लोकार्पण की कहानी पुस्तक की जुबानी / व्यंग्य / शशिकांत सिंह ‘शशि’

मैं वह पुस्तक हूं जिसे लोकार्पण के लिए मंच पर ले जाया गया था। मेरे पीछे कम से कम एक दर्जन लेखक खड़े थे। मुझे ढ़ाल की तरह कैमरे को दिखा रहे थे। दरअसल उन्हें लेखक कहलाने के लिए एक अदद किताब की जरूरत होती है। उनमें से एक तो मेरा लेखक था और अन्य थे गवाह। वे गवाही दे रहे थे कि इसी बंदे ने यह किताब लिखी है। जनता को उकसा रहे थे किताब पढ़ने के लिए। जनता मुस्करा रही थी। उसे पता रहता है कि ये जो लोकार्पण कर रहे हैं खुद दूसरों की किताब नहीं पढ़ते। चालू फैशन यह है कि लोकार्पण करने वाला बड़ा लेखक मान लिया जाता है। तो बड़ा लेखक कहलाने के लिए भी कम से कम एक दर्जन किताबों के लोकार्पण का अुनभव बटोरना पड़ता है।

कई लेखक तो लिखते कम लोकार्पण ही अधिक करते हैं। कई नामीगिरामी लोग तो इसी ताक में रहते हैं कि किसी की किताब आये और तत्काल लोकार्पित कर दें। खर्च अपनी जेब से भी वहन करना पड़े तो चिंता की बात नहीं है। लोकार्पण की फोटो अगले दिन अखबारों में आ गई साधना सम्पन्न हो गई। पुस्तक, जीवन की शाम आ जाती है। उसे लोकार्पण तक ही दुलार मिलता है। मां.बाप अर्थात प्रकाषक और लेखक दोनों का दुलार उसे लोकार्पण के बाद नसीब नहीं होता।

यह जरूरी नहीं है कि लोकार्पण कोई लेखक ही करे। नेता और अभिनेता भी करते हैं। व्यापारी और बाहुबली भी कभी.कभी कर दिया करते हैं। नेताओं को कोसने वाले लेखक तब सबसे अधिक आनंदित होते हैं जब उनकी किताब किसी मंत्री के हाथों लोकार्पित हो जाया करती है। आप यदि समझना चाहें तो इस पुरस्कारों की राजनीति की तरह देख सकते हैं। पहले तो पुरस्कारों को लेने के लिए राजनीति करो। सरकार के हाथों पुरस्कार ग्रहण करो और कहते चलो. अजी साहब हम ठहरे जन्मजात प्रगतिशील। हम तो जनता के लेखक हैं लेकिन जनता का प्रतिनिधि होने के नाते यदि सरकार सम्मानित करे तो करे। नहीं तो हम इनकी नीतियों से बिल्कुल ही सहमत नहीं हैं। जनता समझ जाती है कि बंदे को नाम का भूख है। सरकारी पुरस्कार चूंकि खूब चर्चा पाते हैं तो बेचारा क्या करे।

सिद्धांत तो कभी भी बदले जा सकते हैं। सरकार तो पांच साल ही रहेगी। मुझे कभी.कभी इतनी हंसी आती है कि क्या कहूं। हंस भी नहीं सकती न। खूब बड़ी-बड़ी बातें मंच पर कहने के बाद जब लोकार्पक एक प्रति किताब अपने घर ले जाता है तो कभी उलट कर नहीं देखता कि जिस लेखक की इतनी तारीफ कर रहा था उसने लिखा क्या है ? यह एक किस्म का भाईचारा है। अहो रूपम् अहो घ्वनि की तरह। तू मेरी तारीफ कर मैं तेरी करूं। लोकार्पक आवरण के अलावा कुछ नहीं देखता। यदि किसी ने कह दिया कि पुस्तक पर बोलो तो लेखक से ही विशय वस्तु पूछकर बातों के पुल बांध दिये। तिल के ताड़ बनाना आता है तभी तो बंदा लेखक है। लोकार्पण तक ही हमारा यौवन है। उसके उपरांत तो निष्ठुर बुढ़ापा शुरू हो जाता है। मुझे आलमारी में कैद कर दिया जाता है। दीमक मुझे चाटते रहते हैं। लेखक दूसरी किताब लिखने लग जाता है। लोकार्पक दूसरे किताबों के लोकार्पण में मशगूल हो जाता है। आम आदमी को तो इन लफड़ों से लेना-देना ही नहीं है। उनके लिए तो सलमान खान हैं ही। कोई कवि होता तो मेरे बारे में भी लिखता.पु स्तक जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, पन्नों पर है धूल और रौनक बेपानी।

शशिकांत सिंह ‘शशि’

जवाहर नवोदय विद्यालय षंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736

मोबाइल.7387311701

इमेल. skantsingh28@gmail.com

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