विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

पल रहे हैं दया पर / आलेख / डॉ. दीपक आचार्य

यह कहना सरासर गलत होगा कि अब कलियुग की छाया के चलते मानवता, करुणा, सहनशीलता और दया नहीं रही। 

आज भी सब जगह किसी न किसी पैमाने पर यह सारी खासियतें विद्यमान हैं। हो सकता है कुछ लोग वाकई इस प्रकार के हों जो नितान्त जरूरतमन्द हों और जिन्हें अपनी मदद या दया की आवश्यकता हो लेकिन बहुत सारे लोग हैं जो मानवीय मूल्यों, मैत्री, करुणा, दया और सहिष्णुता का फायदा उठाने में पीछे नहीं हैं।

यों कहा जाए कि खूब लोग हर जगह ऎसे विद्यमान हैं जो कि हर तरह से सक्षम हैं और उन सभी कार्यों को करने में समर्थ हैं जो कि आम इंसान कर सकता है लेकिन ये लोग जानबूझकर करना नहीं चाहते।

कारण साफ है कि जो उदासीन बने रहना चाहता है, जो इंसान जानबूझकर काम नहीं करना चाहता, हर काम को टालना चाहता है अथवा कामों को भार समझ कर करना चाहता है वह इंसान अपने जीवन में सारे के सारे लाभख् सुख-सुविधाएं, पारिश्रमिक और सारे लाभ तो लेना चाहता है लेकिन काम नहीं करना चाहता।

इस किस्म के लोग अपने बारे में यह भ्रम फैलाए रखते हैं कि उन्हे कुछ नहीं आता और उन्हें काम दिए जाने का सीधा सा मतलब यह है कि काम को बिगाड़ना या विवादित कर डालना। इस स्थिति में कोई भी समझदार इंसान नहीं चाहता कि इन्हें काम देकर बिगाड़ा किया जाए और अपनी तथा संस्था की छवि खराब की जाए।  इसी का फायदा उठाते हैं ये लोग।

इस मामले में ये लोग हमेशा लाभ में रहते हैं। एक तो कोई काम देना पसंद नहीं करता, दूसरे हमेशा मुक्त रहते हैं, कोई जवाबदारी या जिम्मेदारी नहीं और पैसा पूरा का पूरा। और वह भी बिना किसी काम-काज के।

इस प्रकार के लोगों का जमावड़ा अब ज्यादा होने लगा है जबसे समझदारों को यह लग गया है कि इस तरह उदासीन और निकम्मा होकर जीना कितना निरापद है। जिसमें बिना काम के सब कुछ प्राप्त होता रहता है। कोई रोक-टोक नहीं। कोई काम देना नहीं चाहता, न ये खुद काम करना चाहते हैं।

हर जगह कुछ न कुछ लोग ऎसे मिल ही जाएंगे जो अपने आपको मूर्ख, काम बिगाड़ू और उदासीन मानकर संसार के सारे मजे ले रहे हैं। इसका खामियाजा बेचारे वे लोग भुगत रहे हैं जो निष्ठा और ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करते हैं और दिन-रात काम के बोझ के मारे तनावों में जीते हैं। न घर-बार के लिए उपयोगी हो पा रहे हैं, न समाज या अपने क्षेत्र के लिए।

दिखने में ये लोग इतने सीधे, भोले और मासूम लगते हैं जैसे कि इनके मुकाबले सीधा और सज्जन-शालीन और कोई हो नहीं। लेकिन वास्तव में ये लोग शातिर, चालाक और धूर्त किस्म के होते हैं जो सारी दुनिया को गच्चा देकर मूर्ख बनाने की कला में इतने पारंगत हो जाते हैं कि निकम्मे रहकर पूरी जिन्दगी ऎशो-आराम से निकाल देते हैं और लोगों को इनकी असलियत का पता तक नहीं चलता।

एक इंसान के रूप में पैदा होने वाले लोग किसी की दया पर जिन्दा रहें, यह इंसानियत के नाम पर कलंक तो है ही, भगवान भी इन नालायकों और कामचोरों को लेकर खफा रहता है। अपने आस-पास भी देखें, ऎसे उदासीन और महान लोग मिल ही जाएंगे जिनके पास काम नहीं करते हुए भी सब कुछ पा जाने का तिलस्म है और वह है दूसरों की दया पर जिन्दा रहने का।

लानत है इन लोगों को। इन्हीं के कारण समाज और देश पिछड़ता जा रह है। देशवासियों का टेक्स इन नालायकों पर खर्च हो रहा है और नतीजे में कामचोरी, हरामखोरी और नालायकी के सिवा और कुछ नहीं।

---000---

दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget