शनिवार, 16 जनवरी 2016

चूड़िहारा / लघुकथा / कामिनी कामायनी

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चूड़िहारा ।

“दा’ दी’ । बाहर दालान पर रखे चौकी पर बैठी दादी ने इस सुमधुर आवाज पर ,अपने सिर का पल्ला ठीक करते हुए पीछे मुड कर देखा ,तो नदीम को देखते ही क्रोध से भर गई “आज कोई भी कुछ नहीं लेगी ,पहले ही बता दे रही हूँ ,अपना टोकरी माथे से मत उठाओ नीचे । बहुरिया सब नैहर गई है ,बेटी सब ससुराल, देवरानी ,जेठानी , , ,।”  लेकिन उसपर दादी के तीव्र से तीव्र व्यंग बाण का कोई असर कभी हुआ था जो आज होता । उसने सामने बैठे गंगे से टोकरी पकड़ कर उतर वाने को कहा और फिर वहीं चौकी के नीचे बैठ गया “ बुढ़ीया दादी को आज किसने सताया है जरा कोई हमको भी तो बताए, ये देवी मैया तो हमेशा शांत रहने वाली ,आज क्यो सूरज महाराज के साथ मिलकर आग उगलती ज्वालामुखी बन बैठी हैं । सब पता है हमको ,जमाना खराब है ,बहुओं को सास फूटी आँख नहीं सुहाती होगी ,इसलिए बुढिया दादी को आज भोजन नहीं मिला होगा ,अब भूखे पेट अंतड़ियाँ तो कुलबुलाएँगी ही न ,लेकिन हमसे क्यों मुंह फुलाए हैं ,हम त, कुछ नहीं बिगाड़े ,आपके तो हम  भी बा ल बच्चे ही हैं ,तनिक पा नि ओ  नहीं पिलाइएगा ,देखिए ,कैसा चांडाल सा धूप है ,तीन कोश पैदल चलते हुए आपही  के शरण मे तो आए हैं ।” अब दादी का गुस्सा कहाँ ,खाली पानी कैसे दें ,बाड़ी से नींबू तोड़ कर आता ,चीनी आती ,शर्बत बनती ।

    इस बीच लड़ियों मे गूँथे फूल की मालाओ की तरह चूड़ियाँ निकाल निकाल कर नीचे रखने लगता । घर के खिड़की ,दरवाजे के पर्दे हिलते,तो उसकी अनुभवी आँखें अंदर तक झांक जाती “बहुरिया रानी घरे मे हैं तीन महिना पहिले उनको चूड़ी पहना कर गया था ,दो चार ही बचे होंगे हाथ मे। ये लाल नवलखा चूड़ी खास बहुरिया रानी के लिए ही लाए हैं ,कहाँ हैं ,जरा जल्दी से तो आइए । आ’ बड़की दीदी कहाँ गई ,हरी चमकीली चुड़िओ का फरमाइश था उनका ,छोटकी बहिन ,पीसी माँ ,बड़की काकी ,सब के लिए मन पसंद चूड़ी खास फैज़ा बाद से मँगवाएँ हैं” ।वह अपना असर पसार फैला ता  कि चा रो तरफ  अड़ोस पड़ोस मे भी हल्ला हो जाता । कोई झाड़ू वहीं पटक कर भागती आती, कोई जलती चूल्हे से लकड़ी निकाल आग बुझा भात का  अधन नीचे उतार कर घूँघट ठीक करती हड़बड़ करती पहुँचती ,कोई बच्चे को गोदी मे लिए आ खड़ी होती । बच्चियाँ और महिलाओं से घिरा वह बड़े इतमीनान से अपनी दुकान दा री करता “हे दीदी ,आप ये नीला रंग पहनिए ,गोरे गोरे पतली कलाई मे बहुत शोभेगा ,दुल्हाजी बहुत मानेंगे ।पैसे की चिंता मत करिए ,हम कोनो भागे जा रहें हैं । छ महीने के बाद ,अगहनी फ सल पर देदीजिएगा” । “हे यह डिब्बा वाला चूड़ी हम डाकदरसाहब की मेम को पहना के आएँ हैं . .अंगरेजीन है ,ले किन हमारा चूड़ी देखकर लाल गूढ़हल के फूल की भांति खिलकर दोनों हाथ आगे बढ़ा देती है”। भाव विभोर होकर वह दुनिया जहां की महिलाओ की ढेर सारी कहानिया मुंह से सुनाता रहता ,और अपनी हाथो से उपस्थित महिला समुदाय को फटाफट चूड़ियाँ भी पहनाता रहता । बड़ी बुढियां ,प्यार से उसे गाली भी सुनाती तो वह मज़ाक मज़ाक मे उनको यह सब कहने का लिखित अधिकार भी दे देता । मनोरंजन और हास्य परिहास्य से भरा एक मोहक वाता वरण पैदा करने वाला जादूगर सबका चहेता था ।

बच्चियो के वास्ते भी उसके पास रंग बिरंगी चूड़ियाँ ,  बालाए  हुआ करती ,जिसे वह कलकत्ता के स्कूल मे पढ़ने वाली लड़कियों का पसंदीदा बताकर सब बालिकाओ  मे एक उत्सुकता पैदा कर देता । देखते देखते वह अपना आधा से ज्यादा समान बेच कर ,कुछ जलपान वगैरह करके ,सबको सपनों के हिंडोले पर सवार कराकर  मस्ती मे झूमने के लिए छोड़ कर वह सपनों का सौदागर ,वापस दो तीन महीने के बाद आने के लिए चला जाता ।  

   वक्त का पहिया घूम गया ।दादी तो क्या उनकी बहुरिया ,बड़की काकी ,पीसी माँ,सब भयानक धुन्ध मे खो गई, रूनु झुणु बालाए पहनने के लिए चुप चुप सिसकारी भरने वाली पाँच छह बरस की रीता प्रिटा भी अब बाल गोपाल वाली बन कर प्रौढ़ा हो रही थी ।तेजी से बदलते इस समय और समाज मे , अब  उन जैसे अनंत चूड़िहारों के जिंदगी के साथ ग्राम समाज की दुनिया भी न जाने कहाँ खो गई होंगी ।

  

   कामिनी कामायनी 

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