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लड़कियाँ : देश की धरोहर / आलेख / शेख अफरोज फातेमा

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‘‘अंतरिक्ष की सीमाएँ नाप रही है, आज की नारी

अपनी शक्ति से जैसे, ब्रह्माण्ड हिला रही है आज की नारी ।

राष्ट्रों की परिधि नापना सामान्य बात है

हर दिन ‘नई दुनिया’ तलाश रही है आज की नारी ।’’

विश्व में हमारे देश की पहचान हमारी महान संस्कृति से, सभ्यता से, हमारे आचार-विचारों से होती है । यही संस्कृति, सभ्यता, और आचार-विचार हमारी धरोहर कहलाते हैं । इतिहास साक्षी है माँ और मातृभूमि के सम्मान के लिए हमने प्राणों की आहुति दी है । लड़कियाँ हमारी सभ्यता का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है ।

लड़कियाँ हमारे देश की धरोहर है और इस धरोहर को हमें संजो के रखना है । वैश्वीकरण के इस माहौल में कहीं ना कहीं जाने अनजाने इस धरोहर को बड़ी मात्रा में हानी पहुंच रही है । अगर इसे हमने सही समय पर रोका नई तो आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय होगा ।

हमारा इतिहास बताता है कि हमारे यहाँ मातृसत्ता अधिकार वाली व्यवस्था थी। स्त्रियों को लेकर हमारे पौराणिक विचार बड़े ही आदरयुक्त और महत्त्वपूर्ण रहे हैं । हमारे देश में, ‘‘स्त्री होना अनेक दुर्लभ गुणों का स्त्रोत होना है । संवेदनशीलता, कोमलता, करूण, प्रेम, ममता आदि का वह आगार है । स्त्री हृदय शाश्वत माँ का हृदय है । इसलिए हिंदू धर्म में मातृरूपा देवियों की कल्पना की है... कोई भी पुरूष जब तक नारी के गुणों से समृद्ध नहीं होता, महान नहीं बन सकता । वह महाप्रतापी हो सकता है, महान योद्धा, महापंडित मगर महात्मा तो तभी होगा, जब नारीत्त्व से युक्त हो।’’१ इस्लाम धर्म के प्रेषित मोहम्मद पैगंबर साहब भी बेटियों के पिता थे । यह भी कहा जात है कि ‘माँ के कदमों तले जन्नत होती है ।’ नारी को प्रत्येक धर्म में महत्त्वपूर्ण दर्जा दिया गया है इसके बावजूद भी हर युग में उसकी प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान, अस्तित्व को लेकर अनेक प्रश्न उपस्थित हुए हैं किंतु आज इक्कीसवीं शती जो मानव विकास के चरमोत्कर्ष पर जा पहुंची है इस आधुनिक काल में लड़कियों के अस्तित्व को लेकर प्रश्न उपस्थित नहीं हो रहें तो उनके अस्तित्व को ही नष्ट किया जा रहा है । कह ने के लिए हम अधिक मात्रा में सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने लगे किंतु ‘स्त्री भ्रूण हत्या’ जैसे जघन्य अपराध कर रहे हैं । शेख चिल्ली की तरह जिस डाल पर बैठे है उसी को काट रहे है । निश्चित है हमारा नुकसान ही होगा । जिस वंश के चिराग के लिए हम लड़कियों को मार रहे हैं वही लड़कियाँ माँ भी होती है । फिर हम अपने वंश चलाने के लिए बच्चे के लिए माँ कहाँ से लाएंगे ? हमारे देश के इतिहासों में कई ऐसी माँएं हैं जिनका नाम सुवर्णाक्षरों में लिखा जाता है जिन्होंने अपने देश के लिए काबिल बेटे दिए । बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर और पहली अध्यापिका उसकी माँ होती है। इन्हीं माताओं ने चरित्र गढ़ने का कार्य किया है । फिर आज लड़कियों के साथ इतना दुर्भाव क्यों हो रहा है? क्या हम यह बातें भूल गए हैं ?

सोचने की बात है क्या बिना स्त्री के परिवार पूर्ण होता है ? नर के समानांतर ही नारी शब्द का प्रयोग किया जाता है । नर की अपेक्षा नारी में सौंदर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, प्रेम, त्याग, वात्सल्य आदि विशेष गुण दिखाई देते हैं । एक लड़की अपने उम्र की अलग-अलग अवस्थाओं में बेटी, बहन, पत्नी तो कभी माँ की भूमिका निभाती है। परिवार को पूरा करने के लिए जितनी एक पुरूष की आवश्यकता होती है उतनी ही एक स्त्री की भी । बिना एक के वह अधूरा होता है । वह जननी है, माँ है । वही हमारे वंश को आगे बढ़ाती है । आज हम ‘गर्भ-जल परीक्षण’ द्वारा गर्भ में ही उसकी हत्या कर देते हैं । उसे दुनिया में आने से पहले ही मार दिया जाता है । अगर वह दुनिया में आ भी जाती है तो आज की स्थितियों को देखकर तो यह लगता है कि हम पशु बनकर उसके साथ अमानवीय अत्याचार करते हैं । जैसे दहेज के लिए उसे मारा जाता तो कभी घरेलू हिंसा तो कभी बलात्कार जैसे पाशविक अत्याचार करते हैं । हम इतने पर ही नहीं रूकते तो जब वह हमसे कंधे से कंधा मिलाकर काम करती है तब हम उसे मानसिक तौर पर सताते हैं । ऐसा करने से हम अपने ही आनेवाले समय को अंधकारमय बना रहे हैं ।

