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कविता-पाठ की कला / हरिवंश राय बच्चन

 कविता शब्दों की कला है और शब्द का पूरा बल और प्रभाव तभी प्रकट होता है जब उसे मुख- रित किया जाए, ध्वनित किया जाए और सुना जाए। 

पुराने समय में कला का क्षेत्र सीमित था। उनकी संख्या तक निश्चित कर दी गई थी। ६४ कलाओं का नाम मैंने सुना है, शायद आपने भी सुना होगा। नाम गिनाने को कहें तो मेरे लिए मुश्किल होगी। मैं यह भी निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि कविता-पाठ की कला उसमें सम्मिलित है या नहीं। पर कविताएँ बहुत प्राचीन काल से पड़ी और सुनाई जा रही हैं। कविता पढ़ने का ढंग बुरा, साधारण, अच्छा और बहुत अच्छा समय-समय पर समझा गया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। और इसी विभिन्नता में उसके कला होने की बात निहित है। वस्तुत: आज हम कला का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह यही है कि किसी भी काम को सफाई से, सलीके से, अच्छे ढंग से, प्रभावकारी विधि से संपादित करना। बात तो सभी करते हैं, पर किसी-किसी के बात करने के ढंग को देखकर हम कहते हैं कि उसे बात करने की कला आती है। हमारा मतलब होता है कि उसके बात करने के ढंग में कुछ ऐसी चीज होती है जो मन को अच्छी लगती है, छूती है या उसे प्रभावित करती है। कोई भी काम हो कला का स्पर्श उसे अधिक प्रिय, सुखकर और मनोज्ञ बना देता है। यदि कविता पड़ी जाने की चीज है, तो उसे कलापूर्ण ढंग से पढ़ने की बात सहज ही समझ में आ जाएगी।

मेरी यह धारणा है, और बहुत-से लोग इससे सहमत होंगे कि कविता शब्दों की कला है और शब्द का पूरा बल और प्रभाव तभी प्रकट होता है जब उसे मुख- रित किया जाए, ध्वनित किया जाए और सुना जाए। इसमें संदेह नहीं कि आज बहुत-सी कविता छपकर हमारे सामने आती है और हम अस्त्रों से ही उसे पढ़ते हैं। जिन्हें काव्य-कला की समझ है वे आंखों से पढ़ते हुए भी मानसिक ध्वनियों की कल्पना कर लेते हैं, पर साधारण लोग किसी कविता को पहले केवल आँख से पढ़- कर और बाद को स्वयं सस्वर पढ़कर अथवा किसी से सुनकर दोनों स्थितियों की तुलना कर सकते हैं 1 आँख से पढ़ने और कान से सुनने की स्थिति में अंतर का आभास अवश्य होगा।

तुलसीदास ने कहा है कि ‘कविहिं अरथ, आखर बल साँचा'। यहां 'अरथ' और आखर' का तात्पर्य हमें ठीक से समझ लेना चाहिए। 'अरथ' तो स्पष्ट है। जब हम शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका कुछ विशिष्ट अर्थ होता है, जैसे हम कहीं मुरसरि' शब्द का प्रयोग करें तो उसका अर्थ होगा 'गंगाजी'! पर अगर 'अरथ' से तई काम चल जाता तो तुलसीदास 'आखर' शब्द का प्रयोग न करते। 'आखर' यों

तो 'अक्षर' का बिगड़ा हुआ रूप है, पर अब उसका अर्थ 'ध्वनि' या 'बोल' हो गया है। वैज्ञानिक सत्य भी है कि 'अक्षर' अपने शाब्दिक अर्थ में, जो क्षर या नष्ट न हो, ध्वनि ही हो सकती है, अक्षर का चित्र नहीं -जैसा लिखी या छपी वर्णमाला में। खैर, हम इन बारीकियों में नहीं जाएँगे। हमारी पंजाबी में आखने' का अर्थ 'बोलना' ही होता है। संक्षेप में तुलसीदास के कहने का मतलब यह है कि कवि को अर्थ और ध्वनि का बल होता है। और अच्छा कवि इन दोनों साधनों का पूरा उपयोग करता है। बड़ा कवि जितना अर्थ से कहता है उतना ही ध्वनि से, और कहीं-कहीं तो वह ध्वनि के द्वारा अर्थ की अपेक्षा अधिक कहता है। यही कारण है कि जब हम किसी अच्छे या बड़े कवि की पंक्ति का एक शब्द भी बदल देते हैं, तब उसका सौंदर्य और प्रभाव समाप्त हो जाता है समूल अर्थ तो शायद स्पष्ट हो जाता है, पर सूक्ष्म अर्थ, जो ध्वनि से दिया गया था, बिल्कुल गायब हो जाता है। अर्थ और ध्वनि दोनों का आनंद साथ लेने का एक मात्र साधन है, कविता को सस्वर पढ़ना या किसी से सुनना।

