विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

दोस्ती / हास्य-व्यंग्य / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

image

दोस्ती

एक गांव में आग लगी थी । अफरा तफरी मची हुई थी । जो भाग सकते थे वे भाग रहे थे । जो अशक्त थे , भाग ही नही सकते थे , केवल वे ही जलने को मजबूर थे । पर इनमें एक ऐसा भी था जो सक्षम तो पूरी तरह था , पर साथ जलने के लिए मजबूर था । पता किया गया कि यह कौन है ? पता चला , यह वो सज्जन है जो जलना तो नही चाहता पर दूसरों को बचाने के चक्कर में खुद भी जलने लगा है ।

निशक्त लोगों में सभी प्रकार के लोग थे , कोई किसी अंग से तो कोई किसी अंग से । परंतु बचाने वाला सिर्फ अंधे को छोड़कर सभी को बचाना चाहता था । कारण पता चला – इस अंधे के द्वारा जानबूझकर लगाई गई थी यह आग । कई बार मना करने , चेतावनी के बाद लगाई गई थी यह आग । वह अंधा परिणाम से पूरी तरह वाकिफ था , उसके बाद भी उसने दुस्साहस किया था ।

आग पूरी तरह फैल चुकी थी । अब भयावह रूप ले लिया था । अब तो लगाने वाले को ही जान के लाले पड़ने लगे । उसके मन में पछतावा तो नही था परंतु वह भी अब किसी तरह बच निकलना चाहता था । वह भागता तो बड़ी तेज था , किंतु उधर ही , जिधर आग लगी थी । वह स्वयं भी जलने लगा । बचाने की गुहार उसने भी की । पर सक्षम मनुष्य को वह कह नही सकता , क्योंकि आग लगाते उसी ने देखा था , उसी ने मना भी किया था , तथा परिणाम भुगतने के लिए चेतावनी भी उसी ने दी थी । जब तक वह सक्षम मनुष्य उसे बचाने नजदीक पहुंचे , तब तक उसके गिरेबान तक पहुंच चुकी थी यह आग । परंतु वह अंधा दूसरों को धू धू जलते देख अधिक खुश था , यह दृश्य देख वह अपने दुख भूल जाता । वह बचा लिया गया । पर बचाने वाले को धन्यवाद कहना तो दूर , पलटकर देखा तक नही ।

कुछ दिन बाद । अंधे को फिर आग लगाने को सूझी । पर पिछली घटना में , उसे अपने स्वयं के जलने की याद ने , सिरहन दे दिया । तभी उसे अंधे और लंगड़े की कहानी याद आ गयी । कैसे अंधे ने लंगड़े को अपने कंधे पर बिठाया था , और मेले का मजा लेने चले गए थे दोनो । मौका पाकर सक्षम आदमी को उसने लंगड़ा बना दिया , और सक्षम आदमी भी इसे जान नही पाया । अब दोनो में दोस्ती हो गई । अब कहीं भी आग लगाने में कोई उसे रोकने वाला या टोंकने वाला नही था । क्योंकि आग लगने पर लंगड़े को भी बचने की जुगत लगानी पड़ती थी , और वह आशा भरी नजरों को अंधे की ओर टिका देता था ।

कुछ अरसा और बीत जाने के बाद ..... । पैदा होने वाले सक्षम मनुष्य के अगली पीढ़ी ने अपने आप को स्वयं लंगड़ा बनाना शुरू कर दिया । पता चला – कि अंधा देश का बहुत बड़ा आदमी हो चुका था और उससे दोस्ती करने के लिए लंगड़ा होना बहुत जरूरी था । दूसरी बात यह थी कि जो लंगड़ा होगा , उसे अनेक पुरस्कारों , सम्मानों से अलंकृत किया जायेगा या उच्च पदों पर आसीन । तीसरी बात यह थी कि लंगड़े को उसके विभिन्न आयोजनों के लिए साधन सुविधा वही मुहैय्या करा सकता था ।

आगे चलकर यह अंधा राजनीति के नाम से और वह लंगड़ा साहित्य के नाम से चर्चित हो गया , जिसकी दोस्ती बेमिसाल है , सम्भवतः आज भी ............. ।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन ,

छुरा , जि. गरियाबंद

छत्तीसगढ़

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget