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कामिनी कामायनी का आलेख - संस्कृत एक भाषा ही नहीं ,एक संस्कृति भी

संस्कृत सनातन धर्म ,बुद्ध धर्म ,और जैन धर्म की एक पवित्र भाषा ही नहीं ,दर्शन ,शास्त्र , इतिहास और साहित्य भी है । यह इंडो आर्यन परिवार की एक अत्यंत परिष्कृत भाषा है ।

इसका इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है ।करीब दो हजार वर्ष से भी ज्यादा का प्रमाण इतिहास कारों के पास उपलब्ध है । पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया महाद्वीप पर इसका प्रभाव रहा है । प्राचीन वृहत भारत मेइसका आधिपत्य प्रत्यक्ष देखा जा सकता है । \पाणिनी लिखित व्याकरण ,जो चौथी सदी ईसापूर्व लिखी गई थी ,इसका स्थान विश्व के अन्य भाषाओं के [लैटिन ,रोमन] ग्रामर से ज्यादा ऊंचा रखा  गया है । भारतीय महाद्वीप के अधिकांश भाषाओं पर इसका गहरा प्रभाव है ,भारत की सभी भाशाओं की यह जननी मानी जाती है ।इन्डोनेशिया ,कंबोडिया ,वियतनाम ,लाओस ,थाईलैंड ,मलेशिया आदि में इसका प्रभाव देखा जाता है । 

  प्राचीन काल में इस  देव भाषा का अभूत पूर्व विकास हुआ था । महान और अपौरुषेय वेदों की रचना इसी भाषा में हुई थी ।

रामायण ,महाभारत ,जैसे महाकाव्य भी इसी भाषा में लिखी गई । इसके अलावा ,विश्व प्रसिद्ध कहानियाँ ,पंचतंत्र ,कथा सरितसागर,बैताल पचिसी ,सिंहासन बत्तीसी ,विक्रम चरित ,आदि अभी तक अपनी गरिमा बनाए हुए है ।नैतिक और राजनीतिक शिक्षा से आप्लावित नीति शास्त्र और  हितोपदेश मानव जीवन के पथ को सुगम्य बनाने के लिए सदा सर्वदा के लिए ज्योतिमय रहेगा । कालिदास की तुलना अङ्ग्रेज़ी लेखक शेक्सपियर से की जाती रही है ।उनकी कृतियाँ ,अभिज्ञान शकुंतलम ,मेघदूत ,कुमार संभव ,रघुवंश ,कथा के साथ इतिहास को भी प्रस्तुत करती है । भारवि ,शूद्रक ,सोमदेव ,माघ आदि अनेक महान कवियों ,लेखकों की गाथाएँ अपने आंचल में समाहृत किए यह गौरवान्वित है । गीता जो हिंदुस्तान का प्राण है, संस्कृत में ही है । सनातन ,बौद्ध और जैन धर्म के जितने भी तंत्र ,मंत्र हैं ,सब इसी भाषा में हैं । इस भाषा में लिखी गई अनेक अमूल्य पांडुलिपियाँ ,जिसमें संसार का सार ,जीवन का फलसफा ,विज्ञान का रहस्य अंतर्निहित था ,अतीत में दुष्ट आक्रमण कारिओ द्वारा नष्ट कर दिए गए थे ,नालंदा ,और तक्षशीला जिसकी याद में आज तक आँसू बहाती मूक साक्षी  के रूप में धरती और आसमान के बीच खड़ी है ।इस पर भीषण कुठाराघात के अनेक लोम हर्षक कथाएँ आज भी इतिहास कारों ,विद्वानों के माध्यम से जब प्रगट होती है ,हमारी आँखें ,हमारे कान ,हमारी चेतना सब कुछ विस्मय से भर जाते हैं ।

   अठारहवी सदी से जब पाश्चात्य जगत को इस विलक्षण भाषा की जानकारी हुई ,तब उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ । अनेक अंग्रेज़ विद्वानों ने इसकी रचनाओं का अपनी भाषा मे अनुवाद किया । जर्मन विद्वान मैक्समूलर तो संस्कृत से इतने  प्रभावित थे कि वे यहाँ आकर ,इस भाषा को अपने मानस प र लपेट कर ,ऐसे  रच बस गए कि उन्हें भारतीय आर्ष ऋषि ही कहा जाने लगा था ।  शकुंतलम का जिस जमाने मे सर विलियम जोंस ने अनुवाद किया ,उसकी भूरी भूरी प्रसंशा हुई । जाने माने विद्वान और बंगाल के तत्कालीन एडवोकेट जेनरल जो बाद मे {1915 }मुख्य न्यायाधीश भी बने ,ने अपना एक संस्मरण लिखा है । उन्हें यह जानकार हैरानी हुई थी कि संस्कृत को ब्रिटिश भारत में क्यों नहीं पढ़ाई जाती है ? बाद मे ,जब उन्हें पता चला कि विश्व विद्यालयों में संस्कृत को अङ्ग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई जाती है ,और अंग्रेजों द्वारा तैयार व्याकरण ऊंची कीमत पर उन्हें खरीदनी पड़ती है ,तो उन्हें बहुत दुख हुआ था । उनका मानना था कि  पाणिनी ,पतंजलि ,के महाभाष्य ,भोपदेव ,सिद्धांत कौमुदी ,लघु कौमुदी ,आदि व्याकरण के उच्च स्तरीय पुस्तक के बाद और क्या चाहिए था । एक अन्य आंग्ल विद्वान ने लिखा कि उसने अपने देश में संस्कृत पढ़ा था ,लेकिन जब यहाँ आकर दुबारा पढ़ा ,तो वाकई बहुत बदला हुआ था । उसने यह भी लिखा कि भारतीय को संस्कृत कौन पढ़ा सकता है ? ये तो खुद प्रकांड पंडित हैं इस भाषा के । वास्तव में यह एक अत्यंत समृद्ध भाषा है ।यहाँ एक एक वस्तु के लिए कई कई  नाम हैं ,जैसे धरती के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करने के लिए इसके 65 नाम हैं ,इसी प्रकार पानी  के लिए 67 नाम और बादल और वर्षा के लिए 250 के करीब नाम हैं ।कमल के लिए ,राजा के लिए ,स्त्री के लिए एक से एक लावन्यमयी ,और खूब सूरत नाम हैं ।कहने का तात्पर्य है ,कि इसमें किसी भी बात को विविधता पूर्ण और गहराई से अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है ।

