विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

जरूरी है संस्कारों की मजबूत बुनियाद / आलेख / दीपक आचार्य

image

 

व्यक्तित्व विकास जीवन की पूर्णता का वह माध्यम है जो किसी भी इंसान के लिए जीवन लक्ष्य और बहुविध सफलता प्राप्ति का पूरक एवं पर्याय है।

व्यक्तित्व विकास अथवा जीवन में सफलता का यही अर्थ नहीं है कि हम खूब सारी धन-दौलत कमाने लग जाएं, जमीन-जायदाद अपने नाम करा लें, आलीशान मकान बना लें, भोग-विलास के सारे संसाधन जुटा लें और उन्मुक्त होकर उनका बेहिसाब उपयोग, उपभोेग और शोषण करने लगें, अपने आपको इतना अधिक शक्तिशाली बना लें कि आस-पास के लोग बौने साबित हो जाएं और हमसे दूरियां बनाने लग जाएं, सामाजिक और परिवेशीय समूहों से हम अलग-थलग दिखें और हमेशा यह प्रयास करते रहें कि समुदाय से पृथक हमारी छवि अन्यतम और सर्वश्रेष्ठ हो।

व्यक्तित्व विकास के सारे परंपरागत मानदण्ड और पैमाने अब विफल होते दिखाई दे रहे हैं। एक जमाना था जब इंसान रोजमर्रा से लेकर समाज और परिवेश के तमाम कामों में दक्ष हुआ करता था और कभी उसे यह महसूस नहीं होता था कि किसी कार्य विशेष में वह नाकारा या अयोग्य है।

आमतौर पर एक इंसान की जिन्दगी में जो भी वैयक्तिक और सामाजिक कार्य होते हैं उन सभी में कम से कम सामान्य स्तर की दक्षता हासिल कर लेना ही व्यक्तित्व विकास की नींव हुआ करती है।

हम चाहे कितने पढ़-लिख जाएं, वैभवशाली हो जाएं, अपने आपको दुनिया में महान और प्रभुता सम्पन्न समझने लगें, इसका कोई महत्व नहीं है यदि हम जीवन और जगत के दूसरे कामों या प्रवृत्तियों को पूरा करने-कराने में नाकाबिल हैं।

आजकल व्यक्तित्व विकास का मतलब सिर्फ पैसे कमाने और जमा करने की मशीन बन जाने, भोग-विलास पाने, दूसरों पर आधिपत्य जमाने की कला सीख जाने अथवा अपने आपको शक्तिशाली मानते हुए दूसरों का शोषण करने, अधिकारों का चरम दुरुपयोग करने, औरों को नीचा दिखाकर अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और महान साबित करने के लिए षड़यंत्रों में रमे रहने और समुदाय तथा परिवेश में उपलब्ध तमाम प्रकार की सुख-सुविधाओं और संसाधनों का अपने हक में मुफतिया इस्तेमाल करने तक ही सीमित होकर रह गया है। जबकि ऎसा नहीं होना चाहिए।

व्यक्तित्व के विकास का सीधा सा अर्थ यह है कि हम उन सभी कार्यों में दक्ष हों जो आम इंसान की रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी के निर्वाह के लिए जरूरी हैं, उन सभी प्रकार की सामाजिक, मानवीय, परिवेशीय गतिविधियों में भागीदार बनें, जिनका सीधा संबंध समुदाय के बहुआयामी कल्याण से है।

इस मामले में जो लोग पुराने हो गए हैं उन पर कोई असर नहीं पड़ने वाला क्योंकि बरसों से ये लोग अपनी ही अपनी करतूतों, हरकतों और कारनामों को करते हुए इतने पक्के हो गए हैं कि अब इनमें सुधार की कोई संभावना नहीं है। ये लोग वैसे ही रहने वाले हैं और रहेंगे। इनका निर्णायक ईलाज यमराज के सिवा और किसी के पास नहीं है।

हम सभी लोग सामाजिक नवनिर्माण, चाल, चलन, चरित्र, देशभक्ति, स्वाभिमान, सेवा और परोपकार की बातें खूब बढ़-चढ़ कर करते हैं। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि कितने लोग आज हमारे आस-पास हैं जिनके नक्शेकदम पर चला जा सकता है?

बातें करने में हम सारे के सारे खूब उस्ताद हैं लेकिन अनुकरणीय चरित्र के मामले में कुछ नहीं कहा जा सकता। अब तो समाज के सामने सबसे बड़ा संकट यह हो गया है कि संस्कारहीनता के वर्तमान दौर में किनका अनुकरण करें, कौन इस लायक बचा है कि हम जिसके जीवन से प्रेरणा ले सकें।

हालांकि आज भी बहुत सारे लोग ऎसे जरूर हैं जो सिद्धान्तों और आदर्शों को जी रहे हैं, स्वाभिमानी, ईमानदार और नैष्ठिक कर्मयोगी हैं लेकिन ऎसे लोग जमाने की सम सामयिक स्थितियों को देख कर या तो खुद एकान्तिक जीवन जीने के आदी हैं अथवा सामाजिक और क्षेत्रीय व्यवस्थाओं की वजह से हाशिये पर हैं।

जीवन में हर परिस्थिति में सम और धीर-गंभीर रहने वाले लोग यों भी वितण्डों, षड़यंत्रों और गोरखधंधों तथा सम सामयिक प्रदूषण से भरे हुए हालातों से दूर रहकर अपनी मस्ती में जीने के आदी होते हैं। लेकिन इसका खामियाजा समाज और देश को इस रूप में भुगतना पड़ता है कि उनके ज्ञान और अनुभवों से शेष समुदाय वंचित रहता है।

इन तमाम स्थितियों मेंं आज देश की आशाएँ उस युवा शक्ति पर टिकी हैं जो देश की बहुसंख्य ऊर्जा और शक्ति कही जाती है। विराट युवा शक्ति पर यह भरोसा किया जा सकता है कि वह समाज और देश के उत्थान में अपनी भूमिका अदा कर कुछ नवीन आयाम स्थापित कर पाएगी।

आज के माहौल में सर्वाधिक आवश्यकता राष्ट्रीय चरित्र, संस्कार, स्वाभिमान और नैतिक आदर्शों को आत्मसात करने की और ये ही तत्व हैं जो इंसान, समाज और देश की नींव हैं। इनके बिना समाज निर्माण और राष्ट्रोत्थान की सारी बातें बेमानी हैं।

देशवासियों का परम सौभाग्य है कि भारत अब युग परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। भारतीय स्वाभिमान और परंपरागत गौरव जगा है। इसमेंं नवोन्मेषी सुनहरे भविष्य की बुनियाद को मजबूत करने में जुटने के लिए इच्छाशक्ति और भागीदारी दोनों का परिचय हमें देना है।  समय पर सहभागिता और समर्थन ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।

आज का युवा दिवस हमारे लिए नए संकल्पों का आगाज करने आया है। उत्तरायण का सूरज तीन दिन बाद आने ही वाला है। बहुत सारे संयोग हमारे सामने हैं। अबकि बार पक्का संकल्प लें कि युवा दिवस सार्थक सिद्ध हो और स्वामी विवेकानंद की तरह युवाओं की विराट फौज आने वाले युवा दिवस तक तैयार हो, समाज और देश के काम आए।

युवा दिवस पर सभी युवाओं और अपने आपको युवा मानने वालों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं...।

दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget