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मोटा आसामी / प्रमोद यादव

कहानी-

मोटा आसामी / प्रमोद यादव

मेरे मित्र की मार्केट में एक विशाल जनरल स्टोर्स है. स्टोर्स क्या , पूरा सुपर मार्केट है..हर चीज वहाँ उपलब्ध....सुई से लेकर तलवार तक....बिस्कुट से लेकर अचार तक.. खिलौने व लेडिस ब्यूटी - प्रसाधनों का भरमार है वहां ..पूरे दिन- स्टोर्स खुलने से लेकर बंद होने तक ज्यादातर लड़कियों-महिलाओं की खासी भीड़ उमड़े रहती है.. सामने और आजू-बाजू तीन बड़े-बड़े काउंटर है..कांच के शो केस के नीचे सारे कीमती आईटम सजे होते हैं...हर काउंटर में दो-दो नौकर...लेकिन भीड़ के चलते नौकर भी सारे सामानों को ठीक से सहेज नहीं पाते..कौन ग्राहक क्या सामान देख रहा ,कौन क्या उठा रहा.. किसने क्या रख लिया..किसने पैसा दिया..किसने नहीं , पता ही नहीं चलता..सामान समेटने की भी उन्हें फुर्सत नहीं होती..

कभी-कभी खाली रहने पर उससे मिलने स्टोर्स चला जाता हूँ..एक बार यूं ही गया तो उस दिन भीड़ अन्य दिनों की अपेक्षा कम थी..केवल तीन-चार लडकियां व तीन महिलायें ही खरीदारी कर रही थी..सब के सब किसी बड़े और संभ्रांत घर की लग रहीं थी..मित्र के साथ बातें करते खड़ा था कि एकाएक मेरी नजर एक महिला पर पड़ी जो बड़ी ही खूबसूरत , गोरी और हट्टी-कट्टी थी..वह आजू-बाजू सरसरी निगाह डालते हुए चुपके से कोई चीज काउंटर से उठाकर अपने हैण्ड बेग में डाल ली..मैं अवाक रह गया..तुरंत ही मित्र को बताना चाहा लेकिन उसी समय बाजू वाले दूकान का मालिक आकर उससे कुछ बतियाने लगा इसलिए चुप रहा..आखिरकार सामान खरीद वह खूबसूरत महिला बिल पे करने काउंटर पर आई..वह पांच-पांच सौ के दो नोट और कुछ सौ के नोट देते हंसते-हंसते बोली - ‘ भाईजी..कोई नया आईटम आये तो हमारे लिए रखियेगा..’

मित्र ने भी हंसते हुए कहा- ‘ हां जी..जरुर..जरुर.. पर क्या बहन जी..? आज खरीदी का मूड नहीं क्या ? बहुत ही कम सामान लिया आपने ..’

‘ अगली बार आउंगी तब लूंगी .. आज जरा जल्दी में हूँ..’ और वह अन्य दो महिलाओं के साथ बाहर निकल एक लम्बी नई-सी कार में बैठ फुर्र हो गई .

उसके निकलते ही मैंने चोरी वाली बात मित्र को बताया तो वह हंसने लगा..मैं चकित कि इसे हंसी क्यों सूझ रही ? तब उसने बताया कि उस मोहतरमा की आदत है..जब भी आती है,कुछ न कुछ छोटी-मोटी चीजें चुराती है..पर हम सब कुछ जानते-बूझते भी अनजान रहते हैं..

‘ क्यों ? ‘ मैंने आश्चर्य व्यक्त किया.

‘ वो इसलिए कि वह मोटी आसामी है..जब भी आती है, दो -तीन हजार का सामान तो खरीदती ही है...कभी-कभी तो आठ-दस हजार की खरीदारी भी कर लेती है..अब भला ऐसे ग्राहक पर तीस-चालीस रूपये के सामान की चोरी का इल्जाम लगाना तो वैसे ही होगा जैसे अपने गले में फांसी का फंदा डालना.. मैंने तो सारे नौकरों को भी कह रखा है कि उसे प्रेम से चोरी करने दे..कोई हो-हल्ला न करे..’

मित्र की बाते सुन मैं दंग रह गया.. मैंने कहा- ‘ पर यार.. कुछ भी हो..आखिर उसके चुराने से तुम्हें कुछ न कुछ तो घाटा होता होगा न ?’

‘ बिलकुल नहीं...मुझे मालूम हो जाता है कि वो क्या चुराई..उसकी कीमत भी बिल में जोड़कर वसूल लेता हूँ..बनिया का बेटा हूँ यार ? ‘

‘ लेकिन यार..ऐसा करके तुम गलत काम को बढ़ावा दे रहे हो.. उसे रोको ..किसी दिन इस आदत के चलते कहीं वो फूलन बाई न बन जाए..’ मैंने मशविरा दिया.

‘ तो क्या फर्क पड़ेगा यार..उसका घरवाला भी तो डाकू मोहरसिंह से कम नहीं...डी.एस.पी.ट्रेफिक है..रास्ते चलते लोगों को खुलेआम लूटता-खसोटता है..और फिर मोहतरमा का आचरण सुधारने जाऊँगा तो घरवाले मुझे घर में चरण धरने नहीं देंगे.. मुझे भी तो रोजी-रोटी चलाना है..बीबी-बच्चे पालना है..’

‘ पर यार..’

‘ अब ये पर-वर रहने दे...बस, इतना जान ले - ऐसे ग्राहक नसीबवालों को मिलते हैं..अब तू ये चैप्टर यहीं ख़तम कर...चल चाय पीते हैं..’ और धकेलते हुए वो मुझे चाय की गुमटी ले गया.

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद एक दिन दोपहर उसका फोन आया कि मैं अविलम्ब कोतवाली पहुंचूं...मैंने चौंकते हुए पूछा कि क्या हुआ ? तो जवाब दिया-बस..जल्दी आ जा..अर्जेंट है..और उसने फोन काट दिया..मैं सोच में पड गया कि क्या हो गया ? थाने में क्या कर रहा है ? तुरंत ही स्कूटर से वहां पहुंचा..वह दो-तीन ठोलों के बीच डरा-सहमा सा बैठा था..एक मुंशी कुछ लिखा-पढ़ी कर रहा था..मुझे देखते ही जैसे उसमें जान आ गई..मैंने सवाल किया-‘ यहाँ कैसे बैठे हो ? क्या हुआ ? ‘ तो पास ही कुर्सी पर बैठा एक जवान सा टी.आई. बोला-‘ आइये..हम बताते हैं-क्या हुआ ? इन्हें चोरी के इल्जाम में उठा लाये हैं..इन्होने बड़े ही दुस्साहस का काम किया है..पुलिस वालों पर ही हाथ मारा है..हमारे डी.एस.पी. साहब की पत्नी के पर्स से कोई दो सौ ग्राम के सोने के बिस्कुट पार कर दिया है..’

मैंने तुरंत टोकते कहा- ‘ असंभव सर जी..ये ऐसा कर ही नहीं सकते..इन्हें बचपन से जानता हूँ..कोई गलतफहमी हुई आपको..ये इज्जतदार और शरीफ आदमी है..इन्हें तो अपने दूकान से ही फुर्सत नहीं मिलती..और रुपयों-पैसों की इन्हें कमी नहीं..पैसे वाला है..फिर क्यों चोरी करेगा ? ‘

‘ वो मैं नहीं जानता..खुद डी.एस.पी. साहब ने रिपोर्ट दर्ज कराया है कि उनकी पत्नी इनकी दूकान में खरीदारी करने गई तो अपना पर्श कुछ समय के लिए इनके पास ही काउंटर में छोड़ पीछे के सब्जी बाजार चली गई..घर लौटकर देखी तो पर्स में रखे सोने के बिस्कुट गायब थे..’

‘ नहीं सर..मेरा दोस्त ऐसा कर ही नहीं सकता..आप उसे छोड़ दीजिये..’ मै गिडगिडाया.

‘ अरे भैया..बिस्कुट लाकर जमा कर दें.. अभी छोड़ देंगे..’ टी.आई. ने मुस्कुराते हुए कहा.

‘ क्या मैं इनसे बात कर सकता हूँ ? ‘

‘ शौक से..पर छोड़ेंगे नहीं.. जब तक की माल न मिल जाए..’

मैंने उसे तलब किया तो वह लगभग रोते हुए बोला कि इश्वर की सौगंध..उसने तो वह पर्स खोला ही नहीं..मुझ पर झूठा इल्जाम है..उसने कहा कि मै मैडम से मिलकर उन्हें समझाऊँ..नहीं तो वह आत्महत्या कर लेगा..

’ कुछ करता हूँ यार ..मैडम से मिलता हूँ ’ कहते मैं सीधे उनके सिविल लाइन स्थित बंगले में गया..मैडम तो कहीं लेडिज क्लब के फंक्शन में गई थी.. अलबत्ता डी.एस.पी.साहब मिले..मैंने अपना परिचय देते दोस्त की ईमानदारी की कई बातें दोहराई..वे चुपचाप सुनते रहे..आखिर में तीर-तुक्का मारते मैंने कहा- ‘ सर जी..हो सकता है मैडम ने पर्स में वे बिस्कुट रखे ही न हो..कहीं और रख दिए हों..’

बीच में ही बात काटते वे बोले..’ ठीक पकडे आप..यही हुआ भी है..दरअसल उनके पास एक जैसी दो पर्स है..अभी अचानक मैं अल्मिरे में कुछ ढूँढ रहा था तो वो पर्स दिखा..खोलकर देखा तो बिस्कुट उसी में दिखे..’ सुनना भर था कि मैं तनाव - मुक्त हो गया..उनसे कहा- ‘सर जी..अब जब सामान मिल गया है तो रिपोर्ट वापस ले लीजिये और दोस्त को छोड़ दीजिये..’

