मात्रा और गुणवत्ता- में bee pollination के योगदान से अमेरिका को १४ बिलियन डॉलर का फायदा मिलता है। राजनीति विज्ञानियों ने हमेशा से इस मिलिन्द-समाज को मानव-समाज के आदर्श के रूप में देखा है।

चंचरीक-समाज से प्रेरित मानव-समाज की यह छवि अरस्तू और प्लेटो, वर्जिल और सेनेका, इरास्मस और शेक्सपीअर, मार्क्स और तोल्सतॉय में मिलती है। रामभक्तों के उस कॉमनवेल्थ में भगवान ने जो श्रम-विभाजन किया है, उसमें हनुमान को जो कार्य मिला है इसके लिये वे सारा श्रम करेंगे। श्रमिक चंचरीक पहले नये स्थल को द्मड़दृद्वद्य करते हैं, कोष्ठ को साफ करते हैं, ‘रानी’ की सेवा करते हैं, कचरा हटाते हैं, मधु को हैंडल करते हैं, प्रवेश पर पहरा देते हैं, वातानुकूलन (एयर कंडीशन) करते हैं, वेंटीलेंट करते हैं- पचासों तरह के काम। पवनपुत्र के काम भी कम नहीं।

इन मधूकों की गुंजार दरअसल इनके पंखों की फड़फड़ाहट है। इनका संगीत इनके श्रम से ही निकलता है। हनुमान जितने परिश्रमी हैं, उतने बड़े संगीत विशारद भी हैं। हनुमान को जीने की रागिनी उनके श्रम से ही मिलती है। उनका श्रम उनका सृजन है। उनका कर्म, उनकी क्रिएटिविटी। ये मधुकारी श्रमिक जब मधु और मकरंद के साथ जब अपने छत्ते पर लौटते हैं, तो वे अपना नृत्य भी करते हैं। (वॉन फ्रिस्च को भृंग-भाषा बल्कि उनकी नृत्य-भाषा की अवधारणा पर १९७३ में मेडिसिन का नोबल पुरस्कार मिला था।) हनुमान जब सफल होकर लौटेंगे तब उनके ‘सबद किलकिला’ में वही नृत्य और हर्ष होगा। वे भी जैसे waggle dance करेंगे। वही waggle run जो ये अलिंद करते हैं। प्राचीन ग्रीक लोग मधुमंडित ओंठों को सुवक्तृता और prescience से जोड़ते थे। डेल्फी की स्त्री-पुरोहित का नाम ‘डेल्फिक बी’ था। अथर्ववेद में ऋषि की अश्विन कुमारों से प्रार्थना यही है कि ऐ अश्विनो, उज्ज्वलता के देवो, मुझे मधुमंडित करो ताकि मैं लोगों के बीच ताकत से बोल सकूं। (९१/२५८)। हनुमान को आगे जाकर रावण दरबार में यही ‘फोर्सफुल स्पीच’ देनी है। मेबिन्जिअंस का शाही प्रतीक भ्रमर था जिसे वे अमरता का अर्थ देने वाला मानते थे। नेपोलियन ने इसी कारण सैन्य वर्दी में गरुड़ और मधुप का प्रतीक चिन्ह प्रयुक्त किया था। हनुमान भी चिरंजीवी हैं।

हमारे भारतीय साहित्य में भृंग को प्रायः प्रेम के संदर्भ में देखा गया है। प्रेमी के हृदय की धड़कन की तुलना भँवरे की गुंजन से की गई है। प्रबोध कुमार सान्याल का बांग्ला उपन्यास ‘बिबागी भ्रमर’ है ही इसी भ्रमर के नाम से। हनुमान का मन- मिलिन्द भी राम के पद्-पद्म में रमा हुआ है। एमर्सन (जर्नल्स, १८४३) का कहना था कि We put our love, where we have put our labour कि हमने जहां श्रम किया है, वहीं हम प्रेम करते हैं। हनुमान के संबंध में यह बात शायद उल्टी है। उनका श्रम उनके प्रेम का परिपाक है। खलील जिब्रान ने कहीं कहा है : ‘श्रम प्रेम को प्रत्यक्ष करता है। जब तुम प्रेमपूर्वक श्रम करते हो तब तुम अपने आप से, एक-दूसरे से और ईश्वर से संयोग की गांठ बांधते हो।’ हनुमान के यही गांठ बंधी हुई है। उनका श्रम उनकी रामभक्ति का साक्षात्कार है।

आर्य किसी नकारात्मक सोच के, जीवन से पलायन करने वाली सोच के कभी नहीं रहे। वेदों में ‘मधु’ को उनकी जीवन- दृष्टि की इसी सकारात्मक के प्रतीक के रूप में लिया गया है। ऋग्वेद (१/९०/७-८) में वैदिक ऋषि की प्रार्थना ही यही है कि : ‘मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिकं रजः/मधु द्यौरस्तु नः/ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां अस्तु सूर्यः/माध्वीर्गावो भवन्तु नः’ कि हमारे लिये रात्रि व उषा मधुर हों, पृथ्वी की धूलि मधुर हो, हमारा पिता स्वर्ग मधुर हो। हमारे लिये वनस्पतियां मधुर हों, सूर्य मधुर हो और पशु मधुर हो। ऋग्वेद में यह जो मधु सूक्त है, यहां मधु अस्तित्व के उस आनंद (delight of Existence) की तरह प्रस्तुत किया गया है जो समस्त प्रत्यक्षीकरण (manifestation) के मूल में है। वहां कहा यह गया है कि सत्यशोधक के लिए भौतिक समीर और psychic breath-प्राण- मधुर बहते हैं। पवनपुत्र के लिये जो सत्यशोधक हैं, ‘मधुवाता ऋतायते’ की बात सौ फीसदी सच है। उनके लिये जो वो समुद्र-संतरण करके आए हैं, और जो ‘‘जलनिधि रघुपति दूत बिचारी/तैं मैनाक होहि श्रमहारी’’ के अनुभव से भी गुजरते है। ‘मधु क्षरन्ति सिन्धवः’ की बात भी सोलहों आने खरी है। ‘मधु’ वेदों में आनंद-सैद्धांतिकी (Doctrine of Bliss) का प्रतिनिधि है। वृहदारण्यक उपनिषद् में भी मधु- विद्या है।

‘इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु। अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु/इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु। इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु’ (२/५/१-११, १२, १३)

कि यह पृथिवी समस्त भूतों का मधु है और सब भूत इस पृथिवी के मधु हैं। यह धर्म समस्त भूतों का मधु है तथा समस्त भूत इस धर्म के मधु हैं। यह सत्य समस्त भूतों का मधु है और समस्त भूत इस सत्य के मधु हैं। यह मनुष्य जाति समस्त भूतों का मधु है और समस्त भूत इस मनुष्य जाति के मधु हैं।’ इस प्रकार यह उपनिषद् मधु को अस्तित्व के सार (Essence of Existence) की तरह पेश करता है। यह जीवन के स्वीकार की अवधारणा है। यह निसर्ग या प्रकृति का - रात्रि व उषा का, पृथ्वी की धूल और वनस्पतियों का, सूर्य से लेकर पशुओं तक का स्वीकार है। यह न जीवन से पलायन है और न प्रकृति से। यहां धर्म मधु है, न कि मधु ही धर्म। इसलिए यह कोई पलायनवादी मधुशाला नहीं है। यहां मधु संचित करने में रमे हुए भ्रमर हनुमान का ध्यान वन में सबसे पहले खींच पाते हैं तो शायद इसीलिए कि हनुमान भी पलायन नहीं कर रहे, हनुमान भी पूरी निष्ठा के साथ हृदय में हर्ष धारण कर अपना काम कर रहे हैं। हृदय में हर्ष क्या ड्राक्टिन ऑफ ब्लिस की ही एक अभिव्यक्ति नहीं? सच्चे परिश्रम के बाद मधु मिलता ही है।

तुलसी जब वानस्पतिक सौंदर्य का वर्णन करते हैं तो उनका पहला जोर ‘नाना’ शब्द पर होता है। यह जोर एक ऐसे वानस्पतिक वातावरण पर नहीं है जो सिंगल-ट्री से आब्सेस्ड हो। एक ही पेड़ लगाने के वर्तमान मोहावेश से जैसे तुलसी इस एक शब्द ‘नाना’ से सावधान करते हैं। अभी कई देशों में वातावरण को कार्बन-मुक्त करने के लिये मिथेनॉल को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है लेकिन उसमें यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या एक ही पेड़ को सब तरफ लगाना जैव-विविधता का विरोधी नहीं होगा? तुलसी ‘नाना’ कहकर बाद में होने वाले यूकेलिप्टस के क्रेज के प्रति खबरदार कर रहे थे। वे ‘बायो-मॉस’ के पक्ष में थे- एक तरह के वानस्पतिक जनतंत्र के पक्ष में। जिसमें नाना तरु फल फूल हों, खग मृग ‘वृंद’ हों। कर्नाटक/केरल के पश्चिमी घाटों के उस क्षेत्र में, जहां ४०,००० हेक्टेयर भूमि से ट्रापिकल सदाबहार वन साफ कर दिये गये थे, यूकेलिप्टस का रोपण किया था। Cortecium salmonicolor फंगस ने इस एकल- वृक्षारोपण का फायदा लिया और रोपणों को साफ कर डाला। सामाजिक वानिकी की अवधारणा संभवतः मनुष्यों के समाज का वृक्षारोपण के लिये इस्तेमाल करने पर विश्वास करती थी, लेकिन स्वयं तरुओं की सामाजिकता के प्रति उतनी उत्सुक नहीं थी। उसे पेड़ की औद्योगिकता दिखती थी, पेड़ों की सामाजिकता नहीं।

वनों के पुनर्जीवन पर बल देने की जगह एकल-वृक्ष चयन को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने दुनिया भर में प्रोत्साहित किया। हमारे यहां ‘जीवन’ शब्द में ही ‘वन’ शामिल था। लेकिन अब प्राकृतिक वनों को साफ कर किए जाने वाले ‘मोनोकल्चर’ को सब्सिडी थी। हाल में यह भी देखा गया कि उद्योगों को २.५ मिलियन वन भूमि सब्सिडाइज्ड दरों पर देने की योजना आई। मोनोकल्चर को तो हमारी जीवन दृष्टि में एक तरह का विरोधाभास (oxymoron) माना जायेगा क्योंकि कल्चर ‘मोनो’ कैसे हो सकती है? जिसे हम संस्कृति कहते हैं, उसका अर्थ ही एक तरह की सामूहिकता में है। लेकिन चीन, वियतनाम, फिलीपीन्स, अर्जैन्टीना, लातीनी अमेरिका, मैक्सिको, कोस्टारिका, बेनेजुएला आदि कई दक्षिण देशों में प्राकृतिक वनों के स्थान पर औद्योगिक पल्पवुड प्लांटेशन को अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और निगमों द्वारा समर्थित और वित्तपोषित किया जा रहा है और अब हाल में इथानोल प्लांटेशन के जरिए फिर वही ‘नाना’ के प्रतिकल्प की प्रतिरोधी प्रवृत्तियां हावी हो रही हैं।

हमारा समय यदि हम बहुलतावाद का कहते हैं तो यह क्यों होता है कि खेती और वानिकी में ‘बहुलता’ निरंतर न्यून होती जा रही है? वन और उपवन से अब हम पौधारोपण तक चले आये हैं। एकल वृक्षारोपण या एकल फसल पैथोजेन (वानस्पतिक विषाणु) के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है और एक पैथोजेन सारे वृक्षारोपण को नष्ट कर सकता है। विविधता में ही सुरक्षा है। तुलसी को जो सुहाया है या उनके प्रिय हनुमान को- वह यह वैविध्य, यह नैसर्गिक समृद्धि, यह प्रकृति-प्राचुर्य है। एडवर्ड एच. सिम्पसन ने विविधता के मापन के लिये (१९४९ में) अपना सूचकांक प्रस्तुत किया और शैनन ने भी। दोनों का ही मानक अपनाया जाये या नहीं, यह स्पष्ट है कि हनुमान एक जैव-विविधता अंचल में पहुंच गये हैं।

आधुनिक पर्यावरणशास्त्र के शब्दों में हनुमान को जो चीज़ प्रसन्न करती है- वह ‘‘तरु, फल, फूल’’ का होना (incidence) नहीं, उनका प्राचुर्य (abundance) है। वैसे भी वन और वानर के रिश्ते काफी अंतरंग होते हैं। हनुमान वनचर हैं, इसलिये वनों में तरु फल फूल होना उनके मन में स्वाभाविक आह्लाद भरता है। जबकि न्यू साउथ वेल्स में यूकेलिप्टस के पेड़ों को देखकर प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री एबट किन्नी की टिप्पणी यह थी कि The general effect of the Eucalyptus 'bush' and forests is monotonous and depressing. कि यूकेलिप्टस झाड़ियों और जंगल का औसत प्रभाव बड़ा नीरस और अवसादपूर्ण होता है। इसी के साथ-साथ यह भी याद रहे कि एलवुड कूपर ने यूकेलिप्टस वृक्षों के रोपण की अनुशंसा करते वक्त कहा था : With such shelter California would become the paradise of the world. लेकिन हुआ यह कि चार्ल्स शिन ने औसत केलीफोर्नियन भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुये कहा कि Instead of the garden art that everyone wanted to see, Berkeley became for years a wilderness of tall, crowded Eucalypti and all its natural beauties were obscured. कि ‘‘उस उद्यान कला की जगह, जिसे हर कोई देखना चाहता, बर्कले लंबे, भीड़ भरे यूकेलिप्टसों का एक जंगल-सा बन गया और उसकी सारी प्राकृतिक सुन्दरताएँ ढक गईं।’’ हनुमान को तो जंगल न डिप्रेसिंग लग रहा है और न उसकी प्राकृतिक सुन्दरता किसी तरह से ढंक गई है। जीवन के जिस रिच स्पेक्ट्रम ने हनुमान का दिल खुश कर दिया, वह हम सभी का भी करता रहता बशर्ते हम उतने सम्वेदित होते। अब तो जैसे जैसे जैव-वैविध्य घटता जा रहा है, जीवन का यह सुहानापन और मनभायापन भी क्रमशः घट रहा है। आज हम सालाना ३०,००० तरु, खग, मृग प्रजातियों (बूंद) से वंचित हो रहे हैं पर हम यह नहीं देखते।

हनुमान तो फिर भी देखते हैं। तीन पंक्तियों में तीन बार देखना क्रिया का प्रयोग है। ये वे हनुमान हैं जो फिर भी आँख भरकर प्राकृतिक सौंदर्य को देख लेते हैं जबकि वे इतने व्यस्त हैं। ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहा बिश्राम’ वाले हनुमान हैं। वे सुरसा को भी अपनी जल्दी में होने की बात कहते हैं। ‘राम काजु करि फिरि मैं आवौं’ तो उनकी व्यस्तता जग जाहिर है। फिर भी वे प्रकृति के इस पावन सौंदर्य को देख ही लेते हैं। ‘देखी बन सोभा’, वन-सोभा को देखते हैं। ‘सैल बिसाल देखि एक आगे’ विशालकाय पर्वत को देखते हैं हम लोग कम से कम हनुमान की तरह व्यस्त तो नहीं, फिर भी हमारी स्थिति क्या है? What is this life if full of care/We have no time to stand and stare/No time to stand beneath the boughs/And stare as Long as sheep or cows/No time to see, when woods we pass/Where squirrels hide their nuts in grass/No time to seee, in broad daylight/Streams full of stars, like skies at night.

हेनरी डेवीज़ ने यह शिकायत तो पिछली सदी की शुरुआत के आसपास दर्ज कराई थी। तब से अब तक तो ज़िंदगी की पेस और बढ़ ही गई है। जिस तरह से कवि गिलहरी को घास में फली छुपाते देखने की बात कर रहा है, हनुमान चंचरीक जैसे छोटे से कीट के गुंजन की बात करते हैं। इन्हें अब कौन देखता है? अब या तो हम कम्प्यूटर मानीटर पर ‘स्टेअर’ करते रहते हैं या टी.वी. के पर्दे पर या कभी ‘मॉल’ के कांच से झांकती वस्तुओं पर। अब हमें जीवशास्त्र भी पढ़ना हो तो वह भी प्रकृति की क्रोड़ में नहीं होगा, प्रयोगशाला (लैबोरेट्री) में होगा। देखना ड्डत्द्मद्मड्ढड़द्य करना हो गया है। हमारे ‘मॉलों’ की ऊंचाई बढ़ रही है, पहाड़ियों का भले ही क्षरण हो रहा हो। और हम हैं कि देख ही नहीं पाते।