     उपनिवेश काल में इस भाषा का बड़ा भारी नुकसान हुआ । स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने इस पर ध्यान देने की सोची ,।अब  यह भारत के 22 भाषाओं में एक है । इस भाषा में उत्कृष्ट मौलिक लेखन के लिए सन 1967से साहित्य अकादेमी ने एक पुरस्कार भी घोषित किया है । सन 2001 के जनगणना में 14,135 लोगों ने अपनी मातृभाषा संस्कृत दर्ज करवाई थी । भारत के कुछ गाँव जो इस भाषा को पुनर्जीवित करना चाहते हैं ,संस्कृत सीख कर उसे दैनंदिनी की भाषा मे इस्तेमाल करना चाहते हैं ,उनमें से कुछ के नाम हैं मत्तूर [शिमोगा जिला ]कर्नाटक ,झिरी {रायगढ़]  मोहद नरसिंहपुर जिला मध्य प्रदेश ,गोंडा [बंसवारा जिला] राजस्थान ,श्याम सुंदर पुर ओड़ीसा , कापेरान ,[बूंदी जिला ]राजस्थान ,खाड़ा ,बनवारा जिला राजस्थान ,बवाली बागपत ,उत्तर प्रदेश ।

  संस्कृत भाषा में तकरीबन 90 साप्ताहिक ,पाक्षिक और मासिक पत्रिकाएँ छपती हैं ।सुधरमा ,जो प्रतिदिन प्रकाशित होने वाला अखवार है ,मैसूर से निकलती है ,एक दो ,अखबार गुजरात से भी निकलती है ।

  सन 1974 से  आकाश वाणी से संस्कृत में आधे घंटे का एक समाचार बुलेटिन भी प्रसारित किया जाता रहा है ।और टीवी तथा इंटरनेट पर भी संस्कृत समाचार प्रसारित किया जाता है ।

सन 2002 से देश मेन अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत  उत्सव मनाया जाने लगा है ।

देश मे अनेक संस्कृत विद्यालय और विश्वविद्यालय भी स्थापित किए गए हैं ।उत्तराखंड की दूसरी राजभाषा संस्कृत को बनाया गया है ।मगर ये सारे प्रयास सागर में एक बूंद की तरह है ,और  इसकी प्रतिष्ठा,उस महान स्वप्न  को हकीकत मे बदलने के लिए रात और दिन एक करना पड़ेगा ।

  सन 2011 के 5 जनवरी को केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा यह आदेश जारी किया गया था कि केंद्रीय विद्यालय मे कक्षा 6 से कक्षा 8 तक संस्कृत के स्थान पर जर्मन भाषा पढ़ाई जाएंगी ।इसका दिल्ली के संस्कृत शिक्षक संघ द्वारा विरोध किया गया ।मामला कोर्ट तक पहुँच गया । संस्कृत के स्थान पर विदेशी भाषा को पढाना सरकार के त्रिभाषा सूत्र का उल्लंघन है ही ,साथ ही ,सन 1968 मेनबनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सन 2005 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति का भी उल्लंघन है । दिल्ली उच्च न्यायालय ने संस्कृत के पक्ष में फैसला देकर एक सही और समयानुकूल कदम उठाया है । संस्कृत केवल शब्द रूप और धातु रूप नहीं है ,इसकी गहराई में जाकर ,इसे पूर्ण गरिमा के साथ व्यवहार में लाने का वक्त आ गया है । अगर इसे विद्वान और विशिष्ट लोग पूरे मनोयोग से रोचक कथाओं का सहारा लेकर   स्कूलों से पढाना प्रारम्भ कर दें ,सेमिनार करें ,सरकार की ओर से यथोचित प्रोत्साहन मिले ,लोग , अभिभावक, जन सहयोग करें , इसे अर्थकरी विद्या बनाया जाए ,तो हमारे समाज का गौरव पूर्ण अतीत, वर्तमान और भविष्य में बदलते देर नहीं लगेगी ।

   कामिनी कामायनी ।

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