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पानी आ गया / बाल नाटक / विष्णु प्रभाकर

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(मंच पर पीछे की ओर पैड़ियाँ उठती चली गयी हैं। सबसे ऊपर की पैड़ी पर रेलिंग है। दूसरी ओर नीचे उतरने की पैड़ियाँ है। वहाँ एक ताल है। दूर कुछ मकान दिखायी देते है। पेड़ भी है। परदा उठने पर कई स्त्री-पुरुष ताल की ओर ऊपर आते हैं। वे बहुत दुखी हैं। कुछ बैठकर, कुछ खड़े-खड़े बातें करते हैं।)

पहला पुरुष : (सिर हिलाकर) पानी अभी तक नहीं आया। क्या होगा प्रभु?

पहली स्त्री : राजा के आदमी कहते हैं कि पीने का पानी खत्म होने को है।

दूसरा पुरुष  : और खेती को सींचने वाली नहरें भी तो सूख गयी हैं।
दूसरी स्त्री. :  ताल ही सूख गया तो नहरें कैसे चलेंगी?

पहला पुरुष : नहरें नहीं चलेंगी तो खेत सूख जायेंगे।

दूसरा पुरुष. :  ताल है तो नहरें हैं।

पहली स्त्री :  नहरें हैं तो खेत हैं। खेत हैं तो अन्न है।

पहला पुरुष :  ताल है तो बिजली है। बिजली है तो कारखाने हैं।

दूसरा पुरुष  : न खेत, न कारखाने।

दूसरी स्त्री :  न पानी, न बिजली।

पहली. स्त्री :  इसका मतलब भूख-पास।

पहला पुरुष :  इसका मतलब मौत।

(सब एक दूसरे को भरा से देखते हैं फिर एक साथ बोलते है।)

सब -ताल के सूखने का मतलब है कि मौत हम सब को खा जाएगी।
हम सब मर जाएंगे।

(तभी दूर से डोंडी पिटती आती है। सब उसी ओर देखते हैं।)

पहला पुरुष : यह तो डौंडी वाला आ रहा है।

पहली स्त्री : सुनो, सुनो, राजा का नया एलान सुनो।

दूसरी स्त्री : श... श... श... सुनो, बोलो नहीं।

(डौंडी वाला मंच पर प्रवेश करता है।)

डौंडी वाला : (ढोल पीटकर) सुनो, सुनो, सब खास और आम सुनो। पता लगा है कि रात के वक्त इस ताल में एक रोशनी जगमगाती है। राजाजी चाहते हैं कि कोई साहसी उस रोशनी का पता लगाए। सैनिकों के पास आते ही वह गायब हो जाती है।
सुनो, सुनो, हर खास और आम सुनो। जो कोई ऐसा कर दिखाएगा, उसे मंत्री का पद दिया जाएगा। सुनो, सुनो।
(स्वर दूर तक जाता है। सब एक दूसरे को देखते हैं। बोलते हैं।)

पहला पुरुष  : इस रोशनी के बारे में मैंने भी सुना है।

पहली स्त्री  : मेरी बेटी इरा ने मुझसे कहा था।

दूसरी स्त्री :  मेरा बेटा दीपंकर भी कहता था।

दूसरा पुरुष  : लेकिन मैं कहता हूँ यह सब छलावा है।

पहली स्त्री :  नहीं, नहीं, यह छलावा नहीं है। मेरी बेटी कहती थी कि ताल से एक स्त्री निकलती है।

दूसरी स्त्री  : नहीं, नहीं, मेरा बेटा कहता था, वह पुरुष है।

पहला पुरुष  : इस लड़की है, उसने नारी को देखा। दीपंकर लड़का है, उसने पुरुष को देखा है।

दूसरा पुरुष : तभी तो कहता हूँ कि वह छलावा है।

(जाता हूँ)

पहली स्त्री  :  मैं इरा से जाकर पूछती हूँ। (जाती है)

