विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

’16 आने 16 लोग’ में कृतिकार का कृतित्व भी 16 आना है / डॉ0 विवेकी राय

image

        बहुत आत्मविश्वास और अध्ययन ऊर्जा लेकर हिन्दी में एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। उस पर ध्यान जाना स्वाभाविक है। मैं यहाँ कृष्ण कुमार यादव की कृति  '16 आने 16 लोग’ की चर्चा कर रहा हूँ । इतने विशाल साहित्य-जगत में से सोलह लोगों का चुनाव और फिर उन्हें सोलह आना निर्धारित कर प्रस्तुत करना वास्तव में बहुत ही साहस का कार्य है। पाठक के मन में एक जिज्ञासा उठ सकती है कि ऐसा करने में वह कौन सी कसौटी रही है जिस पर कस कर कोई साहित्यकार सोलह आना अर्थात् शतप्रतिशत उच्चस्तरीय और सही रूप में सामने आयेगा ? डाॅ0 बद्री नारायण तिवारी ने पुनर्पाठ रूप में प्रस्तुत कृति के विषय में अपनी भूमिका में इस ओर कुछ संकेत किया है, ’’इन लेखों में चर्चित मनीषयों की रचनाधर्मिता समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बन कर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवम् गतिशीलता की राह दिखाती है।’

उक्त टिप्पणी से कृष्ण कुमार की दिशा दृष्टि की आहट मिलती है। किसी साहित्यकार ने समय पर, साहित्य पर और समाज पर कितना स्वस्थ प्रभाव छोड़ा है, यह मुख्य बात है। लेखक ने अपने विमर्श में जिन सोलह साहित्यकारों का चयन किया है उन्हें उक्त परिप्रेक्ष्य में पूरी समग्रता से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। छोटे निबंधों  के ढाँचे में पूरे कसाव और संतुलन के साथ लेखक पूरे दायित्व के साथ एक-एक कदम बढ़ता है। प्रयत्न रुचिकर बनाने का भी होता है और इसी के साथ समीक्षक और विश्लेषक दृष्टि की मौलिकता भी सुरक्षित रखनी है। वास्तव में पुनर्पाठ एक श्रमसाध्य कार्य है। उसमें कुछ नये तथ्य, कुछ नये संवाद सूत्र और दिशा-संकेत यदि नहीं उभरे तो मात्र कही-सुनी बातों के पिष्ट प्रेषण से गंभीरता आहत होती है।

प्रस्तुत पुस्तक के लेखक ने उक्त संदर्भ में गंभीरता का भरपूर रूप से ध्यान रखा है। वर्णन को विश्लेषण रूप देकर लेखक बहुत सजगता के साथ निष्कर्षों तक पहुँच जाता है। इस कृति में हिन्दी में कुछ कम चर्चित परंतु महत्वपूर्ण कश्मीर की सूफी परंपरा के कवि अब्दुल रहमान ’राही’ की जमकर चर्चा हुई है। रवीन्द्र नाथ टैगोर, नागार्जुन, निराला, अज्ञेय, राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी आज भी और गोपाल दास नीरज आदि के साथ इस कश्मीरी कवि को मंच देने में लेखक की समग्रतावादी दृष्टि का परिचय मिलता है। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त ’राही’ के कुछ श्रेष्ठ-संतुलित राष्ट्रीय विचारों को प्रस्तुत करते हुए लेखक ने जो अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की है वह ध्यानाकर्षक है, ’’कवि के पास शब्दों की बहुत बड़ी सम्पदा होती है। कहते है, व्यवस्था बदलने के लिए किसी नारे की जरूरत नहीं बल्कि सोच बदलने की जरूरत है और साहित्य के पास इसकी काबिलियत है। तभी तो रहमान राही कहते हैं कि यदि मैं साहित्यकार नहीं होता तो कोई साज बजाकर रूह को शांत करता, सियासत के क्षेत्र में तो नहीं जाता।’’

उक्त टिप्पणी में चंद शब्द-’संकेतों में सियासत (पृष्ठ-110) के ऊपर साहित्य को प्रतिष्ठित कर उसे सम्मानित किया है और उसकी शक्ति की पहचान को प्रस्तुत किया है। कवि की शब्द-शक्ति चूक नहीं गयी है। व्यवस्था बदलने के लिए इसकी उपयोगिता सम्बन्धी उक्त विचार लेखक की निभ्र्रान्त चिन्तन-दिशा का परिचायक है। इसी प्रकार कवि नार्गाजुन के विपुल सृजन-कर्म के विश्लेषण से गुजरते हुए लेखक फिर उसी बिन्दु पर उँगली रखता है जो कवि की शब्द सम्पदा से सोच बदलने और फिर व्यवस्था बदलने से संबंधित है, ’’आम जन की आवाज को लाठियों के दम पर सत्ता-तंत्र द्वारा दबा दिया जाता है, वहाँ नागार्जुन  की प्रासंगिकता स्वतः रेखांकित हो जाती है।’’ (पृष्ठ-29)

इस प्रकार स्पष्ट है कि समय, समाज और साहित्य को प्रभावित करने वाले परिवेश के साथ उस परिवेश को अनुकूल परिवर्तनकारी आयाम देने वाले सृजन कर्म की पहचान कृष्ण कुमार यादव में है और वे इसे अपने गहन अध्ययन की छाप के साथ प्रस्तुत करते हैं। चूँकि उस अध्ययन को पूरी सहृदयता और चिन्तनात्मक सजगता के साथ भीतर पचाकर लिखते हुए दिख रहे हैं, अतः उसमें मौलिकता और विश्वसनीयता मिल रही है। अृमता प्रीतम के विषय में उन्होंने लिखा, ’’उन्होंने परंपराओं को जिया तो दकियानूसी से उन्हें निजात भी दिलायी। आधुनिकता उनके लिए फैशन नहीं जरूरत थी। यही कारण था कि वे समय से पूर्व आधुनिक समाज को रच पाई।’’ (पृष्ठ-86) इसी प्रकार अज्ञेय के मानवतावाद, उनके खुलेपन और बँधने के विरूद्ध बेचैनी और उनके ’परम वक्तव्य’ वाले विचारक-विद्रोही कवि रूप के निष्कर्षों तक वे बहुत विश्वास के साथ पहुँचते दृष्टिगोचर होते हैं। कुल मिलाकर एक बहुत खूबसूरत इन्सान, खूबसूरत मन और खूबसूरत चिन्तन-संवेदन की मुद्रा वाले सर्जक विश्लेषक के रूप में कृष्ण कुमार यादव, हमारे सामने आते हैं। सोलह आने सोलह लोगों के विवेचन वाली उनकी कृति और उसमें निहित कृतित्व भी मुझे ’सोलह आना’ लगा है।

पुस्तक -  16 आने 16 लोग 

लेखक - कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर -342001

पृष्ठ - 120     मूल्य - रू0 250/-     

प्रकाशक - हिन्द युग्म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016

समीक्षक - डाॅ0 विवेकी राय, बड़ी बाग, गाजीपुर (उ.प्र.)-233001  मो.-09936031112

=========

रचनाकार फ़ेसबुक पेज पर हमें पसंद करें.

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget