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सांप्रदायिकता का तात्विक विश्लेषण' / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

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वर्तमान वैश्विक समाज धार्मिक कट्टरता यानी सांप्रदायिकता के चंगुल में फंसा हुआ है जो दुनिया भर की ज्वलंत समस्याओं में से एक है । यह मानव समाज के विकास के लिए खतरनाक माना गया है, मानव के दिलो दिमाग में नासूर की तरह पलते यह अमानवीय भाव सचमुच मानवता के लिए श्रेयस्कर नहीं है । दरअसल मानव जाति के आध्यात्मिक एवं भौतिक विकास से सांप्रदायिकता का कोई सरोकार नहीं है । धर्म की विशालता से आदम-जात को अलगाकर संकुचित स्वार्थ के घेरे में बांधने का कार्य ही सांप्रदायिकता करती है । इस प्रक्रिया में धर्म का बाह्य रूप ही बरकरार रहता है, आंतरिक तौर पर उसकी धार्मिकता लुप्त होती है । इतना ही नहीं, वह कुटिल राजनीति का हिस्सा भी बन जाता है । सचमुच धर्म और सांप्रदायिकता के अंतर का बारीकी विश्लेषण से ही सांप्रदायिकता का सही बेनकाब हो सकता है ।

धर्म की वास्तविक परिकल्पनाः-

विश्व के मानव समाज का ज़्यादातर हिस्सा धर्म से जुड़ा हुआ है। यह सही है कि धर्म फिलवक्त उसकी परिकल्पना से कोसों दूर पहुँचा है । इस वक्त हम यह सोचने केलिए मज़बूर हो गए हैं कि धर्म का आविर्भाव कैसे हुआ होगा ? इसमें सन्देह तो नहीं कि यह मानवनिर्मित है । देशकाल की

माँग के अनुसार मनुष्य के धर्म (दायित्व) के बारे में महामनीषियों द्वारा की गई एवं संग्रहीत बातें ही धर्म का आधार रही होंगी । भारतीय ऋषियों और मुनियों ने धर्म तत्व पर जो अंतरमंथन किया, उससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था कि धर्म एक ऐसी आन्तरिक क्रान्ति है जिसका मूल उद्देश्य अनुभूति द्वारा अंतस में ऐसा रूपान्तरण करना है कि वह प्राणिमात्र ही नहीं, बल्कि समस्त प्रकृति के लिए पूर्ण रूप से सहयोगी बन जाए । वेदों में धर्म शब्द की व्युत्पत्ति ‘धृ’ धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ धारण करने या पालन करने से किया जाता है । उपनिषद में धर्म का प्रयोग धार्मिक कर्तव्यों के अर्थ में किया गया है । श्रीमद् भागवत् महापुराण में विशेष प्रकार के आचरणों को धर्म बतलाया गया है। जैमिनी सूत्रकार जैमिनी ने भी धर्म का प्रयोग आचरणार्थक रूप में ही किया है । उन्होंने कहा है - ‘‘वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है।’’१ आधुनिक युग के महान विचारक मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा है - ‘‘धर्म एक एतिहासिक, प्राकृत घटना है । इतिहास के सबसे पहले चरण में जन मानव असभ्य था, धर्म नहीं था । भविष्य में भी धर्म न होगा । यद्यपि शोषक वर्ग के सिद्धान्तकार धर्म को शाश्वत सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि धर्म का जन्म स्वतः स्फूर्त हुआ । इसकी समाप्ति तब होगी जब पुराने समाज के स्थान पर नये समाज के निर्माण के लिए लक्ष्यबद्ध काम किये जाएंगे।’’२ आधुनिक चिंतक धर्म को आचरण से जोड़ते है । आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, धर्म को आचरण के रूप में देखने के पक्ष में है । वे स्पष्ट रूप में कहते है कि धर्म का अर्थ ही मानव कल्याण है । धर्म व्यक्ति के आचरण में ही प्रकट होता है ।’’३ उपरोक्त मान्यताओं को देखने से यह लगभग स्पष्ट हो जाता है कि धर्म की अवधारणा के मूल में मानव आचरण की बात ही प्रमुख है । कालान्तर में इन दायित्वों (क़्द्वद्यत्ड्ढद्म) में अनेक बातें जोड़ी गईं, कई तरह की व्याख्यायें की गई जिनके बीच मूल अंश गौण हो गया । दायित्व (ड्डद्वद्यत्ड्ढद्म) के सम्बन्ध में मतभेदों का होना ही असंगत लगता है ।

इन्हें अलग पंथों के रूप में बांटने पर ही खतरा पैदा हुआ होगा । महान रचनाकार भीष्म साहनी धर्म को अपने आप में खतरनाक नहीं मानते । उनके शब्दों में -‘‘संस्थागत धर्म इंसान को इंसान से अलग करते हैं, उनमें भेद भाव पैदा करते है और राजनीति से जोड़ते हुए भेदभाव को वैमनस्य के स्तर तक बढ़ावा देते हैं । संस्थागत धर्म में ज्यों-ज्यों अनुयायियों की संख्या बढ़ती है उसी अनुपात में सत्तालोलुप होने लगते हैं । विरोध करनेवालों के विरुद्ध उसमें लामबंदी होने लगती है, सत्तालोलुप राजनीति में गठजोड़ होने लगती है, यह अकारण नहीं है कि ऐसे धार्मिक संगठन उन तानाशाहों के गुण गाते हैं जिन्होंने भारी संख्या में नरसंहार किए।’’४ इस परिमार्जन की जगह प्रक्षिप्तों को छोड़कर उन्हें मानव विरोधी-बनाना उनके संकुचित स्वामियों का मकसद है ।

धर्म की व्याख्याः-

‘‘धर्म, मनुष्य की आध्यात्मिक और लौकिक उन्नति का साधन है । वह मूलतःमनुष्य को सभ्यता की राह पर उच्चतर मूल्यों की ओर मुखातिब करने के लिए अस्तित्व में आए थे, आडम्बर फैलाने के लिए नहीं ।’’५ प्राचीन युग में धर्म ही नैतिकता का एकमात्र स्रोत था । दुनिया के सभी धर्मों में किसी न किसी बहाने मनुष्य को तुच्छता से उच्चता की ओर ले जाने की व्यवस्था है।’’६ जिससे उन्नति और कल्याण की सिद्धि होती है, वह धर्म है । धर्म जन-कल्याण की भावना से ओतप्रोत है । आलोचक कृष्णकुमार के शब्दों में धर्म की सामान्य और सरल व्याख्या है - ‘‘किसी के प्रतिकूल आचरण न करना ही धर्म का सार है।’’७ सही धर्मावलंबी दूसरे धर्मों के साथ घृणा आदि भाव नहीं रखते । उक्त मार्ग से बढने पर टकराहट की संभावनाएँ बहुत कम होंगी । हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार - ‘‘अर्द्ध धार्मिक और अधार्मिक लोग मतवाद लेकर झगड़ते हैं, न कि वे लोग सचमुच धार्मिक है।’’८ सभी धर्मों ने अपने अनुयायियों को काम, क्रोध और लोभ से बचने का उपदेश दिया है । संसार में आज हज़ारों धर्म और संप्रदाय हैं । इन सभी में समानताएँ अधिक हैं । धर्मों में भिन्नता प्रमुखतः अनुयायियों की आस्थाओं, आचरणों की वैयक्तिक अवधारणाओं में है । इन भिन्नताओं को ही धर्म के सत्तापक्ष और राजनीतिज्ञ जटिल बना देते हैं । यहाँ राही माज़ूम रज़ा का मत ध्यातव्य है - ‘‘धर्म वजू के पानी या चंदन के तिलक का नाम नहीं है । धर्म का नाम है सच बोलने का । इसलिए आइए सच बोलें।’’९ मनुष्य को सन्मार्ग की ओर ले जाने की चीज़ है धर्म । शुभ होना और शुभ करना ही धर्म का पूर्ण सार है । संक्षेप में कहा जा सकता है कि धर्म मानव कल्याण के लिए रूपायित तथ्यों का संघात है । वह मानव की ही विशेषता है । सब के साथ मानवीयता से पेश आना ही सही धर्म का सार है ।

धर्म का महत्वः-

मनुष्य किसी धार्मिक अथवा ईश्वरीय चेतना को लेकर जन्म नहीं लेता । ‘‘वक्त बीतने पर शायद प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए एक छोटा सा निजी धर्म गढ़ लेता है।’’१० जन्म के बाद, जिस धर्म, संप्रदाय के सदस्य के रूप में उनका जन्म हुआ है, उसी संप्रदाय से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से धार्मिक चेतना का अनुप्रवेश कराया जाता है । मनुष्य पहले आया और धर्म बाद में, यह असंदिग्ध है । आज अधिकांश लोग किसी न किसी धर्म में आस्था रखते हैं। आज इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करके भी जनसाधारण की मानसिकता में धार्मिक विश्वास और ईश्वरीय चेतना की जड़ें बहुत गहराई तक फैली हैं । भारतवर्ष में बहुत कम ही लोग हैं जो नास्तिक है; भारतीय परंपरा में धर्म को मानवीय स्वभाव के रूप में स्वीकृत किया गया है । विनोदशाही के अनुसार - ‘‘जिस प्रकार अग्नि का धर्म दाहकता है उसी प्रकार मनुष्य के भी कुछ धर्म है जो ‘धर्म’ मानव स्वभाव में निहित

‘मानवीय गुणों’ दया, प्रेम, करुणा, मैत्री, सद्भावा आदि में प्रकट होते है न कि हत्या, घृणा, वैरभाव आदि में । आवश्यकता धर्म से ‘मुक्त’ होने की ही नहीं धर्म के यथार्थ स्वरूप को पहचान कर उससे ‘युक्त होने की है । यह याद करने की ज़रूरत है कि जब मनुष्य अपने धर्म’ अथवा अपनी प्रकृति के विरुद्ध आचरण करेगा तो वह नष्ट हो जाएगा और जब अपनी स्वाभाविक

और उदात्त गुण विकसित होंगे मनुष्य मात्र की सर्व-रूपेण संवृद्धि होगी।’’११ मानव जीवन में धर्म का प्रभाव सदियों से हो रहा है । आज भी अधिकांश लोग धर्म में अपनी सुरक्षा ढूँढते हैं । सभी धर्म, प्रेम और करुणा की शिक्षा देते हैं, फिर भी अधिकांश धर्मावलंबी वैर और घृणा की दीक्षा पा जाते हैं। मानव सभ्यता की विकास यात्रा में धर्म की अनिवार्यता को पूरी तरह से नहीं नकारा गया है । जो सबको सँभाले और मिलाए रखे वास्तव में वही धर्म है । गाँधीजी का धर्म से मतलब धर्म के ऊँचे और उदार तत्वों से था । अजाँ देने, नमाज़ पढ़ने, का नाम धर्म नहीं है । गाँधी जब भी धर्म कहते थे, उनका आशय अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, कर्मकांड़ और वर्ण आश्रम व्यवस्था से नहीं था । उन्होंने धर्म को सुन्दर ढंग से जाना क्योंकि उन्होंने अधर्म को जाना था। वे कहते थे- ‘‘धर्म-आचार-विचार के निजी और नैतिक नियमों का संग्रह है।’’१२ जिस बात से किसी को कोई कष्ट न हो वास्तव में वही धर्म है । यहाँ धर्म के बारे में जो अभिमत पेश किए गए हैं पश्चिम के रिलीजियन’ या मजहब के अर्थ में नहीं है । धर्म को स्वार्थ पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता है और न संकीर्णता अथवा असहिष्णुता का । धर्म तो नितांत वैयक्तिक बात है । सामूहिकता में प्रवेश करते ही धर्म अपना मौलिक स्वभाव खो देता है । ऐसा रूपांतरित धर्म समाज को छोटे छोटे

हिस्सों में बाँटता है, मानवता को विभाजित करता है, उसे सांप्रदायिक बनाता है । धार्मिकता एक मौलिक क्रांति है । वह हमें सांप्रदायिकता से बहुत दूर ले जाती है । लेकिन आज धर्म इतना प्रदूषित हो गया है कि उसका सर्वाधिक प्रयोग व्यक्तिगत स्वार्थों की रक्षा के लिए किया जाता है । धर्म का जो संस्थागत रूप है वह इंसान की विपरीत दशा की ओर चलता रहता है । भीष्म साहनी के शब्दों में ‘धर्म तो मनुष्य को बेहतर इंसान बनने उसके मानवीय गुणों का विकास करने, उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की प्रेरणा देता है, दृष्टि की विशालता देता है, इंसान को जोड़ने की, उसे दूसरों के खून की प्यासा बनाने की प्रेरणा कहाँ देता है ? धर्म मनुष्य को सच्चा और अच्छा