‘ वो तो छोड़ ही देंगे..पर आपको एक प्रामिस करनी होगी कि इस बात का जिक्र आप किसी से नहीं करेंगे..न ही भविष्य में कभी आपका दोस्त किसी से करेगा..वर्ना परिणाम अच्छे नहीं होंगे..’

‘ प्रामिस सर..भूलकर भी नहीं करेंगे..अब तो फोन करके छुड़वा दीजिये..’

‘ नहीं महाशय..अभी नहीं..तुरंत ही रिपोर्ट वापस लूंगा तो लोग क्या कहेंगे ? पूरा पुलिस महकमा हँसेंगा..कम से कम एकाध दिन तो पुलिस लाक-अप में उसे रहने दो..फिर टी.आई. को फोन कर दूंगा कि इनके कोई रिलेटिव सेन्ट्रल मिनिस्टरी में हैं..फोन पर फोन आ रहे..काफी दबाव बना रहे हैं..उसे छोड़ना ही होगा..नहीं तो हमें ये शहर छोड़ना होगा..आप जाइए..मैं रात को उन्हें फोन करता हूँ..और हाँ..अभी आप अपने दोस्त के पास मत जाईये..न उन्हें कुछ बताइये.. टी.आई. फोन करे तभी जाईये..’

‘ ठीक है सर जी..बहुत बहुत धन्यवाद..’ कहते घर आया..राए भर सोचता रहा कि दोस्त मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा..कितनी गालियाँ दे रहा होगा..पर क्या करता ? वचन बद्ध था..पूरी रात करवट बदलते सोचता रहा कि वो बेचारा लाक अप में क्या कर रहा होगा..? सुबह-सुबह फोन की घंटी बजी तो समझ गया कि टी.आई. ही होगा..उधर से आवाज आई- ‘हेलो..गुड मार्निंग संजय जी..आपने कल बताया नहीं कि आप डी.एस.पी.साहब के क्लासमेट रहे हैं..उनके दोस्त रहे हैं..अभी-अभी ही उन्होंने आदेश दिया है कि आपके दोस्त को किसी भी कीमत पर छोड़ दिया जाए..अब बोहनी का समय है संजय जी.. आपसे क्या कीमत करूँ ?आप समझ गए ना ? थाने में जो कुछ भी लिखाई-पढ़ाई हुई है उसकी साफ़-सफाई का नामिनल चार्ज तो लगेगा ही..आप एक पेटी लेकर फ़ौरन आ जाइए..और अपने दोस्त को ले जाइए..’

सुबह-सुबह दोस्त के घर जाकर उनकी पत्नी से एक पेटी लिया और थाने में टी.आई. को चढोत्री चढ़ा , उसे लेकर बाहर निकला. रास्ते में एक चाय की गुमटी में चाय पीते मैंने दोस्त से कहा- ‘ उस दिन तू अपने आपको बडा नसीबवाला कह रहा था..आज देख..क्या हुआ ? जितना उससे तूने कमाया नहीं होगा उससे हजार गुना ज्यादा झटका एक बार में दे गई..तुम्हारी इज्जत उतार गई..सो अलग..अगर लालच न कर पहली बार में ही उसकी चोरी पकड़ हड़का देता तो आज ये नौबत नहीं आती..लेकिन तुझे तो वो मोटी आसामी लग रही थी..उसकी चोरी को नजर अंदाज करने का फल है कि तू चोरी के इल्जाम में फंसा जो तूने की भी नहीं...फ़ोकट-का फ़ोकट लाख रूपया भी गया और इज्जत गई सो अलग.. नसीब पर ज्यादा इतराना नहीं चाहिए..बदलते देर नहीं लगती..अब देख - बदनसीब होने में क्या वक्त लगा ? ’

वह कुछ नहीं बोला...चुप्पी साधे चुपचाप स्कूटर के पीछे बैठ गया.

कई महीनो बाद एक पत्रकार मित्र ने बताया कि वो टी.आई और डी.एस.पी.सगे जीजा-साले हैं और इस तरह का छोटा-मोटा गेम वो “ टाइम पास “ के लिए खेलते रहते है..इसके पहले इन दोनों की पोस्टिंग ग्वालियर में थी ..वहां भी इसी तरह “ टाइम पास “ करते थे..

ये बात मैंने दोस्त को आज तक नहीं बताई..अभी तक तो उसे केवल इस बात का दुःख है कि मोटी आसामी ने उस पर झूठा इल्जाम लगा उसे बेइज्जत किया..अब कहीं उसे मालूम हो जाए कि ‘मोटा आसामी’ वो मोहतरमा नहीं बल्कि वो खुद था तो वह दुःख से नहीं, शर्मिंदगी से मर जाएगा..

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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