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जो रोना रोता है, सहानुभूति पा लेता है / आलेख / डॉ. दीपक आचार्य

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कर्म क्षेत्र के मामले में दो प्रकार के लोग हैं। एक वे जो चुपचाप अपने काम से काम करते रहते हैं और अपने कर्मयोग को आकार देते हुए आत्म मुग्ध व आत्मतोष के साथ जीवन जीते है।

न उपहारों की अपेक्षा रखते हैं, मुद्रा के लोभी या लालची। इन लोगों को अपने किए हुए कामों के लिए किसी से धन्यवाद तक की अपेक्षा या और कोई आशा नहीं होती।

ये ही वे लोग है जो असली कर्मयोगी हैं और इन्हीं के भरोसे हमारी सभी व्यवस्थाएं पूरी गंभीरता व शालीनता के साथ पूरी हो रही हैं।

दूसरी किस्म में दो-तीन प्रकार के लोग होते हैं। इनमें से आधे लोग अपने हर किए काम के लिए भी प्रतिफल चाहते हैं और उन कामों का श्रेय भी ले उड़ना चाहते हैं जिन कामों में इनका किंचित मात्र भी योगदान नहीं रहता।

इनकी आधी से अधिक प्रजाति उन लोगों की है जो अपने मामूली से मामूली कामों के लिए भी हर दिन ताकत लगाकर रोना रोते रहते हैं।

ये लोग कोई सा काम प्रसन्नतापूर्वक नहीं कर सकते। इनका यह रोना दिन उगने से लेकर रात तक यों ही चलता रहता है। अपना रोना रोने के लिए ये लोग न कोई संजीदा लक्ष्य समूह देखते हैं, न पात्र देखते।

जहाँ कहीं ये जाएंगे वहां किसी न किसी बात का रोना शुरू कर देंगे। इन्हें यह भान भी नहीं होता है कि उन लोगों के सामने रोना रोने का कोई अर्थ नहीं है जिनका उनके जीवन, विषय अथवा स्वभाव व कर्म से कोई सरोकार नहीं।

बहुत से लोग हैं जो कि समझदार हैं और चतुर भी। ये लोग जानबूझकर रोना रोने को अपनी आदत बना चुके हैं क्योंकि इन लोगों को अच्छी तरह पता है कि जो रोएगा वही लोगों की सहानुभूति पाने में सफल होगा। और इस मानवीय सहानुभूति का वे सारी जिंदगी लाभ पाते रहते हैं।

इन लोगों को अच्छी तरह पता है कि रोना रोने से ही सारे काम होने लगे तो फिर जीवन की दूसरी झंझटों में क्यों घुसें।

आजकल बहुत जगह लोगों ने रो-रोकर सहानुभूति पाने को हथियार बना रखा है और इस हथियार का उपयोग वे हमेशा करते रहते हैं। समझदार लोग इन रोने वालों को भले ही गलत समझते रहें मगर रोते रहने वाले लोग अक्सर फायदे में रहते हैं क्योंकि ये लोग रो-रोकर आगे बढ़ने में इतने माहिर होते हैं कि पूरे बहरूपिया अभिनय के जरिये सामने वालों को जबर्दस्त तरीके से भ्रमित कर डालते हैं।

ये अपने किसी भी प्रतिद्वन्द्वी के विरूद किसी के भी कान फूँकने पीछे नहीं रहते। ?

फिर आजकल वे लोग रहे ही नहीं कि बातों की सत्यता जानने का प्रयास करें, नीर-क्षीर विवेक को महत्व दें तथा सच्चाई व सच्चे लोगों का साथ दें, बुरों की खूब सुनें मगर न्याय व सत्य को सर्वोपरि समझ कर सटीक निर्णय करें।

इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो लोग काम तो खूब करते हैं मगर सब कुछ चुपचाप। ये लोग न अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं न अपनी बारे में कुछ कहने की पहल करते हैं।

इस स्थिति में इतना तो तय है कि भिखारियों की तरह याचना करने वाले और रोते रहने वाले औरों की सहानुभूति पाकर भले ही अपने जीवन में सफलता पा लें मगर ये लोग कभी प्रसन्नता का आनन्द नहीं पा सकते।

इनके साथ में रहने वाले लोग वर्तमान में भी रोते रहते हैं और भविष्य में भी। क्योंकि इन रोने वालों के करम ही ऐसे होते हैं कि इनके जाने के बाद भी इनके खोटे करमों की बुरी व तीखी प्रतिक्रिया हमेषा बनी रहती है।

जो रो रहे हैं, उन्हे रोने दें, उनकी जिंदगी ही रोने का दूसरा नाम है। खुद प्रसन्न रहें और औरों को भी प्रसन्न रखने की कोषिष करे। जिनके जीवन में प्रसन्नता आ जाती है कि उन्हें सब कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त होने लगता है।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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