मनुष्य बनने की सीख देता है । मनुष्य एवं मनुष्य के बीच दीवार खड़ी करने, एक मनुष्य को दूसरे से नीचा समझने, हिंसा और लूटपाट करने की शिक्षा कोई धर्म नहीं देता है । मनुष्य अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए और सत्ता हासिल करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है । ऐसी स्थिति में नैतिकता, धर्म, आदर्श, ईमान आदि हर काल और हर देश में मानवीय समाज के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अनिवार्य है । सभी धर्म इंसान को इंसान बनाये रखने के लिए अपने दायित्वों की याद दिलाते हैं । परन्तु जब धर्म के केन्द्र में किसी एक नायक की प्रतिष्ठा और उसी के द्वारा बताये गए रास्तों को धर्म मानने पर उनमें अलगाव के तत्व घुसने लगते हैं। इस प्रकार धर्म संप्रदाय बन जाता है और अपने मकसद से अलग होने लगता है । इसकी पहचान अनिवार्य है ।

संस्थागत धर्मः-

धर्म का आध्यात्मिक रूप आधुनिक युग में बदला है । आज धार्मिक मूल्यों का विघटन होने लगा है । धार्मिक नेता धन और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे हैं । धर्म के नाम पर राजनीतिक अभिलाषाएँ पूरा करने की साज़िशें चल रही हैं । मानव अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए सही धर्म को भूलकर विकृत ‘धर्म’ के चंगुल में फँसने लगा है । इसप्रकार के विकृत धर्म संगठित होकर सत्ता हासिल कर रहे हैं । संस्थागत धर्म के बारे में भीष्म साहनी का मत भी ध्यान देने योग्य है । उनके अनुसार ‘‘जहाँ विधिनिषेध, धर्माचार, कर्मकांड, विधवत्, पूजा अराधना, जातिगत संगठन नियमावलियाँ, प्रचार प्रसार आदि जहाँ धार्मिक, संस्था के सरोकार और भूमिका उत्तरोत्तर लौकिक होने लगते हैं, धर्माचरण, ????-उपवास आदि का रूप ले लेता है और धार्मिक संस्था में संगठन के

जातिगत हितों पर अधिक बल दिया जाने लगता है, संस्थागत धर्म अपनी ही मूल स्थापनाओं से धीरे-धीरे दूर जाने लगता है, अपनी ही मान्यताओं से उसका संबन्ध विच्छेद होने लगता है, और वक्त रहते, न रहते वह सत्ता की राजनीति से जुड़ने लगता है।’’१३ संस्थागत धर्म से उपजे बाह्य प्रतीकों (जैसे मन्दिर, मस्जिद, गिरिजा घर आदि) का महत्व मानव मन के विकास को सीमित करता है । सामान्यतः ये बाह्य प्रतीक समाज में विभाजन और सांप्रदायिकता के साधन बन जाते हैं । पर एकत्व के चिंतन में बाधक बनने लगते हैं । क्योंकि इन प्रतीकों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वार्थ जुड़ जाते हैं । मानव के समस्त अंधविश्वास इन विकृत धार्मिक रूपों से जुड़े हुए हैं । धर्म का काम इन्सान को इन्सान से जोड़ना है। मुहब्बत की जगह एक-दूसरे से नफरत करना न सिखाए, अंधविश्वास को बढ़ावा देकर लोगों के दिमाग को न कुंद करे उससे यही अपेक्षा है । लेकिन आज हालत बदल गई है । आज मनुष्य जितना धार्मिक होंगे दूसरे धर्मों से उतनी ही घृणा करेंगे। यही हमारी धार्मिकता का परिचय है । युवा वर्ग में संगठित धर्म के संस्थाबद्ध रूपों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है । इन सारी प्रक्रियाओं में धर्म, अध्यात्म और नैतिकता का कोई जगह नहीं है । ‘धर्म और जाति कोढ़ की तरह है और यदि आज के सन्दर्भ में देखा जाए तो भारत की सबसे बड़ी समस्या है सत्ता के लिए धर्म का दुरुपयोग।’’१४ आज धर्म सिर्फ राजनीति में चलनेवाला सत्ता संघर्ष का वाचक है । सारे संगठित धर्म एक-दूसरे की होड़ में कट्टर और हिंसक बनते ही जाएँगे । ‘‘धर्म जब व्यक्तिगत दायरे में रहता है, वह आध्यात्मिक होता है । लेकिन जैसे ही वह किसी समूह की पहचान या प्रवृत्ति बनता है, वह सांप्रदायिक हो उठता है । समूह में आते ही वह संस्थान का रूप लेने लगता है । संस्थान बनते ही उसे सत्ता की ज़रूरत पैदा हो जाती है।’’१५ धर्म के द्वारा सत्ता हासिल करना धार्मिक नेताओं का लक्ष्य है । ‘‘वास्तव में धर्म मानवता के विशुद्ध प्रचारक हैं । उनसे बढ़कर दूसरा कोई भी मानव का मित्र नहीं हो सकता है, परंतु अत्यंत खेद की बात है कि, मानव-मानव के बीच घृणा फैलाने में आधुनिक काल में वे संलग्न पाये जाते हैं । धर्म ढकोसला हो गया है, जिससे दृष्टि को विस्तार मिलना चाहिए, उससे दृष्टि संकीर्ण होकर रह गई है । वे अंधविश्वास को पुख्ता करने में लगे हुए है । कर्मकाण्ड फिर पनपने में आ रहा है । धार्मिक नेता धर्मरूढ़ तो है ही, अब उनमें क्या शौक