पहला पुरुष. :  मैं अभी जाकर पंडितजी से पूछता हूँ (जाता है)
मंच पर अंधकार उतरने लगता है। एक क्षण गहराकर वह धुँधलाताा है:।. उसी धुँधलके में दीप चमकते हैं।
पैड़ियों पर दो छायाएँ धीरे-धीरे आगे: बढ़ती हैं।
वे इरा और दीपंकर हैं। और छायाएँ इधर उधर दिखाई देती हैं।: दो क्षण बाद एक रोशनी- ताल में से उठती दिखती है और पैड़ियों की तरफ आती है:। उसे देखकर छायाएँ भाग जाती हैं। पर इस ओर दीपंकर उसकी और बढ़ते हैं।)

इरा: : तुम डर तो नहीं. रहे दीपंकर '

दीपंकर  : नहीं, तुम तो नहीं डर रहीं?

इरा :  नहीं, आओ हम उसके पास चलें।

दीपंकर  : आहा: कितने सुंदर वृद्ध पुरुष हैं।

इरा: : लो, वह! तो हमारी ओर ही- आ रहे हैं।

दीपंकर :  .. हमारे बिकुल पास ही आ गये।

(रोशनी में से वृद्ध पुरुष निकलकर नीचे की पैड़ी तक आते हैं। श्वेत केश, श्वेत वस्त्र, मुख पर तेज और मुस्कान)

इरा :  मैं आपको प्रणाम करती हूँ

दीपंकर :  मैं दीपंकर आपको प्रणाम करता हूँ।

वृद्ध : खुश रहो इरा खुश रहो दीपंकर।

इरा -दीपंकर  ('एक साथ हम खुश कैसे रह सकते हैं। ताल- सूख गया है।

वृद्ध : हां, ताल सूख: गया है। तभी तो मैं भी प्यासा लौट रहा हूँ।
इरा :   पर आप हैं कौन?

वृद्ध  : मैं परी देश का राजपुरोहित हूँ। तीनों लोकों में इस ताल का पानी सबसे मीठा था। तुम्हारे देश के लोगों ने अपना रक्त बहाकर देश को दुश्मनों से मुक्त कराया था' उसी बलिदान के कारण यह सूखा ताल पानी से भर गया था लेकिन इतने वर्ष स्वतंत्र रहने के: बाद तुम लोम फिर पापी बन गये। पानी फिर गायब हो गया ।

इरा  : कहां गया वह पानी ?'

दीपंकर :  क्या वह फिर आ सकता है?

वृद्ध. :  हां, आ सकता है।

इरा  : कैसे आ सकता है?

वृद्ध. : अगर तुम्हारे राजा और तुम्हारे नेता दोनों अधिकार छोड़ दें तो पानी फिर आ सकता है।'

(यह कहते-कहते वृद्ध पुरुष चले जाते हैं। इरा और दीपंकर  एक क्षण हतप्रभ से देखते हैं। फिर बोलते हैं: )
इरा :  (सोचते हुए) उन्होंने कहा कि प्रजा के नेता अपने अधिकार छोड़ दें।

दीपंकर :  (सोचते हुए) उन्होंने कहा कि राजा ओर प्रजा के नेता अपने अधिकार छोड़ दे।

इरा  : मेरी समझ में नहीं आ रहा।

दीपंकर  : मेरी समझ में भी नहीं आ रहा।

इरा  : आओ राजा के पास चलें।

दीपंकर :  (देखकर) राजा तो वह देखो इधर ही आ रहे हैं। प्रजा के नेता भी हैं।

इरा :  अरे वे तो आ भी गये।

राजा  : और नेता का प्रवेश)

राजा :  सुना है तुम दोनों ने उस रोशनी से बातें की हैं।

नेता  : सुना है वह कोई वृद्ध पुरुष थे।

इरा-दीपंकर :  जी हां वह वृद्ध पुरुष परीलोक के कुल पुरोहित थे।

राजा  : कुछ कहा उन्होंने?

इरा  : उन्होंने कहा राजा अपने अधिकार छोड़ दें।

दीपंकर  : उन्होंने कहा प्रजा के नेता अपना अधिकार छोड़ दें।
इरा  : उन्होंने कहा, जो पवित्र जल आजादी के दीवाने लाए थे, वह हमारे बुरे कारनामों से गायब हुआ है। वह तभी आ सकता है

राजा- नेता  : जब हम अपने अधिकार छोड़ दें

इरा- : दीपंकर जी ही।

राजा  : पर यह असंभव है।

नेता  : जी ही यह असंभव है।

राजा : हम अधिकार छोड़ दें तो हुकूमत कैसे चलेगी?

नेता :  हम अधिकार छोड़ दें तो राजा मनमानी करेगा।

राजा :  यह असंभव है। अधिकार गए तो नियम कैसे चलेगा। दुष्टों से रक्षा कैसे होगी?

नेता :  हां, अधिकार गए तो राजा जुल्म करेगा। प्रजा पीड़ित होगी। राजा नहीं अधिकार नहीं छोड़े जा सकते हैं। पानी आए या न आए। (जाता है)

(दोनों हतप्रभ से देखते हैं।)

इरा :  मैंने कहा था न मेरी समझ में नहीं आ रहा।

दीपंकर  : मैंने भी कहा था कि मेरी समझ में नहीं आ रहा। भला अधिकार के बिना कोई कैसे काम कर सकता है।

इरा  : अब क्या होगा, क्या हम सब मर जाएँगे।

दीपंकर :  नहीं हम नहीं मरेंगे?

इरा  : पर कैसे

दीपंकर  : मेरा मन कहता है कि रास्ता मिलेगा।

इरा  : मन तो मेरा भी कहता है। (तभी रोशनी फिर उभरती है।) अरे रोशनी फिर चमकी।

दीपंकर : हाँ और वो इधर ही आ रही है।

इरा : हाँ हाँ, वह तो पास आ गयी। देखो, देखो, दीपंकर इस
बार बहां एक स्त्री है।

दीपंकर : सच. वह स्त्री है। एक सुन्दर स्त्री। रानी है शायद।

इरा  : हाँ हाँ, वह परियों की रानी है।

(वह सुन्दर स्त्री पास आ जाती है। उसके वस्त्र लाल हैं 1)
इरा  : परियों की सनी को मेरा नमस्कार।

दीपंकर. :  मेरा भी नमस्कार लें रानी जी।

रानी  : दीपंकर और इरा, तुम दोनों पर मैं बहुत प्रसन्न हूँ तुम साहसी और आशावादी हो।

इरा :  आपकी कृपा है। पर क्या आप बता सकती हैं कि पानी कैसे आएगा?

दीपंकर : क्या आप भी यही पानी पीने आती थीं।

रानी. :  हां दीपंकर परीलोक के सभी निवासी यहीं से पानी लेते थे। तुम्हारे देशवासी बुरे काम करने लगे और पानी गायब हो गया। उसको वापस लाने का अब एक ही रास्ता है।
दीपंकर-इरा (एक साथ) : क्या रास्ता है वह?

रानी :  वही तो बताने आयी हूँ। सुनो 'मैं नहीं तुम! मुझे नहीं तुम्हें! मेरे लिए नहीं, तुम्हारे लिए. ' बस यही सोचना ' और करना होगा तुम्हें। कर सके तो ताल तुरंत पानी से भर जाएगा।

(सहसा रोशनी गायब हो जाती है। दोनों आँखें मलते हैं।)

इरा  : मैं नहीं तुम

दीपंकर : मुझे नहीं तुम्हें

इरा : मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए।

(दोनों कई बार दोहराते हैं।)

दीपंकर. : (हर्ष से-) मैं समझ गया। मैं नहीं तुम.

इरा : (हर्ष से) मैं भी समझ गई मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए-.
दीपंकर. चलो, चलो सबको बताएँ। (जाता है)

इरा  : हाँ हाँ चलो। (जाती है)

(सहसा अंधकार छा जाता है। फिर प्रकाश होता है तो मंच पर चहल-पहल है। स्त्री-पुरुष व्यस्त भाव से आते-जाते हैं।)

पहली स्त्री  : (पुरुष को खींचकर) कई दिन से तुम्हारे पेट में दर्द है।  तुम्हें डाक्टर के पास जाना ही होगा।

पहला पुरुष :  न, न, तुम बहुत थक गई हो, काम मैं करूंगा। तुम आराम करो।
दूसरा पुरुष  : (स्त्री से) भूखी तुम हो। फल तुम खाओ।