कवि 'अरथ' और 'आखर' अथवा अर्थ और ध्वनि का साथ प्रयोग कैसे करता है, इसका हम एक उदाहरण देंगे। ऊपर हमने 'सुरसरि' शब्द का हवाला दिया है। आइए, हम तुलसीदास से ही एक ऐसी पंक्ति लें जिसमें 'सुरसरि' शब्द का प्रयोग हुआ है। वे कहते हैं,-

कीरति, भनिति, भूति भलि सोई,

सुरसरि सम सब कहें हित होई।

अर्थ तो इसका कठिन नहीं है। वे कहते हैं कि कीर्ति, कविता और संपत्ति वही भली है जिससे सबका हित हो जैसे गंगा जो से सबका हित होता है। पर इसकी ध्वनि में भी एक विशिष्टता है, जिसने इस पंक्ति को एक अतिरिक्त चित्रमयता और गतिमयता दी है। अधिक शब्द नहीं, आइए, इस पंक्ति का केवल एक शब्द बदल दें, और देखें कि ध्वनि के परिवर्तन से कितना अंतर आ गया है। 'सुरसरि' की जगह पर 'गंगा' कर दें। मात्रा में कोई फर्क नहीं पड़ा। अर्थ 'सुरसरि' का वही है जो 'गंगा' का। पर 'सुरसरि' और 'गंगा' की ध्वनि एक नहीं है, अलग- अलग है।

'सुरसरि' सम सब कहँ हित होई।

'गंगा' सम सब कहँ हित होई।

पहली पंक्ति में लगता है कि जैसे 'सुरसरि' से सरसर, निर्बाध, मुक्त, बहती हुई नदी आँखों के आगे आ गई है-'सुरसरि सम सब कहँ हित होई'। कवि ने 'सुरसरि' के आगे लघु मात्राओं वाले शब्द रखकर विचित्र कौशल दिखलाया है। जब हम कहते हैं, 'गंगा सम सब कहँ हित होई', तव 'गंगा शब्द के दो दीर्घ मात्रिक अक्षरों से जैसे हमारे सामने कोई चट्टान खड़ी हो जाती है और प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है। इस छोटे-से उदाहरण से भी यह स्पष्ट हो गया होगा कि कविता 'अर्थ' और 'ध्वनि' की कला है और कविता अपना पूरा बल और वैभव तभी प्रकट करती है जब उसे मुखरित किया जाय, उसे सस्वर पढ़ा जाय या सुना जाय।

अगर मुझसे कोई पूछे कि, सफल काव्य-पाठ का एक मात्र गुणा क्या है तो मैं कहूंगा, 'तन्मयता'। यानी काव्य-पाठ करनेवाला अपने को उसी मनःस्थिति में रख सके जिसमें रहकर कवि ने अपनी रचना की है--अर्थात् काव्य-पाठ करते समय वह कविता के भाव, विचार, रस में पूर्णतया डूब जाए। यह आदर्श स्थिति है पर उससे निकटतम स्थिति प्राप्त करना पाठक का ध्येय होना चाहिए।

अब मैं कुछ ऐसी बातों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जिनसे ऐसी स्थिति प्राप्त की जा सके।

