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अपना-पराया न करें / आलेख / दीपक आचार्य

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हर इंसान दूसरे इंसानों, समुदायों और देश के लिए काम आने के लिए बना है। इंसान-इंसान में भेदभाव करना हमारी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा का अपमान है और जो ऎसा करता है वह  अधम, हीन और पापी होने के साथ ही भगवान के घर का सबसे बड़ा गुनहगार है जिसे विधाता भी कभी माफ नहीं करता।

जिस इंसान को भगवान ने बनाया है वह चाहे पुरुष हो या स्त्री अथवा बीच का कोई, सभी का सम्मानपूर्ण वजूद है और इसे कोई नकार नहीं सकता।

इस मामले में हम सारे के सारे लोग निर्माता-निर्देशक और पालनहार ईश्वर की वह अनुपम, अद्भुत एवं अद्वितीय कृतियाँ हैं जो संसार के विराट रंगमंच पर अपने-अपने किरदार निभाती हैं और समय आने पर लौट जाती हैं। 

यही क्रम आदिकाल से चला आ रहा है और यों ही चलता रहेगा। दुनिया के रंगमंच पर आने वाले कलाकारों में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं होता। हर कलाकार और रंगकर्मी का अपना-अपना किरदार होता है जिसके बिना अभिनय की कोई सी श्रृंखला पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकती।

इंसान और ईश्वर के बीच सीधा रिश्ता है। यदि इंसान के भीतर दैवीय गुण और मौलिक इंसानियत विद्यमान है तब वह ईश्वर के अत्यन्त करीब रहता है। पूर्ण शुचिता और मौलिकता होने की स्थिति में इंसान और ईश्वर एक-दूसरे के पूरक तथ पर्याय भी होते हैं लेकिन ऎसा होना आज के समय में दुर्लभ है, असंभव नहीं।

यदि हम इंसान के वजूद को स्वीकारना, उसे सम्मान देना, उसके स्वाभिमान की रक्षा करना सीख जाएं तो हम इंसानों के भीतर से दैवत्व की झलक पा सकते हैं लेकिन ऎसा करने के लिए हमें अपने कुटिल स्वार्थ, मलीनताओं और संकीर्णताओं को छोड़ना जरूरी है। 

यह उदारता उन्हीं लोगों में देखी जा सकती है जो लोग संस्कारी, शुद्ध बीज वाले,  मौलिकताओं से परिपूर्ण व भगवदीय वृत्ति के होते हैं और सभी प्रकार की अपेक्षाओं-ऎषणाओं से मुक्त होते हैं।

इन्हीं गुणों वाले लोग ही इंसान को अहमियत देते हैं। इनके लिए जाति-पाँति, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष आदि को कोई भेद नहीं होता, ये इन सबसे परे और ऊपर हुआ करते हैं।

यही कारण है कि इस प्रकार के लोग सर्वस्पर्शी, सहिष्णु और सहृदय होते हैं और सभी से सम्मान पाते हैं। अच्छे, सच्चे और श्रेष्ठ इंसानों का व्यवहार इसी प्रकार का होता है। लेकिन यह तभी तक संभव है जब तक हमारे भीतर इंसानियत हो।

जो लोग इस तरह का व्यवहार करते हैं वे धन्य हैं जिनकी वजह से मानवता जिन्दा है, मानवीय मूल्योें का वजूद बना हुआ है और असल में देखा जाए तो धरती इन्हीं मानवतावादी लोगों की वजह से टिकी हुई है।

मूल समस्या तो उन लोगों की है जो इंसान-इंसान में भेद करते हैं, अपने व्यवहार में भेदभाव और पक्षपात करते हैं, हर विषय, विचार या काम में अपना-पराया देखते हैं। ये ही वे लोग हैं जो अपना-पराया करते हैं। 

कभी जातिवाद के नाम पर, कभी क्षेत्र और भाषा-बोली के नाम पर। परिवारवाद, भाई-भतीजावाद और कुटुम्ब के नाम पर। और बहुधा अपने घृणित स्वार्थों, नीचता भरे कामों, अपने अपराधों को ढंकने, बिना मेहनत की कमाई को पाने, अपने नाजायज काम निकलवाने या औरों से कराने, अपनी दागदार छवि को बेदाग मनवाने, प्रतिभाहीनता के बावजूद प्रतिष्ठा पाने और पिछले दरवाजों से होने वाले ढेरों कामों को कराने के लिए एकमात्र यही पैमाना देखते हैं कौन अपना है और कौन पराया है।

अधिकांश लोगों की मनोवृत्ति यही होती जा रही है। चाहे वे किसी भी स्थान पर बिराजमान हों, समुदाय को लाभान्वित करने की स्थिति में हों, किसी ओहदे पर हों अथवा उन स्थानों पर हो जहां रहकर असंख्य लोगों की सेवा कर सकते हों अथवा परोपकार के कई अध्याय रचने वाले।

बहुत कम लोग ही ऎसे होते हैं जो नीति और धर्म का पालन करते हुए सभी के प्रति समत्व का भाव रखा करते हैं अन्यथा आजकल सब तरफ गड़बड़झाला होता जा रहा है। हममें से अधिकांश लोग इसी मनःस्थिति में जी रहे हैं कि जो किसी न किसी कारण से अपना रिश्तेदार, संबंधी और स्वार्थपूर्ति अथवा गोरखधंधों में सहायक हो, बस वही अपना है बाकी सारे पराये।

इससे भी अधिक विचित्र स्थिति अब यह होती जा रही है कि हमारे लिए घर-परिवार, रिश्ते-नातेदार और समाजजन या क्षेत्र के लोग दूसरे नम्बर पर आ गये हैं। पहले नम्बर पर पैसा हम सभी का सबसे निकटतम और आत्मीय सगा हो गया है, जहाँ पैसा, जमीन-जायदाद हो, उससे बढ़कर दुनिया में हम किसी को कुछ नहीं मानते।

हमारा जहां स्वार्थ सधता हो, जो हमारे स्वार्थ पूरे करने में सहयोगी है, जो हमारे अपराधों पर परदा डाल सकने और अभयदान प्रदान करने में समर्थ है, जो हमें स्वेच्छाचारी बनाए रखते हुए मनमानी करने की खुली छूट देता रहता है, बस वही हमारा अपना है, बाकी सारे पराये।

इंसानी प्रदूषण इतना अधिक बढ़ता जा रहा है कि अब आदमी बिना स्वार्थ के न मुंह खोलता है, न अभिवादन और आदर करता है, न हिलता-डुलता है, यदि कुछ मिलने की उम्मीद न हो। इस मामले में आदमी या तो व्यापारी हो गया है या खुद छोटी-मोटी दुकान, जहाँ हर गतिविधि मुनाफा चाहती है और अपने लिए सब कुछ जमा करने की स्वतंत्रता, चाहे दूसरों का कितना कुछ छीन जाए, लूट जाए।

बहुत सारे लोग हम देखते हैं जो बात भी तभी करते हैं कि जब सामने वाला कुछ देने लायक हो, कुछ काम आने लायक हो या कि भविष्य में किसी न किसी उम्मीद को पूरी करने की क्षमता रखने वाला हो। ऎसा न हो तो हम दूसरों की उपेक्षा करते हैं, हीन भाव से देखते हैं और तिरस्कार करते हुए नकारने लगते हैं।

पता नहीं हम किस तरह सामाजिक प्राणी कहे जाने लगे हैं जबकि हमारा इस प्रकार का व्यवहार असमाजिकता का परिचय देता रहा है। कुछ लोग कम असामाजिक हो सकते हैं, कुछ छद्म सामाजिक हो सकते हैं और बहुत सारे लोगों में असामाजिकता का प्रतिशत अधिक हो सकता है।

असल में यही कलियुग के घनत्व को इंगित करता है जहां हर आदमी दूसरे आदमी से अपेक्षा रखता है, एक-दूसरे को खाने दौड़ता है, कुछ मिले तो पुचकारता रहता है, पूंछ हिलाता हुआ प्रशस्तिगान करता रहता है, न मिले तो काटने दौड़ता है,  कुछ मिलने पर ही काम करता है, और न मिले तो टालता है, हड़काता है और चक्कर कटवाता है।

वास्तव में देखा जाए तो  अब समय आ गया है कि जब मनुष्यों की साफ-साफ दो श्रेणियां घोषित कर दी जाएं। एक में सामाजिक रहें, दूसरे में वे सारे असामाजिक लोग डाल दिए जाएं जो धंधेबाजी और व्यभिचारी मानसिकता से घिरे हुए हैं तथा अपने बंधुओं तथा भगिनियों से भी अपेक्षा या मांग रखते हैं और तभी काम करते हैं जबकि भीख में कुछ मिल जाए।

यह भीख मुद्रा के रूप में हो सकती है, गिफ्ट के रूप में हो सकती है या किसी न किसी प्रकार के प्राकृतिक-अप्राकृतिक आनंद अथवा सुविधा के रूप में। इन भूखे-प्यासे असामाजिकों के कारण ही इंसानियत बदनाम हो रही है। ये धरती पर भी भार ही हैं जिनके पापों के कारण सब परेशान हैं। भगवान से प्रार्थना करें कि इन महापातकियों से हमें मुक्ति दिलाए ताकि मानवता अक्षुण्ण बनी रह सके।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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