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दादासाहब फालके : भारतीय सिनेमा के जनक / आलेख / विजय शिंदे

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दादासाहब फालके : भारतीय सिनेमा के जनक

डॉ. विजय शिंदे

भारतीय सिनेमा के जनक के नाते दादासाहब फालके के नाम का जिक्र होता है और उनकी पहली फिल्म और भारतीय सिनेमा जगत् की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) को लेकर भी कुछ बातों पर प्रकाश डाला है। यहां पर उनके योगदान पर संक्षिप्त दृष्टि डालना जरूरी है उसका कारण यह है कि आज भारतीय सिनेमा जिनकी पहल का परिणाम है वह जिन हालातों से गुजरा, उसने जो योगदान दिया उसका ऋणी है। सिनेमा को लेकर उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों का संक्षिप्त परिचय होना सिनेमा के पाठक को जरूरी है। दादासाहब फालके जी की कदमों पर कदम रखकर आगे भारतीय सिनेमा बढ़ा और करोड़ों की छलांगे भरने लगा है। अमीर खान, सलमान खान, शाहरूख खान के बीच चलती नंबर वन की लड़ाई या इनके साथ तमाम अभिनेता और निर्माताओं की झोली में समानेवाले करोड़ों के रुपयों में से प्रत्येक रुपैया दादासाहब जैसे कई सिनेमाई फकिरों का योगदान है। अतः तमाम चर्चाओं, विवादों, प्रशंसाओं, गॉसिपों के चलते इस इंडस्ट्री के प्रत्येक सदस्य को सामाजिक दायित्व के साथ सिनेमाई दायित्व के प्रति भी सजग होना चाहिए। अगले एक मुद्दे में सौ करोड़ी क्लब पर प्रकाश डाला है, परंतु इससे यह साबित होता नहीं कि वह फिल्म भारतीय सिनेमा का मानक हो। फिल्म इंडस्ट्री में काम करनेवाला प्रत्येक सदस्य याद रखें कि हमारे जाने के बाद हमने कौनसे कदम ऐसे उठाए हैं, जिसकी आहट लंबे समय तक सुनाई देगी और छाप बनी है। अपनी आत्मा आहट सुन न सकी और छाप नहीं देख सकी तो सौ करोड़ी कल्ब में दर्ज किए अपने सिनेमा का मूल्य छदाम भी नहीं होगा। भारतीय सिनेमा के इतिहास में क्लासिकल और समांतर सिनेमा का एक दौर भी आया जो उसकी अद्भुत उड़ान को बयां करता है। इन फिल्मों के निर्माण में कोई व्यावसायिक कसौटी थी नहीं केवल लगन, मेहनत, कलाकारिता, अभिनय, संगीत, शब्द, गीत, विषय, तकनीक, सादगी, गंभीरता... की उत्कृष्टता थी, जो सच्चे मायने में सिनेमा के जनक को सलाम था और उनके द्वारा तैयार रास्ते पर चलने की तपस्या थी। हाल ही के वर्षों में बनती कुछ फिल्मों को छोड़ दे तो केवल व्यावसायिता, सतही प्रदर्शन, सस्ते मनोंरंजन के अलावा कुछ नहीं है कहते हुए बड़ा दर्द होता है...।

भारतीय सिनेमा के जनक दादासहाब फालके का पूरा नाम धुंड़िराज गोविंद फालके है। उनका जन्म 30 अप्रैल, 1870 में नासिक (महाराष्ट्र) के पास त्र्यंबकेश्वर गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आरंभिक शिक्षा अपने घर में ही हुई और आगे चलकर उनका प्रवेश मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ आर्टस् में हुआ। वहां उन्हें छात्रवृति भी मिली और उससे उन्होंने कॅमरा खरीदा। जे. जे. स्कूल ऑफ आर्टस् से शिक्षित दादासाहब प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार थे। इस तरह प्रशिक्षित और सृजनशील होना उनके लिए सिनेमा बनाते वक्त अत्यंत लाभकारी हुआ। वे मंच के अनुभवी अभिनेता थे, नए प्रयोगों के शौकिन थे और न केवल शौकिन उसको सत्य में उतारने की कोशिश भी जी-जान से करते थे। आगे चलकर उन्होंने कला भवन बड़ौदा से फोटोग्राफी का पाठ्यक्रम भी पूरा किया। फोटो केमिकल प्रिटिंग में उन्होंने कई प्रयोग भी किए, जिस साझेदार के साथ जुड़कर प्रिटिंग प्रेस में उतरे थे, उससे अचानक साझेदारी वापस लेना और आर्थिक सहयोग को बंद करना उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। उस समय उनकी उम्र 40 थी, व्यवसाय में निर्मित गंभीर हालातों से उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हुआ और बात-बात पर गुस्सा करने लगे। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में ‘क्राइस्ट ऑफ लाईफ’ (ईसामसीहा की जिंदगी) फिल्म देखी और इस फिल्म ने उनके आहत स्थितियों को मानो चावी दी। उनके अंदर कई कल्पनाओं ने संभावनाओं को तौला और पत्नी सरस्वती देवी ने पति के साहस को अपने पलकों में सजाकर उनके हां में हां भरी। दोस्तों ने कुछ शंका-आशंकाओं के चलते स्वीकृति दी और धुंड़िराज गोविंद फालके जी के जवान मन और आंखों को पंख लगे।

 

दादासाहब फालके (सन् 1870 से 1944)

दादासहब फालके जी के व्यापारी दोस्त नाड़कर्णी ने व्यापारी व्याजदर से पैसे देने की पेशकश की और उससे पैसे उठाकर, जहाज में बैठकर फरवरी 1912 में लंदन रवाना हो गए। उनका यह साहस अन्यों के लिए अंधेरे में तीर चलाने जैसा था, परंतु शायद फालके जी ने मन ने ठान ही लिया था कि इस जादू में अपने आपको निपुण बनाना ही है। लंडन में उनका किसी से परिचय नहीं था। केवल ‘बायस्कोप’ पत्रिका को और उसके संपादक को इसीलिए जानते थे कि यह पत्रिका वे नियमित मंगाकर पढ़ा करते थे। लंदन में दादासाहब ‘बायस्कोप’ पत्रिका के संपादक कॅबोर्ग को मिले और वह इंसान भी दिल से अच्छा निकला और दादासाहब का उत्साह दुगुना हो गया। कॅबोर्ग उन्हें विभिन्न स्टूड़ियो, सिनेमा के विभिन्न उपकरणों और केमिकल्स की दुकानों पर लेकर गए। सिनेमा निर्माण के लिए आवश्यक सामान दादासाहब ने खरीदा और वे 1 अपैल, 1912 में मुंबई वापस लौटे। सारी दुनिया में संघर्ष करके अपने मकाम पर पहुंचनेवाला प्रत्येक इंसान दादासाहब के 1912 में किए इस साहस, संघर्ष, आवाहन और कठिनाइयों की कल्पना कर सकता है। वापसी के बाद ‘राजा हरिश्चंद्र’ की पटकथा तैयार हो गई और तमाम कलाकार मिले परंतु महारानी ताराराणी की भूमिका के लिए कोई महिला तैयार नहीं हो पाई। बॉलीवुड़ और दुनिया के अन्य सिनेमाओं में अभिनय के मौके की तलाश करती कतार में खड़ी लड़कियों को देखकर आज दादासाहब को महिला अभिनेत्री खोजने पर भी नहीं मिली इससे आश्चर्य होता है। दादासाहब वेश्याओं के बाजार और कोठों पर भी गए और हाथ जोड़कर महाराणी तारामती के भूमिका के लिए नम्र निवेदन किया। (इस दौर में दादासाहब फालके के वरिष्ठ दोस्त चित्रकार राजा रविवर्मा के जीवन से जुड़े प्रसंग की याद आ रही है, उनके देवी-देवताओं के चित्रों की और अन्य चित्रों की प्रेरणा, चेहरा, नायिका की। उस प्रेरणा ने राजा रविवर्मा के विरोध में देवताओं के ठेकेदारों से चलाए मुकदमें के दौरान कहे वाक्य की याद देती है, वकील और उच्चभ्रू समाज की ओर मुखातिब होकर वह कहती है कि ‘इस आदमी ने एक मुझ जैसी औरत को देवी बनाया और आप जैसों ने उसे वेश्या!’ शायद दादासाहब के हाथों से किसी स्त्री को सिनेमाई दुनिया के ताज पहनने की ताकत का अंदाजा उस समय तक नहीं आया था।) वेश्याओं ने दादासाहब की बात को हवा में उड़ाते हुए बड़ी बेरुखाई से जवाब दिया कि "उनका पेशा फिल्मों में काम करनेवाली बाई से ज्यादा बेहतर है।’ रास्ते में सड़क किनारे एक ढाबे पर दादासाहब रुके और चाय का ऑर्डर दिया। वेटर चाय का गिलास लेकर आया, दादा ने देखा कि उसकी उंगलियां बड़ी नाजुक है और चाल-ढाल में थोड़ा जनानापन है। उसने दादा के तारामती के प्रस्ताव को मान लिया। इस तरह भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की नायिका कोई महिला न होकर पुरुष थी। उसका नाम था अण्णा सालुंके।" (हिंदी सिनेमा : दुनिया से अलग दुनिया, पृ. 17)

मुंबई के दादर में पहली फिल्म का शूटिंग शुरू हुआ। सूरज की रोशनी में दिन को शूटिंग और रात में उसी जगह पर पूरी यूनिट के लिए खाना बनता था। सरस्वती देवी के साथ मिलकर सारी टिम खाना बनाने में योगदान करती थी। किचन और खाना खत्म होने के बाद दादासाहब और उनकी पत्नी सरस्वती देवी फिल्म की डेवलपिंग-प्रिटिंग का काम करते थे। अपैल 1913 में फिल्म पूरी हो गई और 21 अप्रैल, 1913 को मुंबई के ऑलंपिया थिएटर में चुनिंदा लोगों के लिए पहले शो का आयोजन किया। चुनिंदा दर्शकों ने इस फिल्म को पश्चिमी सिनेमा के तर्ज पर देखा और प्रेसवालों ने भी इसकी उपेक्षा की। परंतु दादासाहब इन आलोचनाओं के बावजूद अपनी निर्मिति से उत्साहित थे, आश्वस्त थे और उनको यह भी भरौसा था कि आम जनता और दर्शक इस फिल्म को सर पर बिठाएंगे। आगे 3 मई, 1913 कॉरोनेशन सिनेमा थिएटर में जब इसे आम जनता के लिए प्रदर्शित किया तो उसने दादासाहब के भरौसे को सच साबित किया। इसके बाद वे रुके नहीं और तुरंत नासिक में उन्होंने कथा फिल्म ‘मोहिनी भस्मासूर’ को बनाया। रंगमंच पर काम करनेवाली अभिनेत्री कमलाबाई को फिल्म के भीतर मौका दिया। अर्थात् दादासाहब की बदौलत ‘राजा हरिश्चंद्र’ में न सही अगली फिल्म में एक स्त्री ने किरदार निभाया और वह भारतीय सिनेमा की पहली स्त्री अभिनेत्री भी बनी। ‘पीठाचे पंजे’ (1914), ‘लंका दहन’ (1914), ‘गंगावतरण’ (1937) आदि हिट फिल्में के साथ कई कलाकारों को इस इंडस्ट्री में स्थापित करने का कार्य उन्होंने किया है।

दादासाहब अपने अंतिम दिनों में घोर आर्थिक तंगी का सामना कर चुके थे। चारों ओर से घिर चुके और बाजार से उठाए पैसों के कई मुकदमें भी शुरू हो गए। 16 फरवरी, 1944 को मुफलिसी के चलते नासिक में उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके मौत के पश्चात् भारतीय फिल्म इंडस्ट्री बड़ी बेपरवाही से और संवेदनहीनता के साथ पेश आई। दादासाहब फालके जी का 1970 जन्म शताब्दी वर्ष था और भारत सरकार ने इनके योगदान को ध्यान में रखकर फिल्म इंडस्ट्री में अतुलनीय योगदान देनेवाले व्यक्ति को ‘दादासहाब फालके’ जी के नाम से पुरस्कार देना शुरू किया। इस पुरस्कार की एक ही कसौटी मानी गई है कि उस व्यक्ति का भारतीय सिनेमा के लिए आजीवन योगदान हो।

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देविका रानी और अशोक कुमार ‘अछूत कन्या’ (1936)

पहला ‘दादासाहब फालके’ पुरस्कार बॉंबे टॉकिज की मालकिन और फिल्म अभिनेत्री देवीका रानी को दिया गया। अर्थात् भारत सरकार की पहल से भारतीय सिनेमा के जनक को दुबारा पहचान मिली और भारतीय सिनेमा के नवीन सितारे अपने पुरखों के प्रति, इतिहास के प्रति, जिम्मेदारी और कलाकारिता के प्रति सजग भी हो गए।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र और भारतीय सिनेमा – (सं) कमला प्रसाद, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2010.

2. सिनेमा : कल, आज, कल – विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006.

3. हिंदी सिनेमा : दुनिया से अलग दुनिया – गीताश्री, शिल्पायान प्रकाशन, दिल्ली, 2014.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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