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विरेंदर वीर मेहता की लघुकथा - प्यास

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(लघुकथा)

"प्यास"
"बाबा। क्या सिर्फ इस लिए हिना की  सारी अच्छाइयाँ ख़त्म हो जाती है कि ये दूसरी कौम की है।" उन दोनों के रिश्ते पर बाबा के इन्कार के  बाद कमरे में बहुत देर छाई रही चुप्पी को कर्ण ने ही तोडा।
"नहीं बेटा। वो बात नहीं है पर इनका रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ तो अलग है।"
"पर बाबा। कुछ हम इसके लिए और कुछ 'ये' हम लोगो के लिये बदल भी तो सकती है।" कर्ण ने अपनी बात समझाने की कोशिश में बाबा की ओर देखा।
"मगर बेटा! हमारा समाज, इनका समाज!"   बाबा ने एक नज़र हिना को देखा। "और फिर इनके घर का पानी, इसके हाथ से.......।"
"सही कहा आपने बाबा....!" काफी देर से खामोश बैठी हिना ने उनकी बात बीच में ही काट दी। "..... लेकिन मेरे घर का पानी, मेरे हाथ का पानी तो बरसो पहले ही आप पी चुके है पर शायद तब मैं सिर्फ एक बच्ची थी या शायद तब आपकी 'प्यास' को पानी के पीछे का धर्म नज़र नहीं आया था।"
अनायास ही बाबा की आँखों के सामने चार धाम तीर्थ के रास्ते का वो प्यास भरा दिन झिलमिलाने लगा जब उनकी प्यास उस मासूम बच्ची ने अपनी पानी की बोतल से बुझाई थी।

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