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पाठक ही वापस दिला सकते हैं कविता का नैसर्गिक स्वास्थ्य / मनोज मोक्षेंद्र

आज कविता का भाव-पक्ष और कला-पक्ष दोनों ही इस कारण से आलोच्य हैं कि उसमें कविताई की गंध लुप्तप्राय घोषित की जा रही है। पाठक सरल, सहज, गेय और शृंगारिक कविताओं की मांग करता है जबकि आज का कवि या तो ऐसी छांदिक कविताओं के सृजन में समर्थ नहीं है या वह विद्यमान परिस्थितियों में उपज रहे ऊष्ण विचारों के संप्रेषण के लिए छंदबद्ध रचनाओं को उपयुक्त नहीं मानता। इन दो कारणों से कविता के बाजार में मंदी का दौर चल रहा है।

अस्तु, यह कहना सर्वथा अनुचित है कि कविता अपनी कविताई खो चुकी है। दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने मनोरंजन की थाली में इतने ढेर-सारे मनोविनोद और हास्य के फूहड़ व्यंजन परोस रखे हैं कि पाठक उन्हें छोड़, साहित्य-विलोचन की ज़हमत नहीं उठाना चाहता। जिस तरह फास्टफूड के इस दौर में पारंपरिक रसोई में विधिवत मेहनत-मशक्कत से बनाए जाने वाले व्यंजन बिल्कुल पसंद नहीं आ रहे हैं उसी तरह चुटकुलेबाजी और मसखरेबाजी के बजाय गंभीर अनुभूतियों और खारे अनुभवों से पोषित विचारों और भावों के जल में कोई डुबकी लगाना नहीं चाहता। इसलिए, साहित्य आम आदमी के रोज़नामचे में हाशिए पर है। यों भी, रोज़गार-धंधे के लिए माथापिच्ची और आपाधापी से निपट चुकने के बाद आम आदमी तनाव-मुक्त होने के लिए बस, 'इनडोर एंटरटेनमेंट' से ही वास्ता रखना चाहता है। साहित्य और साहित्यकारों के प्रति उसका जुमला जग-जाहिर है--भांड़ में जाए, नैतिकता, संवेदनशीलता, आत्मीयता और जगहिताय सेवा-भावना; इस कविता की ऐसी की तैसी। भला, ऐसी मानसिकता के चलते, आदमी को संवेदनशील बनाने वाली कविता उसे नैतिकता का पाठ कैसे पढ़ा सकती है?

हम पाश्चात्य सोच के अपनी संस्कृति पर हावी होने का इल्ज़ाम आम आदमी पर बेवज़ह थोप रहे हैं। जो कुछ भी हम कर रहे हैं--वह पाश्चात्य संस्कृति की नकल पर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विरोध में कर रहे है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना इसके समन्वयवाद में बसती है जबकि हम हर प्रकार से समाज को छिन्न-भिन्न करने पर तुले हुए है। अपनी इसी आपत्तिजनक प्रवृत्ति के कारण हम समाज में समन्वय स्थापित करने वाले कविता के मूल स्वर की अनसुनी कर चुके हैं। एक विशेष बात यह है कि कविता के ककहरे से पूर्णतया अनभिज्ञ 'कवियों' ने कविता के स्तर को इतना गिरा दिया है कि काव्य-मंचों के कविता-पाठ टी.वी. की बदतमीज़ कॉमेडियों से बेहतर नहीं हैं। इस प्रकार कविता बीमार हो चली है और इसकी सेहत में सुधार के लिए कुछ ख़ास नहीं किया जा रहा है। 'नीम हकीम ख़तरे जान' की तर्ज़ पर बहुसंख्यक कविगण इसकी रुग्णता को दूर करने के बजाय, इसे ऐसे विषाणुओं से संक्रमित करते जा रहे हैं जिनसे आम आदमी बचने के लिए सारे यत्न कर रहा है। निःसंदेह, उनके उपचारार्थ औषधियों के 'साइड इफ़ेक्ट्स' से कविता के अंतरंग भी ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। कविता के लीवर, किडनी, फेफड़े और दिल सभी धीरे-धीरे फेल होते जा रहे हैं। लिहाजा, अब भी समय है। हमें कुछ ऐसी प्राकृतिक चिकित्सा या फिज़ियोथिरेपी के नुस्खे पर अमल करना होगा ताकि कविता का नैसर्गिक स्वास्थ्य उसे वापस मिल सके। निःसंदेह, यह महती काम पाठक ही कर सकते हैं।

(समाप्त)

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