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" बचपन " / लघुकथा / विरेंदर वीर मेहता

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"और कितनी देर लगेगी साहब ?" बाल सुधारगृह के द्वार पर खड़े किशना के एक बार और पूछने पर ड्यटी-गॉर्ड भी झुंझला गया। "सब्र न करे है, कोई जंग जीत के न आ रा तेरा छोरा!"
अनायास ही किशना के कानों में अदालत के निर्णायक शब्द सरगोशियां करने लगे।  ".... बच्चो के आपसी झगड़े में साबित हुये आरोप के बाबजूद मुल्जिम की कम उम्र और उसकी मासूमियत को देखते हुये अदालत उसे उसके बचपने को कायम रखने के मकसद से तीन महिने बाल सुधारगृह  'बचपन' में भेजने का आदेश देती है।"
किशना विचारो में खोता चला गया कि इन तीन महीनो में उसने न जाने कितनी बार सोच लिया कि अब वो अपने बच्चे की मासूमियत को जमाने की हवा से बचायेगा और उसे एक नया जीवन शुरू करने का हौसला.......।
"अरे बापू... कैसा है तू ?" बेटे की आवाज से उसकी विचार श्रृंखला भंग हुयी और सामने खड़े बेटे को उसने झट से बाहों में भर लिया लेकिन बेटे के तुरन्त ही खुद को उसकी बाहों से मुक्त करने की कोशिश करते देख उसके चेहरे पर असमंजस के भाव उभरने लगे।
"अरे के करे है बापू? मैं कोई बच्चा तो न हूँ !" बेटे ने खुद को जबरन छुड़ा लिया।
"हां बेटा! तू तो सच में बड़ा हो गया है।" उसके चेहरे की कठोरता और हाव-भाव देख किशना की समझ में आ गया कि अपने मासूम बच्चे को पाने के लिए उसे जमाने के साथ अपने बेटे से भी संघर्ष करना पड़ेगा क्योंकि उसका  बे टा अपना बचपना तो अंदर 'बचपन' में ही छोड़ आया है। 
' विरेंदर वीर मेहता'

(संक्षिप्त परिचय)

जन्म स्थान और शिक्षा - राजधानी दिल्ली
आवास : एफ - ६२, विकास मार्ग, लक्ष्मी नगर, ईस्ट दिल्ली - ११००९२
सम्पर्क : +९१ ९८ १८ ६७ ५२ ०७
मेल आई डी : v.mehta67@gmail
.com
पेशा   : गुडगाँव (हरियाणा) में एक निजी कंपनी में कार्यरत

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