सोमवार, 4 जनवरी 2016

नन्दलाल भारती की लघुकथा - लजाया हुआ मुंह

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लजाया हुआ मुंह/लघुकथा 

धोखु प्रसाद खुद को जातीय सर्वश्रेष्ठ साबित करते नहीं अघाते थे परन्तु मन से गिध्द   थे।रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास का आतंक फैलाकर छलना ,ठगना और कमजोर की छाती पर बैठकर फैन फैलाना खानदानी पेशा था । बदले युग में भी जातीय बदलाव तो नहीं था परन्तु मतलबी मौका कहा छोड़ते है दूसरो का हक़ भी छीन लेते है ऐसे थे धोखु प्रसाद । धोखु प्रसाद सरकारी सेवक थे परन्तु वे खुद को सेवक मानने  में शर्म महसूस करते थे। एक दिन हंसी के छींटे मारते हुए दफ्तर के सोफे में धंसते हुए बोले राजू -तुम्हारा साहब तो जा रहा है। 

राजू -दो साल नौकरी के बचे है ऐसे में स्थानांतरण । 

धोखु प्रसाद-तू नहीं समझेगा है तो ठस बुध्दि । 

हाँ श्रीमान तभी  चपरासी हूँ आप जैसा नहीं बन पाया ?

धोखु प्रसाद-बुरा मान गया । 

राजू -नहीं श्रीमान बुरा क्यों मानूँ ,आप तो युगो से आशीर्वाद  देते आ रहे है। 

धोखु प्रसाद-यही अपना पुश्तैनी काम है । 

राजू -होगा ?

धोखु प्रसाद-बिग बॉस का स्थानांतरण नहीं तुम्हारे साहब से मेरा मतलब टाइपिस्ट से था जिसके इशारे पर नाचते रहते हो ।

राजू-स्थानांतरण नहीं । वे खुद जा रहे है। 

धोखू प्रसाद -तेरा क्या होगा राजू ?

राजू -नौकरी खा जाना ?

धोखू प्रसाद -कैसी टेढ़ी बात कर रहा है तू  ?

राजू बोला -बोलने की तमीज नहीं,उपदेश दे रहे हो ।  बीस साल से कभी अपने हेड क्वार्टर पर रहे नहीं,स्थायी निवास पर रहकर टेलीफ़ोन से नौकरी कर रहे हो,साल में लाखो के यात्रा भत्ता,मुख्यालय का फर्जी किराया और भी ढेर सारी सुविधाओं का उपभोग कर विभाग को धोखा दे रहे हो जीजाजी के  भरोसे । हमें कह रहे हो तुम्हारा क्या होगा ? धोखू प्रसाद सोफे से उठे और लजाया हुआ मुंह लेकर दफ्तर बाहर से  निकल गए ।  

डॉ नन्द लाल भारती 

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