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सागर यादव 'जख्मी' की दो कहानियाँ

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(चित्र - ननकुसिया श्याम की कलाकृति)

 

झूठा इल्जाम

मैं अपने कमरे में बैठा हिन्दी साहित्य की मासिक पत्रिका 'हंस' पढ़ रहा था कि किसी के आने की आहट पाकर मैंने सिर उठाया तो देखा मेरी छोटी बहन सिन्धूं सामने खड़ी है।

''क्या बात है सिन्धू, कोई आया है क्या?''

'' हॉ भइ्या! बाहर रिता मैडम खड़ी है कह रही है कि आप से मिलना है।''

''ठीक है जाओ उन्हें मेरे कमरे में भेज दो।'' रीता मैडम अन्दर आ गयी और मेरे बगल में चारपाई पर बैठ गयी । मैं और रीता जी दोनों एक साथ एक ही कालेज में पढाते थे। उनका घर मेरे पड़ोस में ही था।

''कहिए, मुझ नाचीज से आप का क्या काम पड़ गया ?'' मैंने पूछा।

''बस यूं ही मिलने चले आये । खैर, आजकल आप क्या लिख रहे है?''

''प्रेम कविताऍ।'' कहते वक्त मेरी नजरे शरम से झुक गयी।

''वैसे आप लिखते बहुत अच्छा है।''

''छोड़िए इन बातों को प्रियंका मैम से मोबाइल के बारे में कुछ बात हुयी की नहीं?''

''अभी तक तो नहीं लेकिन कल जरूर बात करूंगी।'' वे नम्रता पूर्वक बोले।

प्रियंका मैम भी हम लोगों के साथ उसी कालेज में पढाती थी। गोरा चिट्टा शरीर, काले केश, झील सी ऑखें और उनपर काले रंग का चश्मा आकर्षण के केन्द्र थे। उनकी सादगी और सुन्दर हैण्ड राइटिंग से मैं बेहद प्रभावित था। हम दोनों सच्चे दोस्त थे दोनों को एक दूसरे पर अटल विश्वास था। फिर भी मैं भी उनसे कोई चीज मांगने से बहुत डरता था। उनके पास नोकिया कम्पनी का एक टच हैण्डसेट था। उसे मैं अपने सैंमसंग हैण्डसेट से बदलना चाहता था। एक दिन मैंने रीता जी से कहा था कि आप उनसे मोबाइल के विषय में बात करके मुझे उनकी मनोदशा बतला दीजिए।

''क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकती हॅू''? रीता जी ने सवाल खड़ा किया।

''हॉ! हॉ !! क्यों नहीं पूछिये जरूर पूछिये एक नहीं सौ सवाल पूछिये'' , मैंने हकलाते हुये जवाब दिया।

''आपने फेसबुक पर एक स्टेट्स अपडेट की है। ''

''बरसों बाद आयी है मेरे,

चेहरे पे हसी,

ये तो असर है,

किसी की मोहब्बत का।''

''हॉ तो क्या हुआ?'' मैं कुछ हडबड़ा सा गया।

''जब से प्रियंका कालेज में आयी है आप कुछ बदले - बदले से लग रहे है। कहीं आप दोनों एक दूसरे से प्यार - वार तो नहीं करते ? '' कहकर वे हॅसने लगी।

रीता जी की बात सुनकर मै ठगा सा रह गया मेरा सिर चकराने लगा।

''देखिये! रीता जी , अगर आप मुझ पर ऐसा झूठा इल्जाम लगायेंगी तो मैं कल से ही कालेज जाना बन्द कर दॅूगा।''

मुझे क्रोधित होता देखकर वे हॅसते हुये बोली - ''डर गये ! डर गये!! मैंने तो मजाक किया था और आप सीरियस हो गये।''

अब जाकर मेरी जान में जान आयी । फिर भी मैंने उन्हें सचेत करते हुये कहा - ''आप भविष्य में कभी भी मुझ पर ऐसा झूठा इल्जाम मत लगाइयेगा।''