हमारे आसपास पृथ्वी के इतिहास का सबसे तीव्र जैव- विनाश हो रहा है लेकिन हमें दिखता नहीं है। हेकर शुकिंग एवं पेट्रिक एन्डरसन का एक निबंध है : ‘व्हाइसेस अनहर्ड एंड अनहीडेड’ इसमें वे कहते हैं : We are not hearing the voices of the dying species, as we pay no attention to the myriad life forms with which we share the planet. मिसौरी बोटेनिकल गार्डनस के निदेशक पीटर रैबन (१९८९) का अनुमान है प्रतिदिन १०० प्रजातियों का सर्वनाश हो रहा है’ लेकिन हमें नहीं दिखता। We have lost sight of the fact. एक अनुमान है कि पिछले २००० लाख वर्षों में हर शताब्दी में औसतन ९० प्रजातियों का नाश प्राकृतिक विकासात्मक प्रक्रियाओं के तहत हुआ है और विकास (ईवोल्यूशन) ने नए जीवन-रूपों को इससे ज्यादा संख्या में जन्म दिया। लेकिन आज प्रजातियों की मानवकृत (न कि प्राकृतिक) विनाश-दर इस पृष्ठभूमि से ४० हजार गुना ज्यादा कही जा रही है। अपने ही हाथों से घटती हुई चीज हमें नहीं दिखती।

इस्लामिक फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी के संस्थापक फज़लुन खालिद का कहना है कि ‘‘हम यह नहीं देखते कि हम स्वयं प्रकृति का अंग हैं और प्राकृतिक विश्व का नष्ट होना हमारा खुद का नष्ट होना है’’। इस दृष्टि-दोष के कन्ट्रास्ट में हनुमान के ‘देखने’ को रखिए। हमारी अनदेखी के सामने हनुमान के विज़न को रखिए।

हनुमान को प्रकृति के इस परिदृश्य में किसी तरह का हस्तक्षेप करते हुए नहीं बताया गया है। वे सिर्फ देखते हैं। देखने को बार-बार रेखांकित करके तुलसी यह जताना चाह रहे हैं कि प्रकृति के सारे वैभव का अर्थ, उसके होने का तर्क मनुष्य-सापेक्ष नहीं है। कोई खग है, तो उसके अस्तित्व का अपना उत्सव है। कोई मृग है तो उसकी उपस्थिति अपने आप में ही एक पर्व है। तरु इसलिए नहीं हैं कि वे मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, उनकी सत्ता की अपनी पर्याप्ति है। आते हुए कदमों से जाते हुए कदमों से भरी रहेगी रहगुज़र जो हम गए तो कुछ नहीं। यह एक चित्रपटल है जिसमें जंगल है, उसमें गुनगुन करते भ्रमर हैं, उसमें तरह-तरह के पेड़-पौधे हैं, फल- फूल हैं, पक्षी चहचहा रहे हैं, मृग कुलांचें भर रहे हैं, पर्वत श्रृंग हैं, वे मनुष्य-मात्र के लिए नहीं है। कई फूल निर्जन में खिल रहे होते हैं। कहीं न कहीं। वे इन्सान का इंतजार नहीं कर रहे। वे तो इस सर्ग के घटक हैं। सृष्टि की इस महाकविता के उतने ही शब्द जितना कोई मनुष्य है।

वनस्पति और प्राणी जगत ये दो अलग-अलग बातें नहीं हैं, भले ही दो अलग-अलग पंक्तियों में कही गईं हों। ‘‘नाना तरु फल फूल सुहाए’ है, इसी कारण ‘खग मृग बृंद देखि मन भाए’ है। दक्षिण अमेरिका का एक वर्ग कि.मी. का वर्षा-वन सैंकड़ों तरह की पक्षी प्रजातियों और हजारों तरह की कीट- प्रजातियों का घर है। दक्षिण-पूर्व एशिया का एक दस हैक्टेअर का वर्षा-वन भूखंड जितनी वृक्ष प्रजातियों को संधारित करता है, उतने संपूर्ण उत्तरी अमेरिका में नहीं हैं। पेरु में एक अकेले वृक्ष का सर्वेक्षण किया गया तो पाया कि उसमें जितनी चीटियों की प्रजातियां हैं उतनी पूरे ग्रेट ब्रिटेन में नहीं हैं। हनुमान ने आर्गेनिक डायवर्सिटी की जो ट्रेज़री, जो निधि देखी- वह संभवतः ट्रापिकल वर्षा-वन ही होगा। वह स्वाभाविक जीन बैंक या प्राकृतिक फार्मेसी रही होगी।

यह ध्यान देने की बात है कि तुलसीदास ने व्यक्तिवाची संज्ञाओं (प्रापर नाउन्स) की जगह जातिवाची नाम (कॉमन नाउन्स) लिए हैं। वे महेन्द्र पर्वत का नाम नहीं लेते हैं जबकि वाल्मीकि कहते हैं ‘‘महापराक्रमी हनुमान के द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्र पर्वत जल के स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमस्त गजराज अपने कुंभस्थल से मद की धारा बहा रहा हो।’’ और फिर वाल्मीकि एक लम्बा सा वर्णन करते हैं जबकि तुलसी ‘‘सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर’’ से काम चला लेते हैं। तुलसी ने राक्षसी का नाम भी नहीं लिया जबकि वाल्मीकि कहते हैं ‘‘इस तरह जाते हुए हनुमानजी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली विशालकाया सिंहिका नाम वाली राक्षसी ने देखा’’ तुलसी सिर्फ ‘‘निसिचर एक सिंधु महुँ रहई’’ कहते हैं, इसी प्रकार अब वे ‘‘सैल बिसाल देखि एक आगें’’ कहते हैं जबकि वाल्मीकि इस पर्वत का भी नाम लेते हैं। ‘‘महाबली हनुमान जी अलंघनीय समुद्र को पार करके त्रिकूट नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो लंकापुरी की शोभा देखने लगे’’। तुलसी तीनों जगह ‘एक’ शब्द का प्रयोग करते हैं इस तरह से वे एक प्रतिनिधित्व का निर्माण करते हैं। लगता है वाल्मीकि ने एक जीवनी लिखी है, लेकिन तुलसी ने संज्ञाओं को भी एक संबंध की तरह ग्रहण किया है। वाल्मीकि को जो राम-यात्रा लिखनी है, उसमें विभिन्न पड़ावों की अपनी विशिष्टता (पर्टिकुलैरिटी) है, लेकिन तुलसी के यहां चीजें ज्यादा अप्रत्यक्ष एवं सुझावात्मक (suggestive) है। वाल्मीकि के यहां कई बार चीजें यथातथ्य हैं, तुलसी के यहां वे एक तरह की दृश्य सतहें (perceptible surfaces) हैं जो वर्णन से कहीं ज्यादा इंगित हैं, और उनके भीतर गहरे में कुछ और छायाएं भी हैं।

बहरहाल, हनुमान को एक विशालकाय पर्वत देखने को मिलता है और वे उस पर निर्भीक होकर चढ़ जाते हैं। हनुमान को कोई एक्रोफोबिया (ऊंचाइयों से मनोविकृत भय) नहीं है, हनुमान को पर्वतों से भी भय नहीं लगता। आज अमेरिका अकेले में दो लाख पचास हजार लोगों को यह ‘पार्वतीय-भय’ ग्रसे हुए हैं। इसमें पेट में दर्द, धड़कन बढ़ जाना, कभी भी दुर्घटना हो जाने की आशंका आदि-आदि बहुत से लक्षण पाए जाते हैं। यह फोबिया पर्वतों का चित्र देखकर या किसी मूवी में पर्वत-देखकर भी हो सकता है। सिर्फ देखकर ही नहीं, उसके बारे में किसी को बात करते हुए सुनकर भी हो सकता है। क्या पर्वत अजनबीपन (स्ट्रेंजनेस) का अहसास कराते हैं? या क्या वे हमारी अत्यन्त लघुता (insignificance) को रेखांकित करते हैं? जॉन रस्किन ने पर्वतीय अवसाद (mountain gloom) नामक जो एक डार्क पेंटिंग रची है, वह अपना डर पैदा करती है। स्वयं इंग्लैंड और यूरोप के अधिकतर हिस्सों में पर्वत असुविधाजनक, सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से घृणित और खतरनाक माने जाते रहे।