भाषा कविता की सीमा है। जिस भाषा में कविता लिखी गई है उसका ज्ञान होना आवश्यक है। पर कविता में भाषा का विशिष्ट प्रयोग होता है। पाठक को कविता का सूक्ष्म से सूक्ष्म अर्थ जानना चाहिए। यदि संभव हो तो उसके यथा-साल सौंदर्य से भी परिचित होना चाहिए। शेली की 'वेस्ट विंड' कविता मैंने बहुत बार सस्वर पढ़ी, औरों से भी सुनी थी, पर जब मैंने उसे आई०ए० रिचर्ड्स के मुख से सुना तब उसमें जो जीवंतता अनुभव की, वह पहले कभी न की थी।' कारण स्पष्ट था उन्होंने उस कविता को जिस मार्मिकता से समझा था, उसके सौंदर्य को जिस गहराई से ग्रहण किया था, वह सब उनके काव्य-पाठ में प्रतिविंबित हो उठी थी। रट-रटा- कर कोई ऐसी कविता भी सुनाई जा सकती है, जिसका अर्थ हम बिल्कुल न समझते हों, जिसके सौंदर्य से हम नितांत अछूते हों, पर ऐसा कविता-पाठ निर्जीव लगेगा। अर्थ और भाव और सौन्दर्यानुभूति से जो हमारी ध्वनि में कंपन होता है, जो हमारे मुख की मुद्राएँ बदलती हैं, जो हमारे अंगों में भंगिमाएँ निरूपित होती हैं उनका उसमें सर्वथा अभाव रहेगा। इसलिए पाठक को यह जानना चाहिए कि वह जो कह रहा है वह क्या है, कैसा है।

जैसे हमारी बातचीत में, वैसे काव्य में भी शब्द तो माध्यम भर हैं। मुख्यता होती है उन भाव, विचारों, संदर्भों की जिन्हें व्यक्त, जाग्रत अथवा संकेतित करने के लिए हम अर्थ-ध्वनि समन्वित शब्दों का उपयोग करते हैं। कविता-पाठ में भी निरंतर हमारा ध्यान उन भाव, विचारों, संदर्भों पर ही केंद्रित रहना चाहिए। पर कवि के भाव, विचारों, संदर्भों से एकात्म रहते हुए भी हमें उन्हीं शब्दों का उपयोग करना है जो कवि ने किए हैं सच्चाई तो यह है कि उन्हीं शब्दों से, उसी के शव्द क्रम से वे पूर्णतया उजागर होते हैं। क्रम का महत्व बताने के लिए हम एक उदाहरण देंगे। शेजी की पंक्ति है,

When the hearts have mingled

Love first leaves the well-built nest

अब जरा दो शब्दों का क्रम बदल दीजिए,

When the hearts have mingled

First love leaves the well-built nest

अंग्रेजी के मर्म को समझनेवाले देखेंगे कि इस तनिक से क्रम-परिवर्तन से कविता के भाव- विचार में कितना अंतर आ गया है।

ऐसी स्थिति न आने देने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है कि जिस कविता का पाठ हमें करना है, वह हमें पूरी तरह याद हो। इसका सबसे अच्छा उदाहरण रंगमंच पर मिलता है। जिन अभिनेताओं को अपना पार्ट याद रहता है उनका अभिनय अधिक सजीव और स्वाभाविक होता है। जिन्हें याद नहीं रहता वे रंग-मंच पर खोए-खोए-से रहते हैं उनका आधा ध्यान प्राम्पटर' के संकेत पर लगा रहता है; और सफल अभिनय पूर्णता माँगता है। जो बात अभिनय के लिए ठीक है वही बात कविता के लिए भी ठीक है। थोड़ी देर के लिए हम स्वयं कवि की भूमिका में उतर- कर उसी के समान बोलते हैं, अपने को व्यक्त करते हैं। जब शब्द हमें इतने याद रहें कि वे अपने आप जिह्वा पर आते जाएँ तब भावों-विचारों पर अपने को केन्द्रित करना सरल हो जाता है।

उच्चारण का संबंध तो भाषा की शिक्षा से है; फिर भी कविता-पाठ में उनके दो पहलुओं पर ध्यान दिला देना चाहिए-एक है उच्चारण की शुद्धता दूसरा है भावानुरूपता। कुछ भाषाओं के साथ उच्चारण की कठिनता अधिक होती है, जैसे अंग्रेजी के साथ। हिंदी फोनेटिक अर्थात् ध्वन्यात्मक भाषा है। वह जैसी लिखी जाती है वैसी ही पढ़ी जाती है। इस कारण उसके साथ उच्चारण की कठिनाई अधिक नहीं है। फिर भी लोग कभी प्रांतीयता, कभी अनम्यास, कभी लापरवाही के कारण हिंदी शब्दों के उच्चारण में गलतियाँ करते हैं। उदाहरणार्थ पंजाबी प्राय: दो व्यंजनों को, जो अलग हैं, जोड़कर बोलते हैं; या जो जुड़े हैं उस्रें अलग कर देते हैं। पंक्ति है, 'न्याय खड्ग उसकी गर्दन पर लटक रहा है। ' उसे प्राय: यों पढ़ा जाएगा, 'न्याय खड़ग उसकी गर्दन पर लटक रहा है। ' कुछ लोग लापरवाही से 'आशा' को आसा' कह देंगे। कुछ लोग नाक की कुछ त्रुटि से बहुत-से ऐसे शब्दों को सानुनासिक कर देंगे जो ऐसे नहीं हैं। ये ऐसी भूलें नहीं जिनका सरलता से सुधार न हो सके। भाषा कोई भी हो, उच्चारण की शुद्धता आवश्यक है, विशेषकर जब हम भाषा के उत्कृष्टतम रूप कविता का पाठ कर रहे हों।

भावानुरूपता अधिक सूक्ष्म विषय है। 'कमल' शब्द कहते हुए उसकी कोमलता का अनुभव हम करते हैं या नहीं 'वज्र' शब्द कहते हुए उसकी कठिनता की अनुभूति हमें होती है या नहीं? इसी प्रकार के अनेक शब्द हैं जो अपने संदर्म में ए_क सूक्ष्म भाव छिपाए है। स्वाभाविक तो यही होना चाहिए कि उनका उच्चारण करते ही केवल अर्थ से ही नहीं, ध्वनि से भी उनमें निहित भाव व्यक्त हो जायँ। इसके प्रति थोड़ा सचेत होने पर वाणी का सौंदर्य अधिक बढ़ जाएगा 1 पर सचेतता को अस्वाभाविकता या कृत्रिमता की सीमा तक न जाना चाहिए। संक्षेप में कहना चाहूँगा कि कोई भी शब्द अपनी भावानुरूपता तभी व्यक्त करता है जब वह उच्चा- रणकर्ता के पूर्ण व्यक्तित्व से जिया जाता है। यदि आपको किसी ऐसे व्यक्ति से बात करने का अवसर मिला हो जो बात तो आपसे कर रहा हो, पर उसका ध्यान कहीं और हो तो उसका शब्द पूर्णातया जिया नहीं लग सकता। वह शब्द तो बोलता है, पर ध्वनि में, कंपन में, शब्द को पूर्ण अर्थवत्ता नहीं दे पाता। ऐसी मनःस्थिति

से यदि कविता-पाठ भी किया जाए तो पूर्णतया सजीव नहीं लग सकता। कविता- पाठ में तो प्रत्येक शब्द के जिए जाने की आवश्यकता है। अच्छी कविता में प्रत्येक शब्द का अनिवार्य स्थान होता है।

कविता-पाठ के संबंध में एक प्रश्न प्राय: पूछा जाता है कि कविता को गाकर पढ़ना चाहिए या साधारण गद्य की तरह। कविता का संगीत से पृथक व्यक्तित्व है यह तो मानी हुई बात है। संगीत में ध्वनि ही प्रधान है। कविता अर्थ को नहीं छोड़ सकती। कविता के साथ उतना ही संगीत निभ सकता है जितने से उसका अर्थ स्पष्ट रह सके और उसकी ध्वनियों को पूरा प्रकाश मिल सके। कविता का अपना भी ध्वनि सौंदर्य होता है, और उसके द्वारा वह बिना संगीत की सहायता के भी प्रभावकारी हो सकती है। छंदबद्ध कविताओं, विशेषकर गीतों में संगीत की सीमित सहायता वर्जित नहीं होनी चाहिए। मेरा ऐसा ध्यान है कि इससे गीत अपना भाव अधिक सफलता से व्यक्त कर सकता है। अच्छा गीत यदि केवल गद्य की तरह पद भी दिया जाए तो अप्रभावकारी नहीं रह सकता। कुछ कविताएँ तो लयात्मक ढंग से पढ़ने के लिए ही लिखी जाती हैं। उन्हें गाने का प्रयत्न करना उपहासास्पद होगा। गाने से वे अपनी गतिमयता, तीव्रता, गंभीरता गँवा देंगी।

