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धोखेबाज / कहानी / राजन कुमार

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मैं उन दिनों बेरोजगार था। गाँव के ही होटल में चार हजार की तनख्वाह पर काम करता था फिर भी जीवन खुशी-खुशी चल रहा था। पापा पैसे भेजते रहते थे। इसलिए कोई परेशानी नहीं थी। इसी बीच मेरी मौसी का फोन आया। वो अपने परिवार सहित सूरत में रहती हैं। उसने पूछा था- ‘बेटा दिल्ली में एयरपोर्ट पर काम करेगा?’ मेरी भी तमन्ना थी कि मैं जहाज में एक बार बैठूँ। पर यहाँ तो रोज उसी में काम करने की बात हुई तो मैंने तुरन्त हाँ कह दी। उसने कहा कि ठीक है, ले अपनी नीतू दीदी के पति से बात कर, यानी मौसी के दामाद से। मैंने नमस्कार किया और काम के सिलसिले में बातचीत की। उन्होंने बताया कि जहाज की साफ-सफाई करनी है। सरकारी नौकरी है। शुरू में बारह हजार मिलेंगे। हर छः महीने में एक हजार पगार बढ़ता है। उसके बाद उन्होंने कहा कि इसके लिए तुम्हें वहाँ के लोगों को कुछ पैसे खिलाने होंगे। मैंने कहा ठीक है, पापा से बात करके आपको फोन करता हूँ।

मैंने पापा से सारी बात बता दी। पापा बोले ठीक है, मैं उनसे बात करके पता करता हूँ। पापा ने मौसी को फोन किया और सारी बातें पूछ ली। जीजा जी ने सारी बातें पापा को बताई और पैसों के बारे में भी बता दिया। अगर काम नहीं हुआ तो पैसे वापस करने की भी बात उन्होंने कही। पापा राजी हो गए। पापा ने कर्ज लेकर रुपये उनके बैंक खाते में डाल दिए। मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ मामा के लड़के रोहित भइया भी थे। जीजा जी मामा से भी पैसे ले चुके थे।

हम दोनों भाई दिल्ली पहुँचे। वहाँ जीजा जी पहले ही मौजूद थे। उन्होंने हमें वहाँ एक साहबनुमा आदमी से मिलवाया, जिसका दफ्तर एक छोटी सी दुकान की तरह लगता था। वह हम दोनों को बुलाया और बोला- ‘क्या तुम दोनों ने कभी जहाज देखा है?’ हम दोनों ने एक साथ “जी सर देखा है,” कहा। उसने फिर पूछा नजदीक से कभी देखा है? जी नहीं, एक साथ हम दोनों बोले। फिर उसने अपने टेबल पर रखे जहाज के छोटे से नमूने को दिखाते हुए कहा- तुम लोग जहाज को आकाश में इससे भी छोटा देखा होगा, पर अब ऐसा नहीं होगा। तुम लोगों को नजदीक से जहाज देखने और उसमें चढ़ने-उतरने की तमन्ना पूरी हो जाएगी और गाँव में तुम लोगों का नाम भी होगा। उसने हम दोनों भाइयों को ऊँचे-ऊँचे सपने दिखाए। हमें लगा कि वह कोई ऑफिसर है, पर वह दलाल था। उसने हमें दूसरी जगह इन्टरव्यू के लिए भेजा और कहा कि- वहाँ किसी को पैसे के बारे में कुछ मत बताना। अगर कोई पूछे तो कह देना कि मेरा भाई यहीं काम करता है, उसी ने हमें भेजा है।

दूसरे दिन हम वहाँ गये। सब ठीक-ठाक रहा। मुझे काम करने का पास भी मिल गया। कुछ दिन के बाद भइया को भी पास मिल गया। पास की वैधता सिर्फ एक महीने की थी। इसी बीच गाँव से पुलिस वेरिफिकेशन करवा कर लाने को कहा गया। भइया को जिस काम के लिए कहा गया था

वह काम न देकर दूसरा काम दे दिया गया और तो और सरकारी नौकरी बताकर प्राईवेट काम पर लगा दिया।

खैर कुछ समय बाद भइया काम छोड़ दिए लेकिन मैं फँसा रह गया। हुआ यह कि जीजा जी बोले थे कि अगर कोई और भी काम करना चाहता है तो उसे भी बुला लो। मैंने सोचा- ‘कर भला तो हो भला’। ये वाकया मेरे काम शुरु करने से पहले का था। मैंने गाँव से अपने दो दोस्तों को बुला लिया था। दलाल ने उन्हें भी वही कहानी सुनाई, जो मुझे सुनाई थी। और दोनों से पैसे भी ऐंठ लिए थे। दोनों ने मुझसे कहा- देख भाई हम तेरे भरोसे ही कर्ज लेकर रुपये दे रहे हैं। कुछ हुआ तो तुझसे ही वसूलेंगे। मैं भी जोश में था, तो ठीक है बोल दिया। क्योंकि मुझे मेरे जीजा जी पर विश्वास था।

एक दिन अचानक पता चला कि जीजा फरार हो गया। हम सब मुँह के बल गिर पड़े। किसी को काम नहीं मिला। मैंने भी एक ही महीना काम किया था। अब नौकरी भी न रही। मैं सबको फोन करके थक गया। सब पैसे की बंदर बांट कर चुके थे। मौसी भी मुझसे मुँह फेर लीं, वह गालियों से बात करने लगीं। लेन-देन का कोई सबूत भी नहीं था मेरे पास, जिसे लेकर मैं पुलिस के पास जाता।

दोस्तों का दबाव भी बढ़ता जा रहा था। आये दिन तगादा करते, मेरे पैसे कब देगा तूँ? अब मैं क्या करू, किसके पास जाऊँ जो मेरी मदद करे, कुछ समझ में नहीं आता। केस लड़ने की हिम्मत भी मुझमें नहीं है। कभी-कभी जी करता कि उस धोखेबाज जीजा को जान से मार दूँ। कभी खुद मर जाने का मन करता है। मरने का मन क्यों नहीं करेगा, जब अपने ही धोखेबाज हो जायें।

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राजन कुमार

बेंगलूर, कर्नाटक

पत्र व्यवहार का पता-

Rajan Kumar C/O Acharya Balwant

No- 30, 4th Floor, Obaih Lane,

Akkipet Cross, Bangalore-560053

Mob. 7892759778

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