दूसरी स्त्री  : नही-नहीं, तुमने तो तीन दिन से खाना नहीं खाया, तुम खाओ।
इरा  : (एक वृद्ध से) बाबा, तुमसे चला नहीं जा रहा है। आओ मैं तुम्हें घर छोड़ आऊँ।

वृद्ध  : अरे बेटी अपने को तो देख क्या हाल है तेरा। तीन दिन से सोयी तक नहीं। न न तू यही बैठ।

तीसरी स्त्री  : (पुरुष से) मैं कहती हूँ भाई साहब इसी तरह खटते रहे
तो बीमार पड़ जाओगे। जाओ अब आराम करो, पहरा मैं दूँगी।
तीसरा पुरुष  : घर मुझे नहीं तुम्हें जाना है। मुझे मालूम है तुम्हारे पैर में चोट लग गयी है।

राजा (नेता से) :  मैं आपका सेवक हूँ। मुझे बताते चलो मैं क्या करूँ।

नेता जी  : नहीं सेवक मैं हूँ मुझे आदेश दें कि मैं कैसे आपसे सहयोग करूँ '

दीपंकर  : (एक वृद्धा से) माँ तुम मेरी पीठ पर सवार हो जाओ। अभी मिनटों में पहुँचाता हूँ।

वृद्धा  : मेरे बच्चे मैं वारी जाऊँ। तीन दिन से तूने साँस नहीं ली।

तू कुछ तो सुस्ता ले। ले ये फल.

. दीपंकर :  न, न माँ, ये फल तुम्हारे लिए हैं।

(ये स्वर एकदूसरे को काटते हैं, बार-बार उठते हैं कि सहसा पानी उमड़ने का स्वर उठता है। सब चौंकते हैं।)

स्त्री. :  यह कैसा स्वर है?

पुरुष : यह कैसी ठंडी बयार चल पड़ी?

वृद्ध. :  यह कैसी सुगंध है?

वृद्धा :  यह तो पानी की गंध है।

(इरा दौड़ते हुए) पानी। पानी आ गया!

दीपंकर. :  ( दौड़ते हुए) ही, हाँ यह पानी है?

(सब चीखते हैं।)

सब पानी. .पानी. आहाहा पानी आ गया?

(तेज धार के उमड़ने का स्वर। सब भागते हैं। उल्लास के स्वर उमड़ते हैं-'पहले तुम', 'पहले तुम।' फिर वे भागते हुए इधर आते हैं। वे भीगे हैं। मस्त हैं।
एक दूसरे पर पानी फेंकते हैं।)

पहला स्वर  : यह सब तुम्हारे कारण हुआ।

दूसरा स्वर :  नहीं तुम्हारे कारण।

(सब एक दूसरे की ओर इशारा करते है।)

तीसर स्वर :  तुम्हारे कारण।

चौथा स्वर. : तुम्हारे कारण।

पाँचवा स्वर : तुम्हारे कारण।

(सहसा राजा आगे आते हैं।)

राजा का स्वर  :  यह सब इरा और दीपंकर के कारण संभव हो सका।
नेता का स्वर :  हाँ, हाँ यह सब उन दोनों के कारण ही संभव हुआ।

इरा-दीपंकर (एक साथ) नहीं, नहीं, हम दो के कारण नहीं, हम सबके कारण।

(तभी सहसा रोशनी उभरती है। रोशनी में से परियों की रानी बोलती है। राजपुरोहित भी बोलते हैं।)
रानी-पुरोहित :  रूपनगर के वासियो! सुनो, इधर सुनो। अगर आप इसी तरह सोचते-करते रहे तो यह ताल कभी नहीं सूखेगा। कभी नहीं

(रोशनी सहसा मिट जाती है। आकृतियाँ भी मिट जाती हैं। रूपनगर के वासी एक क्षण प्रणाम की मुद्रा में झुकते हैं। फिर खिल-खिलाकर एक-दूसरे पर पानी फेंकते हुए- मैं नहीं तुम, ' मुझे नहीं तुम्हें, मेरे लिए नहीं तुम्हारे लिए, पुकारते जाते हैं। परदा गिरता है।)

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