''ठीक है भाई दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी, अच्छा तो मैं अब चलती हॅू।''

रीता जी के जाने के बाद मैं भी बच्चों को कोचिंग पढ़ाने चला गया।

अगले दिन रीता जी ने प्रियंका मैम से बात की और मुझे मोबाइल मिल गयी । मोबाइल मिलने के बाद उन्होंने मुझसे कहा - '' आप बहुत भाग्यशाली है, आप के एक बार ही कहने पर प्रियंका मैम ने आपकेा इतनी कीमती मोबाइल दे दी। खैर , आपने मुझे उस शख्स से मिलवाने का वादा किया था जिसे आप हद से ज्यादा प्रेम करते है। जिसे आप अपना खुदा मानते है। मुझे उससें कब मिलवायेंगे।?

'' मंगलवार को सुबह ठीक 11 बजे कालेज में ।'' मैंने जवाब दिया।

मंगलवाल को सुबह ठीक 11 बजे रीता जी ने मुझे मेरा वादा याद दिलाया। प्रत्युत्तर में मैंने प्रियंका मैम की तरफ इशारा कर दिया। सच्चाई जानने के बाद उनकी ऑखें खुली की खुली रह गयी, क्योंकि आज उनका झूठा इल्जाम सत्य में बदल चुका था। पास में खड़े प्रियंका मैम के चेहरे पर मुस्कान खेल गयी। और मैं नतमस्तक खड़ा था।

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आज कल के गुरू

जब किसी इंसान पर हवस का भूत सवार हो जाता है। तो उसका आत्मज्ञान खो जाता है और वह पवित्र रिश्ते को भी कलंकित कर देता है। यासीन जी एक कालेज में वरिष्ठ लिपिक थे। वे विवाह कर चुके थे लेकिन असफल रहा। किसी कारण उनकी पत्नी उन्हें तलाक देकर चली गयी। '' अगर मुझे पता होता कि इस विवाह का अन्त इतना खतरनाक होगा तो मैं विवाह ही नहीं करता।'' यासीन ने कहा। '' किसकी किस्मत में क्या लिखा है कौन जानता है। यह तो सिर्फ खुदा ही जानता है।'' मैंने सहानुभूति प्रकट की।

यासीन का एक पैर लकवा मार जाने से कमजोर हो गया था। उनके सिर पर सावन के काले बादल के समान बाल उगे थे। उनका चेहरा हंसमुख था। लेकिन उनके अन्दर एक ही कमी थी। मन एक और इच्छायें असीम थी । वह अपने जीवन में सबसे ज्यादा रोमांस को महत्व देते थे। उनकी एक मोबाइल की दुकान भी थी। कालेज की छुट्टी होने के बाद वह अपनी दुकान पर जाते थे। वहां से वह सड़क पर आती जाती लड़कियों को गन्दी निगाहों से देखते थे और छींटाकशी भी करते थे। ''मुझे किसी सुन्दर लड़की से अपना सम्बन्ध बनाना चाहिए। मैं इस योग्य तो नहीं हॅू लेकिन अपनी आत्मा की तृप्ति के लिए मुझे कुछ तो करना ही पड़ेगा। मेरी दूसरी शादी न जाने कब तक हो। क्या तब तक मेरी भरी जवानी बेकार जायेगी।'' यासीन ने कहा। उनकी बात सुनकर मैंने कहा - ''अपनी इन्हीं गन्दी हरकतो की वजह से आप कितना बदनाम हो चुके है क्या अभी तलक आपका दिल नहीं भरा? मैं तो कहता हॅू कि आप अफेयर का चक्कर छोड़ दे वरना आप की बची हुयी जिन्दगी भी नरक बन जायेगी।''

''सागर ! तुम मेरी हालत समझने की कोशिश करो।'' यासीन ने कहा।

''खैर, आप ये बताइये अफेयर किसके साथ करना चाहते हैं?'' मैंने सवाल खड़ा किया।

''यार सागर! अपने कालेज की लड़कियां बड़ी जोरदार हैं अगर उनमें से कोई एक फंस जाये तो कैसा रहेगा?'' । यासीन ने जवाब दिया।

''इसका अन्जाम बहुत बुरा होगा क्योंकि आप जैसे विद्वान आदमी को यह शोभा नहीं देता। अगर यह खबर मैनेजर सर तक पहॅुच गयी तो आपके दूसरी टॉग भी बेकार हो जायेगी।'' मैंने व्यंग्यात्मक प्रहार किया।

यासीन साहब जिस कालेज में लिपिक थे। मैं भी उसी कालेज में सहायक अध्यापक था सो मेरा फर्ज बनता था। कि मैं अपने विद्यार्थियों पर कोई ऑच न आने दॅू। यासीन जी की इतनी गन्दी योजना देखकर मैं चकित रह गया।

''सागर! तुम तो शायर हो क्या तुम मुझे कुछ प्रेम भरी शायरी लिखकर दे सकते हो ?

अब मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। ''मैं तुम्हारे इस पाप में भागीदार नहीं बनॅूगा। मैंनेजर सर ने न जाने क्यों तुम जैसे हवसी दरिन्दे को विद्या मन्दिर में इतना ऊॅचा पद सौंपा है। तुम तो चपरासी बनने के काबिल नहीं हो।''

''बड़े आये हो साधु बनने । तुम अखबार नहीं पढते क्या आजकल तो साधु सन्यासी भी अपार सुख उठा रहे है। मैं तो एक आम आदमी हॅू।'' यासीन जी ने मुझे नसीहत दी। यासीन की बातें सीधे मेरे दिल पे लगी और मैं इसका वार सह नहीं पाया। मेरे ऑखों से ऑसू निकल पड़े।

''मैं अपने घर जा रहा हॅू। तुम्हारा रोमांस तुम्ही को मुबारक।'' कहकर मैं अपने घर चला आया ।

कुछ दिन पश्चात् मुझे पता चला कि उन्होंने 12वीं कक्षा की छात्रा मालती शर्मा को अपना निशाना बनाया। वह नादान लकड़ी भी उनसे प्रेम करने लगी है। एक दिन उन्होंने मुझे मालती द्वारा लिखा गया एक प्रेम पत्र भी दिखाया जिसमें स्याही की जगह खून का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि उनका शारीरिक सम्बन्ध भी बन चुका है। गुरू शिष्य के ऐसे नापाक रिश्ते को देखकर मैं दंग रह गया।

दोस्तों! गुरू और शिष्य का रिश्ता पिता-पुत्र, पिता-पुत्री की तरह होता है। यदि कोई शिष्य किसी गलत रास्ते पर जा रहा है तो उसके गुरू का फर्ज है कि वह उसे उस दलदल से बाहर निकाले।

पाप का घड़ा जब भर जाता है तो छलकता जरूर है । धीरे - धीरे यह बात पूरे कालेज में फैल गयी। सभी अध्यापक और बच्चे यासीन पर थूकने लगे। मुझकों पूरा विश्वास था कि अब मैनेजर सर इस हवसी दरिन्दे को कालेज से बाहर निकाल फेंकेंगे। लेकिन यह क्या? मैनेजर सर यासीन से एक शब्द भी नहीं बोले । जब मैंने मैनेजर सर से इस विषय पर बात की तो उन्होंने मुझे मशविरा दिया, ''सागर साहब! आजकल तो ऐसा होता ही रहता है।'' मैनेजर सर के मुख से ऐसी बात सुनकर मैं पत्थर का बुत बन गया और अपने भाग को कोसने लगा कि मैं भी किन हवसी दरिन्दों के साथ अध्यापन कार्य कर रहा हॅू।

नाम - सागर यादव 'जख्मी'

नरायनपुर बदलापुर जौनपुर उ0प्र0

मो0 नं0 8756146096

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