सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

मोहन राकेश के नाटकों में प्रतिबिंबित बदलता सामाजिक परिवेश / स्वप्ना नायर,

मोहन राकेश के नाटकों में प्रतिबिंबित

बदलता सामाजिक परिवेश

स्वप्ना नायर, तमिलनाडु कोयमबत्तुर कर्पगम

विश्वविद्यालय में डॉ. के.पी.पद्मावी अम्मा के

मार्गदर्शन में पी. एच. डी. के लिए शोधरत

मोहन राकेश बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार है । किंतु नाटककार के रूप में उनका स्थान सर्वोपरी है । आधुनिक हिन्दी नाटक के विकास यात्रा में ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ तथा ‘आधे - अधूरे’ ने महत्वपूर्ण योगदान निभाया है ।

नाटक के बारे में राकेश की धारणा है कि जिस नाटक में रंग मंचीय अपेक्षाओं को उपेक्षा हुई, साहित्यिक मूल्य रहते हुए भी नाट्य कृति नहीं मानी जा सकती। यह कथन से स्पष्ट होता है कि नाटक की संपूर्णता अभिनय – प्रदर्शन में निर्भर है । इस दृष्टि से ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘आधे - अधूरे’ और ‘पैर तले की जमीन’ दूसरों को नमूना बनकर रहता है ।

आषाढ़ का एक दिन

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक की श्रृंखला में ‘आषाढ़ का एक दिन’ एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उल्लेखनीय है । यह राकेश का सर्वप्रथम, बहुचर्चित तथा लोक प्रिय नाटक है । इसमें कवि कालिदास को एक प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ में ऐतिहासिक पात्रों के साथ काल्पनिक पात्र भी है । राकेश ने इतिहास और कल्पना के सामंजस्य से प्राचीन और अर्वाचीन तथ्यों को समन्वित करके शाश्वत सत्य को युगानुरूप पुष्ट किया है । इस नाटक का कालिदास इतिहास का कालिदास नहीं, राकेश – कालीन कालिदास है ।

लहरों के राजहंस

‘लहरों के राजहंस’ मोहन राकेश का दूसरा, सशक्त नाटक है । ‘आषाढ़ का एक दिन’ यदि भावना में भावना का वरण की कहानी है तो ‘लहरों के राजहंस’ नारी के आकर्षण – विकर्षण की अनुभूति की अभिव्यक्ति है । एक में समर्पित नारी का चित्रण है तो दूसरे में रूप पर गर्व करने वाली नारी की विविध मन स्थितियों के संदर्भों का आलेखन है । कालिदास अपार मानसिक संघर्षों से पीड़ित आधुनिक मानव का प्रतिरूप तो नन्द प्रवृत्ति और निवृत्ति में पिसकर छटपटाते हुए प्राणों को लेकर जीवन के चौराहे पर खड़ा है । इसमें नाटककार राकेश ने भौतिकता और आध्यात्मिकता के मध्य उलझे हुए व्यक्ति की चेतना को नन्द और सुन्दरी के द्वंद्व के माध्यम से मुखरित करने का प्रयास किया है ।

आधे – अधूरे

यह नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ की तुलना में भिन्न कोटि का नाटक है । आलोच्य नाटक में आज के मानव की अनियंत्रित एवं अंतहीन यंत्रणाओं के बीच नारी मुक्ति भावना, वैवाहिक संघर्षों की विडंबना, पुरुष के अधूरेपन तथा विघटनशील जीवन मूल्यों का प्रकर्ष है । समूचा नाटक घर के चार दीवार के अंदर के अधूरापन की कथा व्यंजित करता है ।

‘आधे – अधूरे’ में राकेश ने रूमानियत और इतिहास के संदर्भों की उपेक्षा करके औसत दर्जे के आदमी को अपनी विषय वस्तु का आधार बनाया है ।

संक्षेप में कहें तो ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘लहरों के राजहंस’ की तुलना में ‘आधे - अधूरे’ हिन्दी नाटककारों की इक्कीसवीं सदी में जाने वाली पीढ़ी के लिए चुनौती के नवीन आयाम उद्घाटित करता ।

पैर तले की ज़मीन

‘पैर तले की ज़मीन’ मोहन राकेश का अंतिम, किंतु अधूरा नाटक है जिसे उनके आत्म मित्र कमलेश्वर ने राकेश के मृत्यु के बाद पूरित किया । अनिता राकेश के शब्दों में :- “ पैर तले की ज़मीन ” को अपनी आँखें मूंद जाने से वर्षों पहले ही राकेश ने लिखा था । जिस दिन धोखा लेकर वे सदा के लिए चले गये थे तब भी टाइपरैटर पर इसी टक का एक पृष्ठ, आधा टाइप किया, आधा खाली रह गया था ।”(पैर तले की ज़मीन, अनिता राकेश, पृष्ठ - 5) इस नाटक में राकेश ने शब्दों और नेपथ्य की ध्वनियों के मिले – जुले प्रभाव को रंगमंच पर एक नये प्रयोग के रूप में प्रस्तुत कर वर्तमान युग में व्यक्ति के सामाजिक मूल्य – विघटन तथा मानवीय संबंधों के खोखलापन को मूर्त किया है ।

निष्कर्ष

मोहन राकेश के नाटक के अध्ययन हमें यह निष्कर्ष पर पहुंचाते है कि पारिवारिक – वातावरण, शिक्षा - दीक्षा तथा अनुप्रासंगिक क्रिया – कलापों के एकीकृत रूप से नाटककार मोहन राकेश का व्यक्तित्व और कृतित्व का निर्माण हुआ ।

यद्यपि राकेश की पकड़ नाटक के साथ कहानी, उपन्यास जैसी साहित्यिक विधाओं में भी थी तो भी इनकी ख्याति नाटककार के रूप में सचमुच अद्वितीय रही ।

मोहन राकेश के बाहर – भीतर चलते रहे तनाव ने समयोचित रूप से उन्हें कुछ करने का मौका न दिया । राकेश की मानसिकता उनके नाटकों के कालिदास, नन्द और महेन्द्रनाथ में भी स्पष्ट उभरकर आया ।

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संक्षेप में कहें तो हिन्दी नाटक और रंगमंच को एक सही तथा सार्थक पहचान देने की दिशा में मोहन राकेश का स्थान हिन्दी नाटककारों अग्र गण्य है। उन्होंने अपनी मौलिक दृष्टि, भावपूर्ण संवेदना तथा जीवन के अनुभव – वैविध्य के आधार पर हिन्दी नाटक को कथ्य एवं शिल्प पर परंपरागत दृष्टिकोण से मुक्त कर विकास के नये आयामों से परिचित कराया ।

Written by - Swappna Nair, Research Scholar, under the guidance of (Prof.) Dr. K. P. Padmavathi Amma, Dept. of Hindi, KARPAGAM UNIVERSITY, COIMBATORE, Tamil nadu.

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