आज तो मनुष्य ने पर्वतों की सबसे ऊंची चोटियों को भी छू लिया है, लेकिन पहले जब पर्वतों पर इतना मानवीय परिवहन नहीं था, तब हनुमान को पर्वतों से निर्भीक खेलते हुए दिखाना अलग बात है। एक समय था जब यूरोप की साहित्यिक कल्पना में पर्वत ‘‘प्रकृति की शर्म और व्याधि’’ (Nature's Shames and Ills) थे। वे प्रकृति के अन्यथा सुन्दर चेहरे पर व्रण, फुंसी, फफोड़े (Warts, Wens, Blisters, Imposthumes) की तरह थे। प्रायः प्रकृति में हम वही देखते हैं जो प्रकृति में देखना हमें दिखाया जाता है। ईसा की प्रथम सात शताब्दी तक यूरोप में साहित्य पर्वतों को बंजर (barren), दुर्गम (inaccessible) और अहंकारी (insolent) बताता रहा। जबकि हनुमान त्रिकूट पर भयमुक्त होकर चढ़ते हैं। शायद इसलिए भी कि भारत के पर्वतों को शिवत्व से ओतप्रोत देखा गया। भारत में पर्वत पार्वती का वास स्थान है। छोटी-छोटी पहाड़ियों तक पर देवी मंदिर हैं। पर्वतों पर भय त्याग कर चलने वाला यह भारतीय निडर क्यों न होगा? उसके तिरुपति पर्वत पर हैं। गोवर्धन धारी कृष्ण भी आएंगे। यह वह देश है जहाँ सुमेरु को सुरगिरि कहा गया। नीलगिरि को कृष्णाचल। एवरेस्ट को गौरीशंकर।

मुझे केट सेरेडी के शब्द याद आते हैं : kill the snake of doubt in your soul, crush the worms of fear in your heart and mountain will move out of your way. हनुमान ने हृदय के भीतर भय के कीड़ों को निकाल दिया है और इसलिए वे दौड़ कर इस विशाल पर्वत पर चढ़ गए हैं। दौड़ना एक धावक का काम है। पर्वतारोहण एक ऐसा क्षेत्र है जहां ट्रेक की ख्याति एथलीट से ज्यादा हुआ करती है। पर्वतों पर चढ़ना सरल नहीं है। वहां हम जीवन और मृत्यु के सीमांतों पर खड़े होते है। जीने के एक थ्रिल के साथ। रीनोल्ड मेस्नर ने पर्वतों से जुड़े भय के कारण पर प्रकाश डालते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही Mountains are not fair or unfair, they are just dangerous. कि पर्वत अच्छे बुरे नहीं होते। वे सिर्फ खतरनाक होते हैं।

माल्कम डाली ने कोलोरेडो श्रंखला के शिखर डायमंड के बारे में एक ही बात कही थी। It is high, cold, steep and most of all, intimidating कि वह ऊंचा, ठंडा और भयास्पद है। डंकन फर्गुसन का कहना है : When you climb, you always are confronted with edge. चढ़ना धार से आमना सामना करवाता है। लाओनेल टेरे का मानना था कि It is not the goal of grand alpinism to face peril, but it is one of the tests one must undergo to deserve the joy of rising for an instant above the state of crawling grubs. पर्वतों पर चढ़ने का लक्ष्य खतरे का सामना करना नहीं है यह तो एक क्षण के लिए रेंगने वाली स्थिति से ऊपर उठ खड़े होने का आनंद है, एक क्षण को यह महसूस करना कि हम सिर्फ मिट्टी के ही नहीं बने हमारे भीतर भी अग्नि है।

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(गर्भनाल पत्रिका  http://www.garbhanal.com/ जनवरी 2016 से साभार)

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