सोमवार, 11 जनवरी 2016

दोस्ती / हास्य-व्यंग्य / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

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दोस्ती

एक गांव में आग लगी थी । अफरा तफरी मची हुई थी । जो भाग सकते थे वे भाग रहे थे । जो अशक्त थे , भाग ही नही सकते थे , केवल वे ही जलने को मजबूर थे । पर इनमें एक ऐसा भी था जो सक्षम तो पूरी तरह था , पर साथ जलने के लिए मजबूर था । पता किया गया कि यह कौन है ? पता चला , यह वो सज्जन है जो जलना तो नही चाहता पर दूसरों को बचाने के चक्कर में खुद भी जलने लगा है ।

निशक्त लोगों में सभी प्रकार के लोग थे , कोई किसी अंग से तो कोई किसी अंग से । परंतु बचाने वाला सिर्फ अंधे को छोड़कर सभी को बचाना चाहता था । कारण पता चला – इस अंधे के द्वारा जानबूझकर लगाई गई थी यह आग । कई बार मना करने , चेतावनी के बाद लगाई गई थी यह आग । वह अंधा परिणाम से पूरी तरह वाकिफ था , उसके बाद भी उसने दुस्साहस किया था ।

आग पूरी तरह फैल चुकी थी । अब भयावह रूप ले लिया था । अब तो लगाने वाले को ही जान के लाले पड़ने लगे । उसके मन में पछतावा तो नही था परंतु वह भी अब किसी तरह बच निकलना चाहता था । वह भागता तो बड़ी तेज था , किंतु उधर ही , जिधर आग लगी थी । वह स्वयं भी जलने लगा । बचाने की गुहार उसने भी की । पर सक्षम मनुष्य को वह कह नही सकता , क्योंकि आग लगाते उसी ने देखा था , उसी ने मना भी किया था , तथा परिणाम भुगतने के लिए चेतावनी भी उसी ने दी थी । जब तक वह सक्षम मनुष्य उसे बचाने नजदीक पहुंचे , तब तक उसके गिरेबान तक पहुंच चुकी थी यह आग । परंतु वह अंधा दूसरों को धू धू जलते देख अधिक खुश था , यह दृश्य देख वह अपने दुख भूल जाता । वह बचा लिया गया । पर बचाने वाले को धन्यवाद कहना तो दूर , पलटकर देखा तक नही ।

कुछ दिन बाद । अंधे को फिर आग लगाने को सूझी । पर पिछली घटना में , उसे अपने स्वयं के जलने की याद ने , सिरहन दे दिया । तभी उसे अंधे और लंगड़े की कहानी याद आ गयी । कैसे अंधे ने लंगड़े को अपने कंधे पर बिठाया था , और मेले का मजा लेने चले गए थे दोनो । मौका पाकर सक्षम आदमी को उसने लंगड़ा बना दिया , और सक्षम आदमी भी इसे जान नही पाया । अब दोनो में दोस्ती हो गई । अब कहीं भी आग लगाने में कोई उसे रोकने वाला या टोंकने वाला नही था । क्योंकि आग लगने पर लंगड़े को भी बचने की जुगत लगानी पड़ती थी , और वह आशा भरी नजरों को अंधे की ओर टिका देता था ।

कुछ अरसा और बीत जाने के बाद ..... । पैदा होने वाले सक्षम मनुष्य के अगली पीढ़ी ने अपने आप को स्वयं लंगड़ा बनाना शुरू कर दिया । पता चला – कि अंधा देश का बहुत बड़ा आदमी हो चुका था और उससे दोस्ती करने के लिए लंगड़ा होना बहुत जरूरी था । दूसरी बात यह थी कि जो लंगड़ा होगा , उसे अनेक पुरस्कारों , सम्मानों से अलंकृत किया जायेगा या उच्च पदों पर आसीन । तीसरी बात यह थी कि लंगड़े को उसके विभिन्न आयोजनों के लिए साधन सुविधा वही मुहैय्या करा सकता था ।

आगे चलकर यह अंधा राजनीति के नाम से और वह लंगड़ा साहित्य के नाम से चर्चित हो गया , जिसकी दोस्ती बेमिसाल है , सम्भवतः आज भी ............. ।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन ,

छुरा , जि. गरियाबंद

छत्तीसगढ़

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