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गांधी और खादी:एक प्रासंगिक अनुचिंतन / डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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खादी के धागे धागे में

अपनेपन का अभिमान भरा,

माता का इसमें मान भरा

अन्यायी का अपमान भरा।


खादी के रेशे-रेशे में

अपने भाई का प्यार भरा,

माँ-बहनों का सत्कार भरा

बच्चों का मधुर दुलार भरा।


खादी की रजत चंद्रिका जब

आकर तन पर मुसकाती है,

तब नवजीवन की नई ज्योति

अन्तस्तल में जग जाती है।

कवि श्रेष्ठ सोहल्लाल द्विवेदी की उक्त पंक्तियाँ खादी के विषय में बड़ी मर्म की बात कह देती हैं। फिलहाल, यह वास्तव में उत्साहवर्धक है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज कहा कि खाड़ी के जरिये भारतवासियो को स्वाबलंबी बनाने के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपने को उनकी सरकार आगे बढ़ा रही है और विभिन्न सरकारी संस्थान आगे बढ़कर खादी के उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। दरअसल, मुझे लगता है कि गांधी जी के स्मरण दिवस पर नए सिरे से लोगों तक पहुंचे ये उद्गार खादी को लेकर बापू की सोच की व्यापकता को स्वर देने की नई पहल के समान है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस प्रसंग ने मुझे 'खादी और गांधी' के फलसफे पर पलटकर देखने और उनके फलसफे को साझा करने की प्रेरणा दी है।  

प्रधानमंत्री जी ने कहा कि नव गठित खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग नये अवसरों एवं चुनौतियों को ध्यान में रखकर कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है। इन पहलों के तहत सौर चरखा और सौर लूम से उत्पादन के सफल प्रयास किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सौर उर्जा से चलने वाले चरखा और लूम से बुनकर पहले से कम मेहनत में अधिक उत्पादन और दोगुनी आमदनी पा सकेंगे। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली खादी आज एक फैशन परिधान बन गई है और सरकार भारत के गांव गांव में खादी और ग्रामोद्योग का नेटवर्क तैयार करना चाहती है। इससे लोगों को रोजागार से जोड़कर गांव के प्रत्येक परिवार को सबल बनाया जा सकेगा ।

प्रधानमंत्री जी ने कहा, ‘‘ मैंने कल पूज्य बापू की पुण्य तिथि पर देश में खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़े हुए जितने लोगों तक पहुंच सकता हूं, मैंने पत्र लिख कर पहुंचने का प्रयास किया। ’’ उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता जतायी कि खादी के उत्पादों का उपयोग करने के लिए रेल मंत्रालय, पुलिस विभाग, भारतीय नौसेना, डाक विभाग सहित अन्य सरकारी संस्थान आगे आ रहे हैं । इसके चलते लगभग 18 लाख मानव दिवसों का अतिरिक्त रोजगार खादी के क्षेत्र में उपलब्ध होगा और इससे प्रत्येक कारीगर की आमदनी में बढोत्तरी होगी ।

बहरहाल, जैसा कि मैंने पहले ही लिखा कि खादी पर गांधी जी के दृष्टिकोण में निहित और सूत के एक-एक धागे के साथ जुड़ी स्वाधीनता, संवेदना, आत्म सम्मान की भावना को समझना आज भी समझदारी की बात है। वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने चरखे के चक्र में कल की गति के साथ ताल मेल करने और उससे होड़ लेने की भी अनोखी शक्ति को गहराई से देख लिया था। खादी के जन्म की कहानी भी काम रोचक नहीं है। 

अपनी आत्म कथा में बापू लिखते हैं कि मुझे याद नहीं पड़ता कि सन् 1908 तक मैने चरखा या करधा कहीं देखा हो । फिर भी मैने 'हिन्द स्वराज' मे यह माना था कि चरखे के जरिये हिन्दुस्तान की कंगालियत मिट सकती है । और यह तो सबके समझ सकने जैसी बात है कि जिस रास्ते भुखमरी मिटेगी उसी रास्ते स्वराज्य मिलेगा । सन् 1915 मे मै दक्षिण अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आया , तब भी मैने चरखे के दर्शन नही किये थे । आश्रम के खुलते ही उसमें करधा शुरू किया था । करधा शुरू किया था । करधा शुरू करने मे भी मुझे बड़ी मुश्किल का सामना करना पडा । हम सब अनजान थे, अतएव करधे के मिल जाने भर से करधा चल नही सकता था । आश्रम मे हम सब कलम चलाने वाले या व्यापार करना जानने वाले लोग इकट्ठा हुए थे , हममे कोई कारीगर नही था । इसलिए करधा प्राप्त करने के बाद बुनना सिखानेवाले की आवश्यकता पड़ी । कोठियावाड़ और पालनपूर से करधा मिला और एक सिखाने वाला आया । उसने अपना पूरा हुनर नही बताया । परन्तु मगनलाल गाँधी शुरू किये हुए काम को जल्दी छोडनेवाले न थे । उनके हाथ मे कारीगरी तो थी ही । इसलिए उन्होने बुनने की कला पूरी तरह समझ ली और फिर आश्रम मे एक के बाद एक नये-नये बुनने वाले तैयार हुए ।

आगे गांधी जी लिखते हैं कि हमे तो अब अपने कपड़े तैयार करके पहनने थे । इसलिए आश्रमवासियो ने मिल के कपड़े पहनना बन्द किया और यह निश्यच किया कि वे हाथ-करधे पर देशी मिल के सूत का बुना हुआ कपड़ा पहनेगे । ऐसा करने से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला । हिन्दुस्तान के बुनकरों के जीवन की, उनकी आमदनी की, सूत प्राप्त करने मे होने वाली उनकी कठिनाई की, इसमे वे किस प्रकार ठगे जाते थे और आखिर किस प्रकार दिन-दिन कर्जदार होते जाते थे, इस सबकी जानकारी हमे मिली । हम स्वयं अपना सब कपड़ा तुरन्त बुन सके, ऐसी स्थिति तो थी ही नही। कारण से बाहर के बुनकरों से हमे अपनी आवश्यकता का कपड़ा बुनवा लेना पडता था। देशी मिल के सूत का हाथ से बुना कपड़ा झट मिलता नही था । बुनकर सारा अच्छा कपड़ा विलायती सूत का ही बुनते थे , क्योकि हमारी मिलें सूत कातती नहीं थी । आज भी वे महीन सूत अपेक्षाकृत कम ही कातती है , बहुत महीन तो कात ही नही सकती । बडे प्रयत्न के बाद कुछ बुनकर हाथ लगे , जिन्होने देशी सूत का कपडा बुन देने की मेहरबानी की । 

इन बुनकरों को आश्रम की तरफ से यह गारंटी देनी पड़ी थी कि देशी सूत का बुना हुआ कपड़ा खरीद लिया जायेगा । इस प्रकार विशेष रूप से तैयार कराया हुआ कपड़ा बुनवाकर हमने पहना और मित्रो मे उसका प्रचार किया । यों हम कातने वाली मिलों के अवैतनिक एजेंट बने । मिलो के सम्पर्क मे आने पर उनकी व्यवस्था की और उनकी लाचारी की जानकारी हमे मिली । हमने देखा कि मीलों का ध्येय खुद कातकर खुद ही बुनना था । वे हाथ-करधे की सहायता स्वेच्छा से नही , बल्कि अनिच्छा से करती था । यह सब देखकर हम हाथ से कातने के लिए अधीर हो उठे। हमने देखा कि जब तक हाथ से कातेगे नही, तब तक हमारी पराधीनता बनी रहेगी । मीलों  के एजेंट बनकर देश सेवा करते है , ऐसा हमे प्रतीत नहीं हुआ ।

लेकिन गांधी जी के अनुसार न तो कही चरखा मिलता था और न कही चरखे का चलाने वाला मिलता था । कुकड़ियाँ आदि भरने के चरखे तो हमारे पास थे, पर उन पर काता जा सकता है इसका तो हमे ख्याल ही नही था । एक बार कालीदास वकील एक वकील एक बहन को खोजकर लाये । उन्होने कहा कि यह बहन सूत कातकर दिखायेगी । उसके पास एक आश्रमवासी को भेजा , जो इस विषय मे कुछ बता सकता था, मै पूछताछ किया करता था । पर कातने का इजारा तो स्त्री का ही था । अतएव ओने-कोने मे पड़ा हुई कातना जानने वाली स्त्री तो किसी स्त्री को ही मिल सकती थी।

बापू स्पष्ट करते हैं कि सन् 1917 मे मेरे गुजराती मित्र मुझे भड़ोच शिक्षा परिषद मे घसीट ले गये थे । वहाँ महा साहसी विधवा बहन गंगाबाई मुझे मिली । वे पढी-लिखी अधिक नही थी , पर उनमे हिम्मत और समझदारी साधारणतया जितनी शिक्षित बहनो मे होती है उससे अधिक थी । उन्होंने अपने जीवन मे अस्पृश्यता की जड़ काट डाली थी, वे बेधड़क अंत्यजों मे मिलती थीं और उनकी सेवा करती थी । उनके पास पैसा था , पर उनकी अपनी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं । उनका शरीर कसा हुआ था । और चाहे जहाँ अकेले जाने में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती थी । वे घोड़े की सवारी के लिए भी तैयार रहती थी । इन बहन का विशेष परिचय गोधरा की परिषद मे प्राप्त हुआ । अपना दुख मैंने उनके सामने रखा और दमयंती जिस प्रकार नल की खोज मे भटकी थी, उसी प्रकार चरखे की खोज मे भटकने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने मेरा बोझ हलका कर दिया ।

गांधी जी ने 1920 के दशक में गावों को आत्म निर्भर बनाने के लिये खादी के प्रचार-प्रसार पर बहुत जोर दिया था । जरा सोचें कि हम विज़न 2020 में शामिल कर उसी खादी को एक नई पहचान देकर बापू की उस देशभक्ति से परिपूर्ण मुहिम को शताब्दी वर्ष के रूप में सन 2020 में धूमधाम से नहीं मना सकते ?

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लेखक प्रेरक वक्ता, कुशल प्रशिक्षक,सजग सचेतक

और शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर

महाविद्यालय, राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं।

मो.09301054300

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