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दीपक आचार्य का प्रेरणास्पद आलेख - दिल न तोड़ें प्रतिभाओं का

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बड़ों और बच्चों के बीच खाई खूब बढ़ती जा रही है, बड़ी होती जा रही है। बच्चों की भावनाओं को बड़े समझने के लिए तैयार नहीं हैं और जो बड़े हो गए हैं वे इतने पक्के घड़े हो गए हैं कि उनका दिमाग हैलमेट की तरह हो गया है, न कुछ फर्क पड़ता है, न हलचल ही हो पाती है।

इस मामले में आयु के अन्तर से कहीं ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है हैसियत का। जो बहुत बड़े हो गए हैं या जिन्होंने अपने आपको बहुत बड़ा मान लिया है वे सारे के सारे हवा में उड़ रहे हैं या औरों के द्वारा उड़ाये जा रहे हैं।

इनमें खुद में कोई माद्दा नहीं है लेकिन दूसरे लोग इनमें  हाईड्रोजन से भी अधिक ताकतवर गैस भर कर उड़ाते रहते हैं, और बड़े लोगों को भी इसमें खूब मजा आता है जब आस-पास के लोग उनके कान फूंकते हैं, हवा भरकर उड़ाने की कोशिश करते हैं, उनकी प्रशस्ति और महिमा के झूठे गीत गाते हैं और उन्हेंं ईश्वर की तरह आसमानी फरिश्ते बना डालते हैं। 

जो एक बार जमीन से ऊपर उठ गए हैं, वे उठे तो ऎसे कि जमीन की सारी मिट्टी, जड़ें, हवा और पानी सब कुछ  इनसे दूर हो गया। अब लाख कोशिश करें तब भी जमीन से जुड़ नहीं पा रहे। बहुत सारे लोग खुद हवा में उड़ रहे हैं, और जो बचे-खुचे हैं उन्हें उनके अंधानुचर और इनकी पनाह में पलने वाले लोग हवा में उड़ाते हुए आसमान की ऊँचाइयां दिखा रहे हैं।

आकाओं और नाकाराओं का यह जमीन-आसमान में उड़ान-उड़ान का खेल जाने कब से संसार का मायावी खेल बना हुआ है। अब सब कुछ दो भागों में बंटता नज़र आ रहा है। एक जमीन वाले लोग हैं जिनमें जमीर है।

दूसरे आसमान में उड़ने वाले लोग हैं जिनमें न जमीर दिखता है, न जमीन से कोई रिश्ता। आम और खास दो ही किनारे होते जा रहे हैं। इस मामले में मध्यम मार्ग का कोई सवाल ही नहीं उठता। बड़ा हो या छोटा, हर किसी को चाहिए कि एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करे, एक-दूसरे को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करे।

पर यह तभी संभव है कि जब हम मानवीय संवेदनाओं को सामने रखें, औरों के प्रति सद्भावना और सहिष्णुता रखें तथा आत्मीयता का भाव रखें। इस मामले में कुछ बातें हैं जो प्रतिभाओं को अखरती हैं। जहां कहीं विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं का सम्मान होता है वहाँ अक्सर देखा यह जाता रहा है कि मुख्य अतिथि के हाथों दो-चार प्रतिभाओं को पुरस्कार दिलवा दिया जाता है, इसके बाद दूसरे अतिथियों के हाथों प्रतिभाओं को पुरस्कार लेने को विवश होना पड़ता है।

हर प्रतिभा यही चाहती है कि मंच पर बिराजमान शीर्षस्थ मुख्य अतिथि के हाथों ही पुरस्कार, प्रमाण पत्र, स्मृति चिह्न और सम्मान प्राप्त हो। हर प्रतिभा इन क्षणों को चिरस्मरणीय बनाए रखना चाहती है ताकि जीवन में बायोडेटा में अंकन से लेकर अपने ईष्ट मित्रों और घरवालों के लिए भी यादगार रह सके।

जब इन प्रतिभाओं को शीर्षस्थ की बजाय अन्य अतिथियों के हाथों पुरस्कार, सम्मान और प्रमाण पत्र लेने की विवशता होती है तब इन्हें मन ही मन लगता है कि इनके साथ कुठाराघात हुआ है और उन्हें शीर्षस्थ अतिथि के हाथों पुरस्कार पाने के अवसर से वंचित कर दिया गया है।

हर इंसान के जीवन में ऎसे अवसर बहुत कम बार आते हैं और उसमें भी उन्हें वंचित कर दिया जाए तब इनके दिलों पर कैसी गुजरती है इसका अहसास करना कोई असहज नहीं है। हर इंसान चाहता है कि इन अवसरों का पूरा-पूरा लाभ उसे मिले और उसकी याद वह वर्षों तक संजोये रखे।

अच्छे कामों की स्मृतियां ऊर्जा देती हैं और नवजीवन की प्रेरणा देती हैं इसलिए हर कोई अपनी उपलब्धियों के पन्नों और चिह्नों को बार-बार पलट कर देखना और उनका आनंद पाना चाहता है।  और हम हैं कि चंद लोगों को खुश करने, उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने भर के लिए इन प्रतिभाओं के साथ अन्याय करते हैं, यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

जहां कहीं अवसर आए, शीर्षस्थ अतिथि के हाथों ही यह सब होना चाहिए। आस-पास वालों को साथ रखा जा सकता है ताकि वे भी इन क्षणों के चिरस्थायी गवाह के रूप में रह सकें। प्रतिभाओं के साथ अन्याय न करें, हर अवसर का उन्हें पूरा लाभ दें, उनकी उपलब्धियों को जीवन भर के लिए श्रेष्ठतम यादगार के रूप में स्थापित करने में अपनी ओर से भरपूर सहयोग करें।

यह जिम्मेदारी  आयोजकों की भी है, और मंचस्थ अतिथियों की भी। इन द्वितीयक दर्जे के अतिथियों को चाहिए कि वे भी प्रतिभाओं के हित में त्याग करें और अपनी उच्चाकांक्षाओं को प्रतिभाओं पर हावी न होने दें।

प्रतिभाओं के साथ दूसरा सबसे बड़ा अन्याय होता है उन्हें प्रमाण पत्र से वंचित रखना।  पिछले कुछ बरस से साल भर बहुत सारे आयोजन होते हैं जिनमें बच्चों को खेलकूद, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्यक्रम और दूसरे बहुत से आयोजनों में भागीदार बनाया जाता है।

इनके साथ ही खूब सारी प्रतियोगिताएं साल भर चलती रहती हैं जिनमें स्कूली बच्चों की भागीदारी रहती है। और बहुत से आयोजनों में बड़ी प्रतिभाओं की भी सहभागिता रहती है। इन सभी को पुरस्कार या प्रतीक चिह्न दिए जाते हैं मगर संभागीत्व का प्रमाणपत्र देने में कंजूसी रहती है।

इस कारण से इन प्रतिभाओं के पास ऎसा कोई आधार नहीं होता जिनसे भविष्य में ये अपनी प्रतिभाओं का प्रमाण प्रस्तुत कर सकें, अपने बायोडेटा में अंकन कर इसकी पुष्टि के लिए साथ कुछ दस्तावेज लगा सकें। प्रमाण पत्र ही एकमात्र वह दस्तावेज होता है जो प्रतिभाओं के पराक्रम, उपलब्धियों और संभागीत्व को सिद्ध करता है। इसे देखते हुए सभी संभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे इसका अपने भविष्य में उपयोग कर सकें।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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