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हम सब हो गए हैं नौटंकीबाज बहुरूपिये / डॉ. दीपक आचार्य

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फुरसत निकाल कर कभी कुछ मिनट एकान्त में बैठें और तसल्ली से सोचे कि हम क्या थे, क्या हैं और क्या हो गए हैं। मात्र इसी एक प्रश्न से हमारे जीवन के कई बड़े रहस्यों का ऎसा उद्घाटन हो जाएगा कि हमें अपने आप पर शर्म भी आएगी और घृणा भी महसूस होगी ही।

जब हम नितान्त अकेले होकर सोचते हैं तब हमारी आत्मवाणी का जागरण होता है और आत्मा वही सब कुछ कहती है जो सच होता है। यों तो हमें रोजाना आत्मचिन्तन के लिए वक्त निकालना चाहिए लेकिन सांसारिक कर्मों और स्वार्थ के जंगलों में भटकते हुए समय ही नहीं मिल पाता इसके लिए।

और यही कारण है कि हमारी एकतरफा सोच और घृणित वृत्तियां निरन्तर अपना कद बढ़ाती रहती हैं और इस मलिनता से परिपूर्ण कद के आगे हम इतने अधिक बौने हो जाते हैं कि हम कहाँ हैं, यह पता भी नहीं चल पाता। 

भगवान ने हमें संसार के रंगमंच पर अच्छे और सच्चे कर्म के लिए भेजा होता है लेकिन हम अभिनय में भी अपने हितकारी नए-नए अभिनय खोज लेने के नवाचारों में इतने अधिक माहिर हो गए हैं कुछ कहा नहीं जा सकता।

वास्तविक अभिनय में तो हम जो कुछ करते हैं उसका लक्ष्य समूह समाज और देश-संसार होता है जिसमें हमारे अभिनय से औरों को प्रसन्नता एवं दिली सुकून का अहसास होना चाहिए। लेकिन आजकल हम अपने-अपने अभिनय में रमते जा रहे हैं जहाँ हमें औरों की, समाज या देश की परवाह नहीं है बल्कि जो कुछ कर रहे हैं वह हम हमारे लिए कर रहे हैं और इसका सीधा और सटीक लक्ष्य हमारे लाभ हैं, अपनी ऎषणाओं की पूर्ति है और अपने-अपने स्वार्थ हैं।

यह एकतरफा अभिनय ही है जो यह साबित करता है कि हम कितने बड़े नौटंकीबाज हो गए हैं। समझदार होने से लेकर मरते दम तक हम नौटंकी ही नौटंकी करते रहते हैं। हमारे अभिनय में मौलिकता का कुछ भी अंश नहीं होता। जो कुछ है वह अपने स्वार्थ के अनुरूप आकार पाता जाता है।

हमारी नौटंकियों का उद्देश्य अब सिर्फ और सिर्फ सामने वालों को भ्रमित, दिशाहीन और वशीभूत कर रखना है जहाँ हम आसानी से अपने स्वार्थ और मंसूबों को पूरे कर सकें और सामने वालों को हमारी चालाकियों की भनक तक न पड़े।

हमारे चरित्र, स्वभाव, व्यवहार और कर्म सभी कुछ में नौटंकी का प्रवेश हो गया है। जैसे हम हैं, उसे प्रकट नहीं करते, बनावटी रूप से पेश आते हैं, लुभावनी बातों से भ्रमित करते हैं, औरों को उल्लू बनाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने के जतन करते रहते हैं।

कुल मिलाकर हमारी जिन्दगी उस नौटंकीबाज की तरह हो गई है जो लोगों को उल्लू बनाने के हर तिलस्म में माहिर है। हम प्रत्येक क्षण बहुरूपियों की तरह पेश आते हैं और ऎसे अभिनय कर  डालते हैं कि औरों को हमारी असलियत का पता ही नहीं चल पाता। पता चल भी जाए तो क्या, हमारे पास नौटंकी विधाओं की कोई कमी थोड़े ही है, एक नहीं तो दूसरा तीर चल ही जाएगा। और वह भी तुक्का साबित हुआ तो क्या, हमारे पास अथाह भण्डार है इसका।

हम हर जगह अभिनय करते हैं चाहे वह घर, दुकान, दफ्तर, समाज हो या फिर कोई सा पारिवारिक या सार्वजनिक आयोजन। सब जगह झूठ बोलते हैं, झूठी बातें करते हैं, झूठे, धूर्त, मक्कार और बेईमान लोगों के साथ रहते हैं, साथ देते हैं। यहां तक कि श्मशान और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में भी ढोंग करते हैं। इतने ढीठ हो गए हैं हम।

सब्जबाग दिखाते हैं, भ्रमित करते हैं और विश्वास पाने के लिए नाटक करते रहते हैं। हमारा मकसद लोगों का उपयोग करना ही रह गया है।  जो सांसारिक हैं वे भी, और जो संसार को त्याग चुके हैं वे भी अपने भोग-विलास और ऎषणाओं से उबर नहीं पाए हैं।

इन सभी को चाहिए वह सब कुछ जो देह को आनंद दे सके, दिमाग को ठण्डा रख सके और अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रख सके। फिर आजकल अभिनय करने वाले सभी लोग एक हो गए हैं। औरों को दिखाने के लिए वे चाहे कितने धुर विरोधी हों पर अन्दरखाने सब एक हैं, जिस दिन इस नौटंकी को हम समझ जाएंगे, वह दिन हमारे लिए सोने के सूरज उगाने वाला सिद्ध होगा।

हमारा दिमाग, दिल और देह सभी अलग-अलग किरदार निभाने लगे हैं। हम सोचते कुछ और हैं, करते कुछ और। हमारे दिल में कुछ और होता है और जुबाँ पर ठीक इसका उलट।  दिल-दिमाग कहीं और लगा होता है और शरीर की हरकतें कुछ और होती हैं। सब कुछ उल्टा-पुल्टा। हम अपने से बड़ों के आगे भीगी बिल्ली बने हुए लल्लो-चप्पो करते हैं, उनकी चरण वन्दना करते हैं और उनके लिए वह सब कुछ कर दिया करते हैं जिनसे वे खुश हो सकते हैं। और अपने से नीचे वालों को इंसान तक नहीं समझते।

न हमारे जीवन व्यवहार में अब धर्म, न्याय, सत्य और अपरिग्रह का स्थान रहा है न अहिंसा का। हम अपने स्वार्थ के लिए लूट-खसोट, छीना-झपटी और शोषण की पराकाष्ठा कर चुके हैं। किसी भी जीव को बिना कारण परेशान करना, तनाव देना, उस पर बेवजह गुस्सा होकर भला-बुरा कहना, उसकी अस्मिता को चुनौती देना यह सब हिंसा की श्रेणी में आता है। 

अच्छा यही है कि हम रोजाना अपने लिए कम से कम दस मिनट का समय निकालें और आत्मा की आवाज सुनें, आत्मचिन्तन करें कि कहीं हमें भी तो लोग असुर, राक्षस, नरपिशाच, शोषक या पागलों की श्रेणी में नहीं रख रहे।

आत्मा की आवाज सारा सच बयाँ कर देगी। फिर भी समय न मिले तो मस्त रहें अपनी मस्ती में, लोगों की बददुआओं का भण्डार जिस दिन भर जाएगा, तब देखा जाएगा। यों भी भस्म तो होना ही है, श्मशान में एक बार भस्मीभूत हो जाएं अथवा बददुआओं की आग से किश्तों-किश्तों में जलते हुए मर जाएं।

पर इतना याद रखें कि मरने के बाद लोग श्रद्धान्जलि भी देंगे तो दिखावे के लिए, और वह भी झूठी। असल में लोग कहेंगे -चलो जी, अच्छा हुआ, एक कमीना चला गया, वरना जाने और कितनों को हैरान-परेशान  करता। भगवान को लाख-लाख धन्यवाद।  आज भी बहुत सारे लोग हमारे बीच में ऎसे विद्यमान हैं जिनके लिए लोग मरने की प्रार्थनाएं करते रहते हैं। भगवान जनहित और राष्ट्रहित में सबकी सुनेगा, यही विश्वास है।

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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