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राष्ट्रवाद से भटकता इंडिया / सुशील कुमार शर्मा

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हर देशवासी कहता है की उसे अपनी मातृभूमि से ,अपनी मिटटी से प्रेम है।  किन्तु क्या हम वाकई अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हैं या सिर्फ छद्म देशभक्ति का लबादा ओढ़े रहते हैं। वैश्वीकरणके इस दौर में देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता के मायने बहुत संकुचित हो गए हैं। 1947 में कहने को तो हम अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हो गए किन्तु विचारणीय बात यह है कि जिन कारणों से हमारे ऊपर विदेशियों ने एक हज़ार सालों तक राज्य किया क्या वो कारण समाप्त हो गए ?उत्तर है नहीं एवं इसका कारण हैं हमारे अंदर राष्ट्रीयता का आभाव।
राष्ट्र कोई नस्लीय या जनजातीय समूह नहीं होता वरन ऐतिहासिक तौर पर गठित लोगो का समूह होता है,जिसमे धार्मिक ,जातीय एवं भाषाई विभिन्नताएं स्वाभाविक हैं। किसी भी राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए राष्ट्रीयता की भावना बहुत आवश्यक है।  राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता एक ऐसी वैचारिक शक्ति है जो राष्ट्र के लोगों को चेतना से भर देती है एवं उनको संगठित कर राष्ट्र के विकास हेतु प्रेरित करती है तथा उनके अस्तित्व को प्रमाणिकता प्रदान करती है।
भारत हमारी माता है इसके नाम पर हमें प्रत्येक बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। किन्तु हम उसका ही शोषण कर रहे है। सामाजिक ,आर्थिक ,राजनैतिक तरीकों से राष्ट्रवाद को अपमानित कर रहे हैं। भगतसिंह ,शिवाजी ,सुभाषचन्द्र बोस ,अशफाक उल्ला खां एवं गांधीजी जैसे वीरों की बलिदानी परम्पराएँ अब हमें प्रेरणा प्रदान नहीं करती हैं। राष्ट्रीय त्यौहार अब बोझ लगने लगे है और औपचारिक हो कर रह गए हैं। अधिकांश युवा विकृत संस्कारों एवं आचरण में लिप्त होकर हमारी परम्पराओं का उपहास उड़ाते कही भी सड़क पर दिख जाएंगे। संविधान का 'भारत ' कहीं लुप्त हो रहा है और 'इंडिया 'भारतीय जन मानस की पहचान बनता जा रहा है। आज की पीढ़ी के लिए भारत के तीर्थ स्थल ,स्मारक ,वनवासी आदिवासी ,सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराएँ सब गौण हो गईं हैं। उनके लिए इंग्लैंड ,अमेरिका में पढ़ना एवं वहां  की संस्कृति को अपनाना प्रमुख उद्देश्य बन गया है।
भारतीय राष्ट्रीयता के वाहक राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद  ने भारतीय संस्कृति को गौरव गरिमा प्रदान की है ,स्वामी विवेकानंद तो भारत की पूजा करते थे उनके अनुसार भारतीयता के बिना भारतीय नागरिक का अस्तित्व शून्य है भले ही वह कितने भी व्यक्तिगत गुणों से संपन्न क्यों न हो। आज की युवापीढ़ी इनके पदचिन्हों पर न चल कर सिनेमाई नायकों एवं नायिकाओं को अपना आदर्श बना रही है।
   व्यक्तिगत स्वार्थ प्रबल हो गए हैं ,राजनीति स्वार्थपरक एवं नैतिकता विहीन होकर निरंकुश हो चुकी है। संस्कारित शिक्षा का आभाव है। परिवार विखंडित होकर अपने अस्तित्व से लड़ रहे हैं। विद्यालय किताबों एवं मशीनों को सिखाने वाले केंद्र बन कर रह गए हैं। भारतीय समाज एवं राजनीती में सांस्कृतिक बिखराव स्पष्ट नजर आने लगा है। दुष्प्रचार एवं दुराग्रह सबसे प्रसिद्ध औजार बन कर उभरे हैं। हर कोई अपना अपना समूह बना कर अपने विचार दूसरों पर थोपना चाहता है। मीडिया भी खेमों में बँट कर अपने मूल आचरण निष्पक्षता को छोड़ कर व्यवसायिक हो चुका है। बुद्धिजीवी एवं लेखक वर्ग संवेदनाओं को छोड़ कर राजनीती की भाटगिरी में व्यस्त हो गया है अपने स्वार्थों की सिद्धि न होता देख कर बौखला कर सम्मान वापिस करने पर उतारू है।
भारत में निवास करने वाले सभी समाज एवं वर्गों की मानसिक एकता से ही राष्ट्रवाद विकसित होता है। सामूहिक अस्मिता के आभाव में राष्ट्रीयता की कल्पना व्यर्थ है। भारतीय सांस्कृतिक एकता का अर्थ सभी धर्मों एवं वर्गों के समन्वय से उपजी राष्ट्रीयता है। जब तक भारतीय संस्कृति को धर्मों की उपासना पद्धति से जोड़े रखेंगे तब तक सम्पूर्ण राष्ट्रीयता की भावना को अनुभूत करना नामुमकिन है।
दूसरी भाषाओं का ज्ञान एवं उनको सीखना जरूरी है लेकिन हमारी अस्मिता हमारी मातृभाषा होती है। अगर हम अपनी मातृभाषा को छोड़ कर अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा को प्रमुखता देंगे तो निश्चित ही हम राष्ट्रीयता की मूल भावना से भटक रहे हैं।हमें समझना होगा की राष्ट्रवाद की भावना 'वसुधैव कुटुंबकम 'की भावना से आरम्भ हो कर आत्म बलिदान पर समाप्त होती है।

सुशील कुमार शर्मा

                ( वरिष्ठ अध्यापक)

           गाडरवारा

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