दर्शाया है, राजनीति में दखल देने का-क्या शंकराचार्य हो या मुसलमानों के धर्मगुरु दोनों की इच्छा है कि वे राजनीति में प्रवेश करें।’’१६ इसप्रकार सत्ता के आधार की प्रक्रिया में कट्टरता और आक्रामकता का रास्ता धर्म चुनता है । इस होड़ में अपनी सर्वश्रेष्ठता प्रतिपादित करने का प्रयास भी करता है। इस सिलसिले में धर्म अपनी मूल आत्मा को खोकर एक बिलकुल विपरीत

रूपाकार में पुनरवतारित होता है । अर्थात् जब धर्म सत्ता के रूप में काम करने लगता है, तब सांप्रदायिक बनता है । इस प्रक्रिया में वह दूसरे धर्मों के साथ प्रतियोगिता करता है, अपने को मज़बूत बनाने के लिए कट्टर कानून बनाता है, और दूसरे से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए आक्रामक रुख अपनाता है । ये सारी बातें सामाजिक विकास में बाधक बनने लगती हैं ।

वास्तव में पूँजीवादी बाज़ार और उसकी संस्कृति ने धर्म के परंपरागत रूपों को किनारे कर दिया है । धर्म को नए माहौल के अनुकूल परिवर्तित कर दिया है । धर्म को अनुकूलित करके उसे भी अपनी मंडी का हिस्सा बना दिया है । इससे धर्म पूँजीवादी सभ्यता का उपकरण भी बन गया

है । उसने धर्म को वस्तु में बदल दिया है और वह सबसे अधिक बिकनेवाली चीज़ बन गया है । धर्म समाज की संगठन शक्ति भी बनने लगा है । धर्म के नए उभार में सच्चे भक्त की कोई जगह नहीं । जितना बड़ा तिलक है, उतनी ही बड़ी धर्म की दूकान भी होगी । पूँजीवाद ने धर्म के सार

का हरण करके उसे दूकान में बदल दिया है । पुराने धर्म और उसकी अवधारणा से यह धर्म और अवधारणा भिन्न है और इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि आज धर्म का उभार या बढ़ाव नहीं है जितना कि एक नये प्रकार के धर्म का प्रसार नज़र आता है । सभी धर्मों का अपदस्थ करता हुआ यह एक नया धर्म पनप रहा है जिसे नई व्याख्या की अपेक्षा है ।

संक्षेप में कह सकते है कि आज धर्म का उदात्त रूप नष्ट हो गया है । हर धर्मावलंबी संगठित होकर अपना शक्ति प्रदर्शन कर अपनी वोट बैंक बढ़ाते हैं । इसप्रकार धर्म केवल शक्ति प्रदर्शन का साधन बन गया है । मनुष्य की स्वार्थपरता तथा तंग दृष्टि धर्म को, धार्मिकता को संकीर्ण बना देती है। तब धर्म अपनी बुनियादी संवेदनाओं दया, करुणा, परदुख, कातरता, आत्मीयता, इत्यादी - से पृथक होता है । धर्माचार धर्म का स्थान ग्रहण करते हैं । ऐसे धर्म को राजनीति अपनाती है । इससे सांप्रदायिकता जन्म लेती है।

