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लक्ष्मण प्रसाद डहरिया की रचनाएँ

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मानवाधिकार


विश्व की जनसंख्या लगभग 700 करोड़ से अधिक हो चुकी है। विश्व के प्रत्येक देश का अपना संविधान है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को संवैधानिक अधिकार दिये गये हैं। 26 जनवरी 1950 को भारत में संविधान लागु हुआ जिसमें भारत के प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा अनेकों सर्वव्यापी अधिकार दिये गये हैं। 10 दिसम्बर को हमारे देश में भी मानव अधिकार दिवस मनाया जाता है जब किसी व्यक्ति, संस्था, संगठन, शासन द्वारा नागरिकों को प्रदत्त संवैधानिक अधिकार का पालन, न देना, रोक से मानव अधिकार का उल्लंघन होता है। हमारे देश में मानव अधिकार उल्लंघन की कई घटनाएँ होती हैं। श्रम कानून द्वारा 14 वर्ष से कम बच्चों से श्रम कराना मानव अधिकार का उल्लंघन माना जाता है लेकिन ग्रामीण अंचलों में छोटे, गरीब, मजदूर, किसान जो गरीबी तथा बेरोजगारी से पीड़ित होते हैं। घर के प्रत्येक सदस्य को रोटी कमाने के लिए कार्य करना पड़ता है। इस कारण बच्चों से कार्य कराने पर मानव अधिकार का उल्लंघन होता है।


महिला सशक्तिकरण की चर्चा तो होती है लेकिन महिलाओं का आर्थिक, शोषण, निजी तथा अन्य संस्थाओं द्वारा किया जाता है। कलकारखानों में मजदूरों से श्रम कानून में प्रदत्त अकुशल, अर्धकुशल, कुशल श्रमिकों के दैनिक मजदूरी निश्चित की गई है परन्तु निजी संस्थानों द्वारा इसका उल्लंघन के अंतर्गत आता है। कृषकों को फसलों के उत्पादन में महंगे बीज खाद्य मजदूरी के कारण उन्हें आर्थिक हानि होती है जिसके लिए मुनाफा कमाने वाले उत्पादकों द्वारा उनका शोषण मानव अधिकार का शोषण कहलाता है। आज वनवासियों से उनकी खेती व प्राकृतिक सम्पदा से खनन के लिए बेदखल करना तथा कम कीमत, बेरोजगारी में उन्हें ढकेल देना घोर मानव अधिकार का उल्लंघन है।


हमें आज के युग में उपरोक्त सभी परिस्थितियाँ जिनके कारण मानव अधिकार का उल्लंघन होता है, गरीबों को रोजगार, महिलाओं का सहकारिता के अधिकार पर संरक्षण, मजदूरों को निश्चित अवधि में पद की रिक्तियाँ भरना, निश्चित समयावधि में प्रमोशन देना, कृषकों को सरकारी सहायता, शत-प्रतिशत देना, वनवासियों को पूर्ण रोजगार, आवास उपलब्ध कराना चाहिए जिससे मानव अधिकार का उल्लंघन रोका जा सकता है।
आज विश्व के मौत के सौदागर, छोटे-बड़े शस्त्र बेचने पर जिनकी अर्थव्यवस्था निहित है वे कई देशों में विरोधियों, स्मगलरों, देश-द्रोहियों को शस्त्र बेचकर उन देशों में गड़बड़ियाँ, असंतोष, खून-खराबा करवाते हैं और मानव अधिकार के उल्लंघन की दुहाई देकर घड़ियाली आँसू बहाते हैं।


भारत की एकता, अखण्डता, धर्मनिरपेक्ष, स्वरूप को बरकार रखना समय की माँग है। हमें नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सख्ती से रक्षा की जरूरत है। जाति, भाषा, धर्म तथा लिंग भेद से ऊपर उठकर समानता, एकजुटता की आवश्यकता है। इससे देश में सुख, शांति, समृद्धि और विकास निश्चित होगा।

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बालिका


बालिका पग-पग कदम बढ़ाती हैं, 
जाने कब सयानी हो जाती हैं,
वो बे-धड़क घर में घुस जाती हैं,
तोतली बोली सबको भाती है,
आँगन का खिलौना बन जाती हैं,
जाने कब सयानी हो जाती है।


बड़ी होकर नित शाला जाती है,
काम कर माँ का हाथ बटाती है,
घरेलु काम कब सीख जाती है,
जाने कब सयानी हो जाती है।


वो विज्ञान का सबगुर सीखे,
मान-अदम राह के अनुभव तीखे,
वो गाड़ी का नेट चलाती है,
जाने कब सयानी हो जाती है।


पढ़ लिखकर नौकरी पा जाती है,
अपने कुल को ऊँचा उठाती है,
सजना संग दोनों कुल सजाती है,
जाने कब सयानी हो जाती है।

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