आज कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ स्त्री ने अपना परचम नहीं लहराया । वह हर काम कर सकती है जो पुरूष करते हैं वह किसी भी तरह पुरूषों से कम नहीं है । सिर्फ चूल्हा चौका और बच्चों को पालन-पोषण ही उसका कार्यक्षेत्र नहीं है । यह सब करते हुए भी उसने अपने आप को हर कदम पर सिद्ध किया है । इतिहास गवाह है, जब भी उसे मौका मिला उसने गार्गी, मैत्रेयी, रजिया सुलतान, झाँसी की रानी, सावित्रीबाई, आनंदी गोपाल, इंदिरा गांधी, सरोजनी नायडू, मदर तेरेसा, मादाम कामा, मधुबाला, किरण बेदी, लता मंगेशकर, पी.टी. उषा, कल्पना चावला, बचेंद्री पाल, सानिया मिर्झा, मेरी कोम, साईना नेहवाल, प्रतिभाताई पाटील, मेधा पाटकर, रमणिका गुप्ता जैसे किरदारों में अपने आप को साबित किया है । उनके कर्तृत्व को देखकर लगता की वह कहना चाहती है -

‘‘सबला है हम नारी है हम

देश की आधारशीला है हम

तूफानों से नहीं डरेंगे हम

यश का हिमालय जीतेंगे हम ।’’

इतने बुलंद हौसले के साथ आज की नारी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है । किंतु खेद की बात है कि जब भी हम जनसंख्या वृद्धि के आकड़ों पर नजर डालते हैं तब हमें स्त्री-पुरूष लिंगानुपात में स्त्रियों की संख्या दिन-ब-दिन घटती नजर आती है । हरियाणा जैसे राज्य में तो यह चिंता का विषय बन गया है । क्या हम स्त्री विहीन समाज चाहते हैं ? अगर हमने अपने करतूतों पर रोक नहीं लगाई तो यह दिन जरूर देखना पड़ेगा । लड़कियाँ हमारे देश का भविष्य है । इस आधी आबादी के बिना आप उन्नति नहीं प्राप्त कर सकते । लड़का और लड़की दोनों समान है । इस बात को जब तक हम नहीं समझेंगे तब तक हमारा विकास अधूरा है ।

भारत सरकार अपनी ओर से जन-जागृति के लिए अथक प्रयास कर रही है । कुछ कानून भी बने हैं । किंतु हमारी सोच में बदलाव आना आवश्यक है । जब तक लड़कियों को लेकर हम सकारात्मक सोच नहीं बनाएंगे तब तक हमारी इस धरोहर को गहरा नुकसान पहुँचेगा । स्त्री भ्रूण हत्या, यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा, अनादर, अवहेलना मानसिकता तनाव आदि पाशविक और अमानवीय बातों को खत्म नहीं करेंगे तब तक हमारी धरोहर को नुकसान ही होता रहेगा । सोच बदलेगी समाज बदलेगा । इस की शुरूआत हमें हमारे ही घर से करनी होगी । लड़कियों को यही प्यार और दुलार दीजिए जो हम लड़कों को देते हैं । वह भी इस के हकदार है । बेटियाँ बोझ नहीं होती वह भी आपके बुढ़ापे की लाठी बन सकती है यदि आप ने उसे योग्य शिक्षा और फलने-फूलने का अवसर दिया तो । आवश्यक है पुरूष को अलग-अलग भूमिकाओं में उसके साथ समर्थ रूप से खड़ा होना होगा । कभी उसे मजबूत पिता के रूप में, कभी कृष्ण जैसे भाई के रूप में जो हर मुश्किल में द्रौपदी का साथ निभाता था तो कभी प्यार और सम्मान देनेवाले हमसफर पति के रूप में तब जाके हर लड़की के चेहरे पर बेखौफ मुस्कुराहट दिखाई देगी ।

एक सिक्के के दो पहलू होते हैं एक के अस्तित्व को नकारने से दूसरे का कभी पूरा नहीं होता । जब लड़कियों को समाज में पूरा सम्मान मिलेगा तब वह एकजुट होकर पूरी शक्ति के साथ आश्वस्त होकर निर्भय रूप से कार्य करेगी जिससे हमारी देश की प्रगति में चार चाँद लग जाएंगे । खुशहाल परिवारों से ही देश खुशहाल बनेगा इसीलिए उन्हें खेलने-कूदने दो, पढ़ने दो ताकि स्वस्थ शरीर, प्रगल्भ मस्तिष्क और सुंदर मन का विकास होगा । जिससे हमारा संपूर्ण समाज स्वस्थ बनेगा । अगर देश की आधी आबादी ही घुटन, तनाव और संत्रास में रहेगी तो देश के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा । इसीलिए उन्हें पीछे नहीं धकेलना है उन्हें हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर लेकर चलना है । निश्चित ही देश का भविष्य सुवर्णमय होगा ।

इसीलिए तो कहते हैं - ‘‘बेटियाँ तो है लम्हा खुशी का...’’

संदर्भ :

१) ‘तुम भूल गए पुरूषत्त्व के मोह में कुछ सत्ता है नारी की’ - आलोचना के हाशिए पर, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, पृ. १३०

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डॉ. शेख अफरोज फातेमा

सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्षा

मौलाना आजाद महाविद्यालय,

औरंगाबाद

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