मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

वीमेंस डेवलपमेंट सेल द्वारा 'रचना और रचनाकार' आयोजित संगोष्ठी / अनुपमा रे

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दिल्ली। 'इस आत्मवृत्त की रचना किसी पूर्वयोजना या संकल्प के तहत नहीं हुई। स्थितियों और घटनाओं के पारावार का यह मेरा पाठ है। ' वरिष्ठ आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्षा प्रो निर्मला जैन ने अपनी आत्मकथा 'ज़माने में हम' के संदर्भ में कहा कि चालू अर्थों में निजी जीवन में ताक झाँक करना और किताब को सनसनी से भरना उनका उद्देश्य नहीं था। जीवन के होने में खोया-पाया जैसा कुछ दर्ज हो सका तो वही प्राप्य है। प्रो जैन ने हिन्दू कालेज के वीमेंस डेवलपमेंट सेल द्वारा आयोजित संगोष्ठी 'रचना और रचनाकार' में उक्त विचार व्यक्त किए। राजकमल प्रकाशन के सहयोग से मृणाल पांडे की पुस्तक 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री' तथा प्रो निर्मला जैन की आत्मकथा 'ज़माने में हम' पर आयोजित इस संगोष्ठी के पहले सत्र में विख्यात समाज विज्ञानी और पत्रकार रामशरण जोशी तथा आलोचक डॉ रामेश्वर राय ने 'ज़माने में हम' पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रो जोशी ने कहा कि निर्मला जैसे की पूर्व किताब 'दिल्ली शहर दर शहर' के साथ 'ज़माने में हम' को मिलाकर पढ़ने से न केवल प्रो जैन का व्यक्तित्व अपितु तीन महत्त्वपूर्ण कालखंडों आजादी से पहले का भारत, आजाद भारत तथा भूमंडलीकरण के दौर में भारत को देखा-जाना जा  सकता है।  डॉ राय ने पुस्तक की भाषा की प्रशंसा करते हुए कहा कि सहज और सरल भाषा से  प्रो जैन के विचारों का वायुमंडल पाठक को प्रभावित करता है।

संगोष्ठी के दूसरे भाग में वरिष्ठ कथाकार - पत्रकार मृणाल पांडे की पुस्तक 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री' पर चर्चा की गई। इस सत्र में कुछ प्रसिद्ध और भुला दी गई गावनहारियों के सम्बन्ध में विख्यात लेखिका मृणाल पांडे ने कहा कि 'असाधारण प्रतिभा,मेहनत, खुद्दारी और प्रशंसा के साथ राज-समाज के दोमुँहे बर्ताव से उपजी खिन्नता और कड़वाहट को मिलाकर ही हमारी पिछली दो सदियों की उत्तर भारतीय महिला गायिकाओं की जीवन गाथा और प्रतिभा की शक्ल बनी है।' पांडे ने कहा कि  'हम लोग गुण का आदर भले करना जानते हों लेकिन वजूद का निरादर भी हम खूब करते रहे हैं।' पुस्तक पर टिप्पणी कर रहे युवा आलोचक पल्लव ने कहा कि पांडे की पुस्तक भारतीय समाज में व्याप्त असमानता के अनेक तनावों से हमें परिचित करवाती हैं जो संगीत और शिक्षा के पवित्र और ऊँचे समझे जाने वाले इलाके में भी गहराई से मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि लेखिका द्वारा इन तनावों का परिचय हमें संस्कारित करता है और बेहतर मनुष्य बनाता है। पल्लव ने पुस्तक के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रसंगों को भी  उद्धृत किया। मृणाल पांडे ने पुस्तक की रचना प्रक्रिया को बताते हुए स्लाइड शो के माध्यम से इन गावनहारियों के इतिहास और संस्कृति पर रोचक प्रस्तुति भी दी। 

दोनों सत्रों में मौजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने लेखिकाओं से अपने सवाल पूछे। संगोष्ठी का संयोजन कर रहीं वीमेंस डेवलपमेंट सेल की परामर्शदात्री डॉ रचना सिंह ने अतिथियों का परिचय भी दिया। संगोष्ठी में हिन्दू कालेज के अतिरिक्त बाहर के कालेजों से भी अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। इससे पहले हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ अभय रंजन ने फूलों से अतिथियों का स्वागत किया। सभागार के समीप लगाईं पुस्तक प्रदर्शनी का युवा पाठकों ने लाभ लिया। अंत में राजकमल प्रकाशन के मुख्य अधिकारी आमोद माहेश्वरी ने सभी का आभार माना। 

अनुपमा रे

अध्यक्षा, वीमेंस डेवलपमेंट सेल, हिन्दू कालेज, दिल्ली

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