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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख : वही काम सौंपे जिनमें दक्षता हो

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हर आदमी हर प्रकार के काम कभी नहीं कर सकता। दुनिया में जो लोग पैदा हुए हैं उन्हें किसी न किसी कार्य विशेष के अनुकूल ही बनाया गया है।  

कोई सा कार्य कठिन या सरल नहीं है। हर कार्य अभ्यास सिद्ध है और जिसका जिसमें अभ्यास हो जाता है उसके लिए वह कार्य विशेष अत्यन्त सहज, सरल और आसान रहता है।  कोई एक काम किसी एक इंसान के लिए कठिन लग सकता है लेकिन वही काम दूसरे इंसान के लिए बांये हाथ का हो सकता है।

इस मामले में हर इंसान के लिए अपने.अपने विशिष्ट काम निर्धारित हैं। यह तय माना जाना चाहिए कि हर इंसान किसी न किसी विशेष काम से धरती पर भेजा गया है। भगवान जब किसी बड़े काम के लिए भूमिका रचता है तभी बहुत सारी आत्माओं को एक ही प्रकार के कामों के लिए धरती पर भेजता है और ऐसे में खूब सारे लोगों को कर्म विशेष के लिए दक्षता प्रदान कर भेजता है।

अन्यथा सार्वजनिक हितों के सामूहिक रचनात्मक कामों के लिए एक ही प्रकार की दक्षता वाले लोगों को धरा पर भेजता है अथवा प्रकृति विरूद्ध या धर्म विरूद्ध स्थितियों में दुष्टों के संहार के लिए एक ही प्रकार की दक्षता के साथ एक ही तरह के लोगों को धरती पर भेजता है।

आम तौर पर होना यही चाहिए जो इंसान जिस किसी मौलिक विधा या हुनर में दक्ष हो, जो उसकी रुचि के विषय हों, उन्हीं से संबंधित कामों को उसे सौंपा जाना चाहिए ताकि पूरी तल्लीनता और आत्मीय रुचि के साथ वह काम कर सके।

पुराने जमाने में जब तक इंसान को उसकी विशेषज्ञता और मौलिक हुनर के अनुरूप काम सौंपा जाता था वह पूरी ईमानदारी, लगन और आत्मीयता के साथ पूरा करता था और उसके कामों की गुणवत्ता का स्तर भी चरत शिखर पर होता था, सर्वस्वीकार्य और सम्माननीय तथा सराहनीय कार्य होता था।

जब से कामचलाऊ और धक्कागाड़ी जैसी जुगाड़ी मनोवृत्ति का प्रभाव सामने आया है, तब से सब कुछ गुड़गोबर होने लगा है। घर.परिवार का कोई सा काम हो या फिर समाज और देश की कोई सी गतिविधि, हर मामले में गुणवत्ता और समयबद्धता तथा श्रेष्ठता के मानदण्डों का होना नितान्त जरूरी है और ऐसा होने पर ही कार्य को सर्वश्रेष्ठ स्वीकार्य माना जा सकता है।

वर्तमान की विभिन्न समस्याओं की जड़ यही है कि हम हर किसी को हर किसी कार्य के लिए योग्य समझ कर कार्य सौंप दिया करते हैं या हर किसी से हर तरह का कार्य करवा लेना चाहते हंैं।

यही कारण है कि कर्ता अपने हुनर या दक्षता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। क्योंकि कर्ता किसी एक काम में दक्ष होता है, और उसे दक्षता वाले काम की बजाय दूसरे काम सौंप दिए जाते हैं।

दुनिया में पैदा हुआ हर इंसान किसी न किसी एक.दो विधाओं, मौलिक हुनर या विलक्षण ज्ञान के मामले में समर्थ होता ही होता है। बात विदेशों की हो या भारतीय परंपरा की, धरती हमेशा रत्नगर्भा रही है और उसका भण्डार कभी खूटता नहीं।

यह हमारी कमजोरी है कि हमारे भीतर पारखी क्षमताएं समाप्त होती जा रही हैं,  हम गुणग्राही न रहकर गरजग्राही और खुदगर्ज होते जा रहे हैं और हम परफेक्शन की बजाय जुगाड़ और कामचलाऊ संस्कृति को अपना चुके हैं।

जीवन से लेकर जगत तक के सभी कामों को करने के लिए दुनिया में एक से बढ़कर एक हुनरमंद, ज्ञानवान और िचंतनशील प्राणी विद्यमान हैं जिन्हें उनके लायक काम सौंप कर निश्चिन्त हुआ जा सकता है लेकिन हम लोग दक्षता की कद्र करने की बजाय अपने स्वार्थ में डूबे होते हैं और जैसें.तैसे काम निकलवाना चाहते हैं इस कारण जो जैस मिल गया, जिससे काम निकल गया, निकलवा लिया करते हैं।

फिर बाद में पछताते भी हैं। पर प्रायश्चित नहीं करते। न ही यह संकल्प लेते हैं कि योग्यतम आदमी को उसकी रुचि या हुनर के लायक काम देंगे। समाज और देश का समग्र उत्थान करने लिए जरूरी है कि हम हर काम की प्रवृत्ति को समझें, उसकी पूर्णता के लिए उससे संबंधित दक्षता धारी को काम सौंपे, इंसान को वही काम सौंपे जिसमें वह प्रवीण है।

जो जिस काम के योग्य है उसे उसी के अनुरूप कार्य का उत्तरदायित्व सौंपा जाना चाहिए तभी परिपूर्णता, परिपक्वता और सर्वश्रेष्ठता के सर्वोच्च शिखरों को पाया जा सकता है।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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