प्रतिभा कुछ अपवाद भी प्रस्तुत करती है। अंरोजी में कविता को गाने की प्रथा नहीं है कमी थी भी तो अब भुला दी गई है। पर प्रसिद्ध आइरिश कवि विलियम बटलर इदस कविताओं को गाने के आग्रही थे। उनका कहना था कि कविता गद्य नहीं है, कविता पढने में उसे गद्य होने का आभास भी नहीं देना चाहिए, वे कविता को incantation -मंत्र- मानते थे। वे अपनी हर कविता को लयात्मक ढंग से गुनगुनाते थे। उनका कहना था कि ऐसी lilt या लय के साथ ही कविता साधारण गद्य के वातावरण से ऊपर उठ जाती है और श्रोता को उसे कविता की तरह, यानी मंत्र की तरह, स्वीकार करने को तैयार करती है। उनकी बात में बहुत कुछ सच्चाई है, पर साथ ही कविता को मंत्र होने की भी जरूरत है और ईट्‌स की कविता अपनी ऊँचाइयों पर मंत्र ही है। इसे सिद्ध करने को विस्तार में जाना पड़ेगा जो यहां अप्रासंगिक होगा।

अंग्रेजी में एक कहावत है कि अपवादों से नियम सिद्ध होते हैं। मैं हर कविता को लय के साथ गुनगुनाने या गाने के पक्ष में नहीं। जहाँ हमें कवि से ही सहायता न मिलती हो वहाँ सुरुचिपूर्ण और विवेकवान व्यक्तियों के प्रयोगों से इस बात का पता चल सकता है कि कौन कविता किस प्रकार पढ़ने से अधिक प्रभावकारी होगी। साथ ही यह भी आवश्यक नहीं कि कवि अपनी कविता का सबसे अच्छा पाठक भी हो। यदि कवि का कंठ सधा और स्वर अच्छा हो तो निश्चय ही अपनी कविता को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करना औरों की अपेक्षा उसके लिए अधिक सहज होना चाहिए।

दो शब्द मैं कविता-पाठ करते समय की मुख-मुद्रा और अंग-भंगिमा के संबंध में भी कहना चाहूँगा। हम सब लोग बातचीत करते हुए_ प्रसंगानुसार मुख-मुद्राएँ बनाते हैं या अपने अंगों का संचालन करते हैं, भले ही हम उनके प्रति सचेत न हों। इनसे हमारी बातचीत में एक प्रकार की सजीवता आती है। यदि मूर्ति की तरह सुस्थिर रहकर हम लोग बोलें तो कैसा अजीब लगेगा। साथ ही हमारी बात की अर्थवत्ता और प्रभाव में भी न्यूनता आएगी। कविता-पाठ में भी यदि अर्थवत्ता और प्रभाव को बनाए रखना है तो मुखमुद्रा और अंग-भंगिमा का उपयोग करना पड़ेगा। परंतु इन्हें स्वाभाविक होना चाहिए। कुछ लोग कविता में आए हर भाव को मुख- मुद्रा अथवा अंग-भंगिमा से प्रदर्शित करना चाहते हैं। इनसे अति नाटकीयता प्रकट होती है जो प्रभावकारी होने के स्थान पर उपहासास्पद हो जाती है। मूल सिद्धांत यही है कि कविता के भाव-विचार से तन्मय हो जायँ और उस समय जो भी मुद्राएँ-भंगिमाएँ स्वाभाविक रूप से बनती हैं उन्हें बनने दें। कविता-पाठ अभिनय नहीं है, हालाँकि अभिनय में भी अब स्वाभाविकता को ही अधिक महत्व दिया जाता है।

अंत में यह जान लेना चाहिए कि कविता-पाठ की कला एक-तरफा नहीं है। जब आप कविता पढ़ते हैं तब कोई कविता का श्रोता भी होता है। कविता-पाठ की चरम सफलता तो यही है कि वह श्रोता-वर्ग को आकर्षित कर ले, मोह ले, मुग्ध कर दे, पर इसके लिए श्रोता को भी responsive होना होगा। यानी काव्य-पाठ के श्रोता पढ़े-लिखे हों, काव्य-प्रेमी हों, कविता के पारखी हों। कहावत प्रसिद्ध है, 'भैंस के आगे बीन बाजै भैंस ठाढ़ पगुराय।' अगर भैंस ही श्रोता हो तो बीनवादक की कला क्या करिश्मा दिखाएगी! मैं तो बीनवादक की कला का एक अंग इसे भी मानूँगा कि वह श्रोता को देखते ही पहचान ले कि वह उसकी कला को appreciate कर सकेगा कि नहीं। नहीं कर सकता तो उसे साहसपूर्वक उसके सामने अपनी कला का प्रदर्शन करने से इन्कार कर देना चाहिए। 'अरसिकेपु कवित्व निवेदन शिरषि मा लिख, मा लिख, मा लिख' मुझे तो दुर्बल की पुकार मालूम होती है।

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