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नैतिकता / लघुकथा / प्रदीप कुमार साह

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कौआ और तोता दोनों मित्र बैठे गपशप कर रहे थे. तभी उसी पेड़ के नीचे एक कुत्ता हाँफता हुआ आया. यह अपने दुम से जमीन के उस हिस्से की सफाई करने लगा जहाँ इसे बैठना था. कुत्ते का कार्य-व्यवहार देखकर तोता कौआ से कहा-"देखो,वह कितना नियमबद्घ है. काफी थके होने पर भी स्वच्छ्ता का कितना ध्यान रखता है."

"नियमबद्ध तो सभी पशु-पक्षी होते हैं,किन्तु वह तो नैतिकता, वफादारी और कर्तव्यपरायणता का प्रतिमूर्ति है."कौआ बोला.

"पशु-पक्षियों में कोई और जीव भी हैं जिसे स्वच्छ्ता के महत्व पता हैं?" तोता को जिज्ञासा हुआ.

"वैसे जीवों की कमी नहीं हैं जिसे स्वच्छ्ता पसन्द हैं. भैंस और हाथी नित्य स्नान करते हैं, तुम्हें भोजन में स्वच्छता पसन्द है और बिल्ली मौसी, उसे तो यह भी पता है कि मल-त्याग कहाँ करना चाहिए." यह कहते हुए कौआ उड़ चला.

"अरे मित्र, कहाँ जा रहे हो ?" तोते ने आवाज दी. किन्तु कौआ कुछ कहने के बजाय आगे बढ़कर उस रास्ते से गुजर रहे एक राहगीर पर ऊपर से विष्टा कर दिया. राहगीर गुस्से में आकर कौआ पर ढ़ेला दे मारा. पहले से सतर्क कौआ भाग गया और दूसरे पेड़ पर जा बैठा. ढ़ेले का रुख अपनी तरफ देखकर तोता बेहद डर गया. अपने प्राण रक्षा (बचाने) हेतु वह भी भागा. कौआ के पास जाकर उसने गुस्से में कहा,"मित्र, तुमने वह क्या किया ?"

कौआ बोला-"मैंने प्रत्यक्ष प्रमाणित किया कि मुझे भी स्वच्छ्ता के अहसास हैं."

"क्या?"तोता बौखला गया.

"हाँ, यदि हम स्वयं सफाई करने में असमर्थ हैं तो वह अवश्य ही कर सकते हैं कि नियत स्थान (गन्दे जगह) पर ही गंदगी डालें और स्वच्छता बनाये रखें."कौआ भोलेपन से जवाब दिया.

"तुम्हारा दिमाग फिर तो नहीं गये. वह मनुष्य था.  मनुष्य-रूप में कई बार तो ईश्वर भी अवतार लिए." तोता गुस्से में बोला.

कौआ बोला-"समस्त योनियों में नि:सन्देह मनुष्य योनी सर्वश्रेष्ठ है. ईश्वर उसे सर्वाधिक प्रतिभावान, सर्वगुण सम्पन्न और सर्वकार्य निष्पादन हेतु समर्थ बनाये. उसे विवेक दिये. इस तरह उसे प्रकृति का सिरमौर बनाया. इतना ही नहीं, समय-समय पर स्वयं उनके मार्ग-दर्शन एवं उनके आदर्श स्थापन हेतु मनुष्य-रूप में विविध अवतार लिए और विविध लीला और उपदेश द्वारा उनके कल्याण हेतु विविध नियम प्रतिपादित किये."

थोड़ा ठहर कर कौआ पुन: कहने लगा,"किन्तु मनुष्य! वह लोभवश अज्ञानी बने रहते हैं. लोभ-पूर्ति नहीं होने पर क्रोधी बन जाते हैं. इस तरह उनका विवेक खो जाता है और वे हिंसक बन जाते हैं. विवेक नष्ट हो जाने से नैतिकता भी चली जाती है. तब वह मनुष्य अनैतिक-अधम हो जाता है. ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं और सर्वकार्य निष्पादन हेतु समर्थ शक्तियों का दुरूपयोग करने लगता है. फिर वही अधमाधम इस प्रकृति हेतु अभिशाप बन जाते हैं.मनुष्य का जीवन उतना ही है जबतक उसमें विवेकशीलता और नैतिकता है. नैतिकता से रिक्त वैसे अधम शरीर और गन्दे जगह में क्या फर्क हो सकते हैं?"

कौआ की बात सुनकर तोते का क्रोध शांत हो गया. साथ ही पुन: जिज्ञासा भी जग गये कि प्रकृति क्या है, उसके गुण-धर्म क्या हैं और मनुष्य के क्या कर्तव्य हैं?

कौआ बोला-"संसार के गोचर-अगोचर प्रत्येक वस्तु सृष्टि के अंश हैं और स्वयं में लघु सृष्टि भी हैं.वही प्रकृति के अंग और अंश हैं.प्रकृति में एक विलक्षण क्षमता है. प्रकृति के सभी चीज सह अस्तित्व पर निर्भर हैं. प्रकृति नीरा भोग्य वस्तु नहीं है. यहाँ प्रत्येक चीज वह जड़ अथवा चेतन जो कुछ है प्रकृति के हिस्सा हैं,और प्राकृतिक सन्तुलन बनाकर अपने विकास के मार्ग स्वयं प्रशस्त करते हैं. "

कौआ लंबी साँस लेता हुआ आगे बताया-"मनुष्य सर्वाधिक प्रतिभाशील, विवेकवान और सर्वकार्य निष्पादन हेतु समर्थ जीव हैं.किंतु उसका अस्तित्व भी प्रकृति पर आश्रित है. अत: मनुष्य मात्र के भी कर्तव्य हैं कि प्रकृति का केवल दोहन ना करें, प्रकृति से उतना ही ले जितना उसे दे सके. प्रकृति का बिना हानि पहुँचाए सन्तुलित उपभोग करे. वह मनुष्य मात्र की नैतिकता है."

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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