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निराली रही हैं बेणेश्वर की धार्मिक परम्पराएँ / डॉ. दीपक आचार्य

निराली रही हैं बेणेश्वर की धार्मिक परम्पराएँ

- डॉ. दीपक आचार्य

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संत मावजीनिष्कलंक सम्प्रदाय, महाराज पंथ और बेणेश्वर महाधाम....। ये सभी लगभग तीन शताब्दियों से एक दूसरे के पूरक रहे हैं। मानव धर्म और प्रेम पूर्ण लोक व्यवहार का पैगाम देने वाले मावजी महाराज के लाखों भक्त आज भी समाज में नई चेतना और सौहार्द की धाराएं प्रवाहित कर रहे हैं।

मावजी महाराज एवं उनके परवर्ती पीठाधीश्वरों द्वारा ईश्वर की प्राप्ति के लिए सहज योग, आनन्द और मानवीय मूल्यों के साथ कर्मरत रहने का संदेश देने जिन धार्मिक-आध्यात्मिक परम्पराओं का सूत्रपात किया गया है वे आज भी अक्षुण्ण रूप से पूरे वेग के साथ प्रवाहित हो रही हैं।

संत मावजी महाराज की स्मृति में हर साल बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों की सीमा पर नदियों के संगम स्थल बेणेश्वर धाम पर लगने वाले मेले के दौरान् इन प्राचीन परम्पराओं की जीवन्त झलक देख हर कोई मोहित हो उठता है। इन दिनों बेणेश्वर महामेला चल रहा है और शनिवार तक मेले की गूंज बनी रहने वाली है।

दैव आराधन होता है पाँच आरतियों से ......

आम तौर पर मन्दिरों में प्रधान देवता के प्रति समर्पित एक ही आरती होती है लेकिन संत मावजी की परम्परा में निष्कलंक भगवान की आराधना में माघ माह और बेणेश्वर मेला अवधि में बेणेश्वर धाम के मुख्य देवालय राधा कृष्ण हरि मन्दिर, साबला में निष्कलंक सम्प्रदाय के विश्व पीठ और वागड़ अंचल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित निष्कलंक मन्दिरों में रोजाना पाँच-पाँच आरतियों से भगवान का अर्चन होता है।

लगभग ढाई शताब्दी पुरानी परम्परा के अनुसार इस अवधि में इन सभी स्थानों पर प्रातःकाल एवं संध्याकाल में संत मावजी के काल से ही रचित पाँच आरतियां लोक वाद्यों की स्वर लहरियों के बीच समवेत स्वरों में गायी जाती हैं।

प्रभातकालीन आरती गुग्गुल, दशांग धूप आदि सुगन्धित औषधीय द्रव्यों से की जाती है जबकि शाम की आरती शुद्ध गौघृत भरी दीप वर्तिकाओं के साथ की जाती है। इसके बाद साद भक्तों और अन्य श्रद्धालुओं द्वारा मावजी की उपदेशों भरी वाणी, परम्परागत अस्तोत्र, आगमवाणी(भविष्यवाणियों) आदि का लयबद्ध गान होता है।

इन आरतियों और इससे संबंधित वाणियों में वेदान्त दर्शन, साकार और निराकार ब्रह्म, योग मार्ग के सूक्ष्म रहस्यों, आने वाले निष्कलंक अवतार के स्वरूप, संत माव परम्परा आदि से लेकर लोक कल्याण के दिव्य उपदेश समाहित हैं।

बरसता है देवी अन्नपूर्णा का आशीर्वाद    

एक ख़ासियत यह भी है कि सवेरे और शाम की जाने वाली आरतियों में अन्नदेव की आरती भी की जाती है। मान्यता है कि अन्नदेव की आरती से मैया अन्नपूर्णा प्रसन्न होती है और उनकी कृपा से मावजी के भक्तों को जीवन में कभी भी भोजन की समस्या का  सामना नहीं करना पड़ता। यह माव भक्तों का अनुभव है।

मजेदार है घूड़ी गायन

इन सभी आरतियों से पूर्व परम्परागत भक्ति साहित्य ‘‘घूड़ी’’ गाया जाता है जिसमें जीव और आत्मा के लक्ष्य को केन्दि्रत रख कर विभिन्न रहस्यों की जानकारी शामिल है। सायंकालीन आरती के बाद ज्ञान गोष्ठी का ज्ञान होता है  जिसमें साद भक्त परस्पर संवाद दोहराते हुए उपदेशों और ब्रह्म के रहस्यों के बारे में महिमा का बखान करते हैं।

इसके अलावा जहाँ-जहाँ भी बेणेश्वर पीठाधीश्वर की पधरामणी(कार्यक्रम) होते हैं वहाँ भी ये आरतियां होती हैं। दोपहर के कार्यक्रमों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की लीलाओं का चित्रण करने वाली आरती इसमें समाहित होती है।

लोक आकर्षण और आस्था के केन्द्र थे रजत द्वार

बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले की सरहद पर नदियों से घिरे बेणेश्वर टापू पर लगने वाला महामेला लोक जीवन  के शौख चटख रंगों का दिग्दर्शन कराने वाला अपनी तरह का अनूठा मेला है ही, यहाँ की कई प्राचीन परम्पराएँ भी कोई कम रोचक नहीं हैं।

हालांकि अब मन्दिर नवनिर्माण के कारण कई परंपराएं स्थगित हो गई हैं लेकिन मन्दिर निर्माण से पूर्व तक इन परंपराओं का दिग्दर्शन होता रहा है।  संत मावजी महाराज की जयन्ती माघ शुक्ल एकादशी पर बेणेश्वर मेले की शुरूआत से ही धाम का मुख्य देवालय राधा-कृष्ण मिंन्दर आस्था और जनाकर्षण का केन्द्र बना रहता है।     इस मन्दिर का निर्माण संत मावजी महाराज की पुत्रवधू ‘जनकुँवरी’ ने  विक्रम संवत् 1850 में कराया था। इस मुख्य मन्दिर के गर्भ गृह के द्वार पर  मेले के शुरूआती दिन से ही लगने वाले चाँदी के किवाड़ आकर्षण का केन्द्र होते थे।

विष्णु के अवतारों का अंकन

जब भी मेला होता है, साबला हरि मन्दिर से आए रजत किवाड़ आकर्षण का केन्द्र हुआ करते थेक। इन किवाड़ों पर भगवान श्री विष्णु के चौबीस अवतारों की सुन्दर मूर्तियाँ अंकित हैं। बेणेश्वर मेले की पुरानी परम्परा के अनुसार विशिष्ट कलाकृतियों से परिपूर्ण चाँदी के ये किवाड़ हर वर्ष मेले के शुभारंभ दिवस पर साबला के हरि मन्दिर से बेणेश्वर धाम पर लाए जाते व विधि-विधान के साथ राधाकृष्ण मन्दिर के गर्भ गृह पर लगाए जाते थे।  ये किवाड़ पूरी मेला अवधि तक यहाँ लगे रहते थे।  मेला खत्म होने के बाद इन्हें वापस साबला के हरि मन्दिर में ले जाकर भण्डार गृह में संरक्षित रख दिया जाता था।  इन दिनों मन्दिर नवनिर्माण हो रहा है इसलिए मन्दिर से जुड़ी कुछ परंपराएं अभी दिखने में नहीं आ रही।

श्रीफल रूप में भगवान की पूजा

इसी प्रकार साबला में निष्कलंक सम्प्रदाय के विश्व पीठ हरि मन्दिर से भगवान निष्कलंक का रजत सिंहासन भी बेणेश्वर महामेले की शुरूआत के दिन बेणेश्वर धाम पहुंचता है। परम्परा के मुताबिक ग्यारस से पूर्णिमा तक साबला के हरि मन्दिर में इस खाली सिंहासन में भगवान का प्रतीक मानकर श्रीफल की पूजा-अर्चना की जाती है।

इसके बाद माघ पूर्णिमा को मुख्य मेले के दिन हजारों भक्तों का काफिला भगवान निष्कलंक की मूर्ति को पालकी में बिठाकर साबला से बेणेश्वर लाता है। तब संगम तीर्थ में स्नान व विशेष पूजा विधि के बाद मूर्ति को विधि-विधान के साथ इस रजत सिंहासन में प्रतिष्ठित किया जाता है। पूरी मेला अवधि में महंतश्री एवं भगवान निष्कलंक बेणेश्वर में ही विराजमान रहते हैं।

यह सिंहासन व निष्कलंक भगवान की मूर्ति मेला समाप्ति तक राधा-कृष्ण मन्दिर में रहते हैं जहां भगवान निष्कलंक के दर्शनों के लिए जन ज्वार उमड़ता रहता है।

गुरुगादी, निष्कलंक झांकी

मेले के दौरान पूर्ववर्ती पीठाधीश्वरों के चित्र, देवानंद जी महाराज की गादी, चोपड़ा दर्शन आदि के प्रति भी लोक आस्था दिखती है। मुख्य मन्दिर में गुरु गादी लगती है, भगवान निष्कलंक की बड़ी प्रतिमा दर्शायी जाती है और चोपड़े का दर्शन कराया जाता है।

संबोधन भी अनूठा-जय महाराज

मावजी सम्प्रदाय में हर भक्त व पीठाधीश्वर अपने संबोधन के आरंभ में  ‘‘जय महाराज’’ उच्चारित करते हैं।  यह भी अपनी तरह का अनूठा संबोधन है जिसमें गुरु के प्रति श्रद्धा और आदर अभिव्यक्त करने के बाद ही कोई संवाद शुरू होता है। इस संबोधन को गुजरात के नड़ियाद स्थित संतराम मन्दिर ने भी अपनाया और वहाँ भी बातचीत की शुरूआत ‘जय महाराज’ से होती है।

संत मावजी के सम्प्रदाय में धार्मिक उपासना की दृष्टि से कई ऎसी अनूठी परम्पराएं हैं जो अपने आप में अलग ही महत्व रखती हैं। इन परम्पराओं को दिग्दर्शन बेणेश्वर मेले तथा निष्कलंक धामों पर होने वाली नियमित उपासना के दौरान् सहज ही किया जा सकता है।

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