सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

याद आते हैं जाने के बाद / डॉ. दीपक आचार्य

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हर जगह की स्थिति एक सी है। अच्छे लोग या तो अपने से कहीं दूर चले जाने पर याद आते हैं अथवा ऊपर चले जाने के बाद।

जब तक कोई अच्छा इंसान हमारे आस-पास रहता है, अच्छे कर्म करता है तब तक हम उसकी उतनी कद्र नहीं करते हैं जितनी अपेक्षित होती है बल्कि अधिकतर मामलों में हम अपने आस-पास वालों को अपनी ही तरह का समझ कर उपेक्षित करने के आदी हो जाते हैं और इन लोगों के साथ वह व्यवहार नहीं करते हैं जो होना चाहिए।

दुनिया के हर कोने में यही स्थिति विद्यमान है। मानवीय मूल्यों के क्षरण के साथ ही सामूहिक विकास की भावनाओं का जितना अधिक ह्रास हाल के दशकों में हुआ है उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ। फिर घर का जोगी जोगणा वाली कहावत का भी असर होता ही है।

अधिकांश लोग जीवन में हमेशा वर्तमान से दुःखी रहते हैं। इनकी पूरी जिन्दगी वर्तमान से संघर्ष करते-करते इसी में गुजर जाती है लेकिन भविष्य कभी अच्छा नहीं आता। जिस भविष्य को वर्तमान बनाने की कोशिशों में जुटे रहते हैं वह वर्तमान बन जाने के बाद उन्हें यह वर्तमान भी खराब लगने लगता है। 

यही कारण है कि कुछ लोग अपने वर्तमान को हमेशा खराब बताते हुए कुढ़ते रहते हैं। वर्तमान को अपने षड़यंत्रों, गोरखधंधों और नापाक इरादों से हटाकर थोड़े दिन खुश रहते हैं इसके बाद फिर वही स्थिति।

हर बार ये लोग वर्तमान परिस्थितियों, अपने वर्तमान बोस या सहकर्मियों अथवा वर्तमान संसाधनों व स्थलों से नाखुश रहते हुए षड़यंत्रों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और वर्तमान को भूत के रूप में परिवर्तित कर अपने आपको विजेता घोषित करते हुए कुछ दिन उसी खुमारी में रहते हैं।

इसके बाद फिर वही हालात सामने आ जाते हैं। इन लोगों की पूरी जिन्दगी इसी में गुजरती है। इन्हें कभी भी वे लोग पसन्द नहीं आते जो वर्तमान में अपने साथ या अपने से ऊपर के ओहदों पर होते हैं।

इसका दूसरा कारण यह भी है कि ऎसे लोग अपनी खाल और खोल से कहीं ज्यादा मुँह तथा हाथ-पाँव बाहर निकालने वाले होते हैं, खुद को अपने घर-परिवार और संस्थानों का बादशाह समझते हैं और यह भ्रम पाल लेते हैं कि जो कुछ हो रहा है वह उन्हीं के कारण हो रहा है।

भगवान ने यदि इन्हें पैदा नहीं किया होता तो शायद दुनिया में उन कर्मों का नामोनिशान नहीं होता जो काम ये कर रहे हैं। अपनी औकात से बहुत कुछ अधिक समझने और पाने की तमन्ना रखने वाला हर इन्सान इसी तरह वर्तमान के पीछे पड़ा रहता है। 

लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि चाहे हम वर्तमान के बारे में भ्रम फैलाये रखें, अपने आपको कितना ही बड़ा और नियंता मानने का अहंकार पाले रहें, हमारी आत्मा हमारा जिन्दगी भर विरोध करती रहती है।

यह अलग बात है कि हम अपने स्वार्थों और कुटिल चालों में लिप्त होने की वजह से आत्मा की आवाज न सुनें या सुनकर भी अनसुनी कर दें, मगर सच तो यही है।

वर्तमान को धकियाने वालों की आत्मा में हर वर्तमान का सटीक मूल्यांकन करने की क्षमता होती है और जहाँ कहीं तुलनात्मक अध्ययन होता है वहाँ श्रेष्ठताओं को पूरे के पूरे नम्बर देने ही पड़ते हैं। 

यही कारण है कि बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जिनकी हम कद्र नहीं करते, उनके बारे में बुरे विचार रखते हैं, बेवजह निन्दा करते हैं  लेकिन उनके जाने के बाद उनकी अच्छाइयों का स्मरण किए बगैर नहीं रहते।

इसकी अभिव्यक्ति हम नहीं कर पाते क्योंकि हमारे अहंकार और झूठी प्रतिष्ठा इस पर पहरा बिठाये रखती है और वह हमें मौलिक और सत्याभिव्यक्ति से रोकती है। हमें हर बार बाद में इस बात का अहसास होता है कि वे लोग कितने अच्छे थे।

जो वर्तमान को नहीं स्वीकार सकते वे लोग भूतकाल के प्रताड़ित होते हैं और उनका भविष्य भी कुण्ठाओं और मलीनताओं का समय बनकर रह जाता है। इस मनःस्थिति के कारण ही हम लोग वर्तमान का पूरा-पूरा उपयोग सीखने, समझने और अपनाने में नहीं कर पाते हैं और बाद में इसका पछतावा होता है।

क्यों न हम वर्तमान में जीना आरंभ करें, वर्तमान को स्वीकारें और वर्तमान का आदर-सम्मान करें ताकि हमें उन लोगों के दूर चले जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़े जो हमारे आस-पास रहते हैं।  दुनिया की महान-महान हस्तियों की हमने समय पर कद्र नहीं की और आज पूजने लगे हैं। वर्तमान ही सत्य है और इसी में जीना ही यथार्थ है।

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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