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आरक्षण ----वंदन या क्रंदन/ आलेख / सुशील कुमार शर्मा

भारत में आरक्षण की शुरुआत प्रमुख कारण वंचित समाज को प्रतिनिधित्व देना था। प्राचीन काल  से दलित एवं शोषित वर्ग को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास  से आरक्षण की शुरुआत हुई ,लेकिन आज ये बहुत बड़े विवाद का विषय बन कर हमारे  समाज को बाँट रहा है। जिन्हे  आज आरक्षण मिल रहा है उन्हें ही आरक्षण के सही अर्थ नहीं मालूम,लोग सिर्फ सरकारी संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में स्थान पाने को ही आरक्षण समझते हैं। 

                आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए हैं न कि नौकरी पाने के लिए, गरीबी दूर करने की योजना के अंतर्गत जो लाभ वंचित समूहों को दिए जाते है। लोग उन्हें आरक्षण मान कर अधिकार समझते है। आरक्षण किसी चिन्हित वंचित वर्ग को मुख्य धारा  में लाने  का साधन है,ताकि तंत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के सहारे वह राष्ट्र के निर्माण में सहयोग प्रदान कर सके,ना कि नौकरी व रोजगार देकर कुछ व्यक्तियों का भला किया जा  सके। 

             संविधान के निर्माताओं का मानना था की जाति व्यवस्था के कारण  अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे हैं उन्हें भारतीय समाज में समान अवसर नहीं दिया गया इसलिए राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी कम हैं। अतः भारतीय संसद में अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण नीति का विस्तार किया गया। कम  प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिए जाति ही सबसे कारगर मापदंड माना गया तभी से जाति गत आरक्षण की शुरुआत हुए हालाँकि कम  प्रतिनिधित्व वाले समूहों की पहचान के लिएअन्य मापदंड भी रखे गए जैसे लिंग ,अधिवास के राज्य ,ग्रामीण जनता आदि। भारत में प्राचीन कल से ही दलित की पहचान का मुख्य आधार अस्यपृश्यता है। किन्तु इस अस्यपृश्यता की अवधारणा का अभ्यास पूरे देश में एक सा नहीं था। भारत के दक्षिणी भाग में अस्यपृश्यता की अवधारणा अधिक प्रचिलित थी इस  कारण दलित वर्गों की पहचान कोई आसान काम नहीं था।    

   इसलिए समस्त प्रकार का  प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए अनुसूचित जाति  को 15 % व अनसूचित जन जाति को 7. 5 % के आरक्षण का प्रावधान रखा गया जिसकी अवधि 5 वर्ष रखी गयी एवं समीक्षा के उपरांत उसे बढ़ाने का प्रावधान भी रखा गया। 

   जातियों की सूचीकरण के  कार्य का लम्बा इतिहास है ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान सन  1806 से शुरू किया गया था इसमें देश की सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विपन्न जातियों को शामिल किया जाने लगा था। 

1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई जिसमे महात्मा ज्योतिराव फुले ने निशुल्क अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

1942 में बी.आर. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के उन्नयन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महा संघ की स्थापना कर दलितों के लिए आरक्षण के रूप में  प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

1947 से 1950 तक संविधान सभा में बहस हुई एवं 10 साल तक राजनैतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए  अनुसूचित जाति  एवं अनसूचित जन जाति के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किये गए एवं हर दस साल बाद संविधान में संशोधन कर इन्हे बढ़ा दिया गया। 

   1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारशें लागू  कर आरक्षण विरोधी आंदोलन के शोलों को भड़का दिया। 

1991  में नरसिम्हा राव सरकार ने अगड़ी जाती के कमजोर लोगों को 10 % आरक्षण शुरू किया। 

2008 में सर्वोच्च न्यायालय ने "क्रीमी लेयर "को आरक्षणनीति के दायरे से बहार रखने का फैसला लिया।

     साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रकार के आरक्षण को 50 % तक सीमित कर दिया क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का मानना  था की इस से अधिक आरक्षण  में समान अधिगम सुरक्षा का उल्लंघन होता है।

दरअसल संविधान की नीति एवं आरक्षण का प्रावधान तो सही था लेकिन समय के साथ ये नीति राजनीति बन गई। आरक्षण का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जाने लगा। आरक्षण पर वोट बैंक की राजनीति हावी हो गयी ,समाज को बाँट कर राजनैतिक लाभ लेने का माध्यम आरक्षण बन चुका है। आरक्षण की सुविधा को लोग अधिकार मान बैठे हैं। एवं दलित गावों में बैठा अभी भी प्रतिनिधित्व को तरस रहा है।दूसरी और मलाईदार फायदा उठा कर अपनी पीढ़ियाँ सँवार रहे हैं। 

आरक्षण के समर्थन में तर्क ------

आरक्षण समर्थकों का तर्क है की पिछले हज़ारों सालों की असमानता सिर्फ कुछ वर्षों की आरक्षण नीति से नहीं बदलने वाली है। आरक्षण कम प्रतिनिधित्व वाली जाति समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का एकमात्र साधन है।  आरक्षण वास्तव में वंचित समूहों एवं हाँसिए  पर पड़े लोंगो के सफल जीवन जीने में मददगार है। प्रतिनिधित्व या आरक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों के दलित समाज देश की मुख्य धारा में जुड़ सकेंगे एवं आरक्षण के द्वारा प्रतिष्ठित हो कर समाज में ऊँचा  स्थान मिलेगा जो उन्हें पिछले हज़ारों वर्षों से नहीं मिला। आरक्षण से जातिगत भेदभाव ख़त्म हो सकेगा।

आरक्षण के विरोध में तर्क ------

आरक्षण विरोधियों के अनुसार आरक्षण संकीर्ण राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है। आरक्षण प्रतिभाशालियों का दमन करता है व  उद्देश्य की गुणवत्ता को कम करता है। अगड़ी जाति के गरीब पिछड़ी जाति के अमीरों से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पीछे हैं। वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण सबसे गरीब व पिछड़ी जाति है। हज़ारों वर्षो से भिक्षा यापन करके अपनी जिंदगी जीते है।  आरक्षण की नीति से प्रतिभा पलायन में वृद्धि हुई  है। प्रायवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई  प्रावधान नहीं है ,इस कारण सरकारी संस्थान गुणवत्ता में पीछे रह जाते हैं।

         भारतीय समाज में ऊँच  नीच के मायने जाति आधारित हैं लेकिन अन्य कारकों को भी नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। आरक्षण का निर्णय उद्देश्य के आधार पर होना चाहिए। जिस दलित समूह या वंचित समूह को प्रतिनिधित्व देना है  अंतिम सदस्य तक इस सुविधा का लाभ पहुंचना  चाहिए,जो नहीं पहुंच रहा  है। एक उच्च अधिकारी ,विधायक, मंत्री जो  वंचित जाति से हैं क्या उनकी पीढ़ियों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए ? या जो वह लाभ गावों में बैठे सबसे दलित गरीब जो उसी वंचित समूह से है उसे मिलना चाहिए ये एक यक्ष प्रश्न  है।  सरकार को प्राथमिक शिक्षा पर यथोचित  महत्व देना चाहिए एवं आरक्षण को समाप्त करने के लिए कोई दीर्घकालिक योज़ना सभी पक्षों की सहमति से तैयार करना  चाहिए। जिन वर्गों  को आरक्षण  से बाहर रखा हैं उन वर्गों की भावनाओं को ध्यान  में रख कर उनके गरीब एवं प्रतिभा शाली  समूहों के लिए कोई कारगर नीति बनाना चाहिए ताकि उन्हें ये न लगे की उनके अधिकारों को छीन कर किसी और को दिया जा रहा है। वरना हरियाणा में जाटों ,राजस्थान में गुर्जरों एवं गुजरात में पाटीदारों के आंदोलनों की तर्ज पर देश के कई भागों में ये आक्रोश सरकार एवं देश के लिए नुकसान दायक हो सकता है। 

जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए एवं सामाजिक असमानता को मिटाने के लिए समग्र राष्ट्रीय चेतना को सामने रख कर सद्भाव पूर्ण माहोल तैयार करना चाहिए। 

      दलित एवं शोषित हर वर्ग हर जाति में हैं अगर हम राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ती एवं व्यक्तिगत हितों को त्याग कर  सभी जातियों के गरीब एवं शोषितों  के उत्थान के लिए उनको राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए संकल्पित हो जावें तो शायद  ये सामाजिक टकराव ,वैमनश्यता  दूर कर एक समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं।

   सुशील कुमार शर्मा

       ( वरिष्ठ अध्यापक)

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आरक्षण के सन्दर्भ में आपका यह लेख उन राजनीतिज्ञों के लिए एक सन्देश के रूप में हम जैसे युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो राजनितिक लाभ साधन के रूप में इसका प्रोयोग करते हैं।
जो कि आज के प्रतिभाशाली युवाओं के ज्ञान पर आरक्षण रूपी कुठाराघात है।

आरक्षण के सन्दर्भ में आपका यह लेख उन राजनीतिज्ञों के लिए एक सन्देश के रूप में हम जैसे युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो राजनितिक लाभ साधन के रूप में इसका प्रोयोग करते हैं।
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Subject ko vyapakta se prastut karne k liye thanx

आरक्षण के इस लेख से हमारे सोये हुए नेता जागेगे और निति मे सुधार होगा

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