सांप्रदायिकता की व्याख्याः-

आज दुनिया की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है धर्म का राजनीतीकरण अर्थात सांप्रदायिकता। सांप्रदायिकता, मानव समाज और देश के विकास केलिए खतरनाक चीज़ है । इसलिए मानव मन से उपजे इस विष बीज को जड़ से उखाड़ने की आवश्यकता है । सांप्रदायिकता पर अनेक मत प्रचलित है । ‘संप्रदाय’ का अर्थ एक मत या वाद होता है । सांप्रदायिक शब्द के साथ एक अप्रिय अर्थ-जुड़ा हुआ है । उस अर्थ में धर्म सांप्रदायिक तब बनता है जब वह सत्ता के रूप में काम करने लगता है । एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों पर जब अपना मत लागू करने और अपने धर्म को सर्वोच्च समझने लगता है तब धार्मिक असहिष्णुता का जन्म होने लगता है । सांप्रदायिकता का यही दूषित रूप आज पूरी दुनिया में फैल चुका है । एक धर्म या सांप्रदायवाले दूसरे धर्म या संप्रदायवाले से न केवल निंदा करते हैं बल्कि अपने उत्कर्ष को बढ़ाने के लिए दूसरे के विरुद्ध दलबंदी भी करते हैं । मस्तराम कपूर के अनुसार ‘‘एक ओर धर्म अपने को मज़बूत बनाने के लिए कठोर कायदे कानून बनाता है, दूसरी ओर अन्य धर्मों के मुकाबले अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए वह आक्रामक रुख अपनाता है । दूसरे शब्दों में जब उसमें कट्टरता और आक्रामकता की प्रवृत्तियाँ पैदा होती है तो धर्म अपना सौम्य रूप खो देता है और सामाजिक विकास में बाधक बनने लगता है।’’१७ धर्म का अर्थ सांप्रदायिकता नहीं है । धर्म और सांप्रदायिकता में अंतर स्पष्ट है । हबीब तनवीर के मत में ‘‘सांप्रदायिकता का संबन्ध क्या धर्म से है ? नहीं है । संस्कृति का, धर्म मजहब से बहुत गहरा ताल्लुक है। लेकिन सांप्रदायिकता का न कल्चर से ताल्लुक है, न धर्म से । ये बात आप और हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये कोई और चीज़ है, इस चिड़िया का कुछ और ही नाम है । इसके पोलिटिकल काँम्प्लीकेशन है, ये पैदा की गई है, पहले नहीं थीं। अंग्रेज़ों ने इसे पाला पोसा बढ़ाया पनपाया।’’१८ धर्म एक विश्वास प्रणाली है और लोग अपने व्यक्तिगत विश्वासों के अंग के रूप में उसका पालन करते हैं । इसलिए धार्मिक होना कोई खतरनाक बात नहीं। लेकिन मनुष्य की स्वार्थ -मोह, सत्तालोलुपता और नकारात्मक दृष्टि धर्म या धार्मिकता को संकीर्ण बना देती है । तब धर्म अपनी बुनियादी संवेदनाओं - मानवीयता, दया करुणा, आत्मीयता आदि से अलग हो जाते हैं । ऐसे धर्मों को राजनीति अपनाती है । इससे सांप्रदायिकता जन्म लेती है । धर्म के विपरीत संप्रदायवाद धर्म के मुखौटे पर आधारित सामाजिक और राजनीतिक पहचान की विचारधारा का नाम है । अभयकुमार दुबे के शब्दों में ‘‘सांप्रदायिकता का धर्म से केवल इतना ही ताल्लुक है कि वह धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक मकसद से दोहन करती है, एक धर्म के अनुयायियों की गोलबंदी के लिए वह दूसरे किसी धर्म के प्रति घृणा का प्रचार करती है, और इस तरह धर्म के नाम पर कुछ लोग ‘अपने’ और कुछ लोग ‘पराये’ घोषित कर दिये जाते हैं । यही ‘अन्यीकरण’ या ‘अदरिंग’ की वह प्रक्रिया है, जो यूरोप में कभी फासीवादियों ने यहूदियों के खिलाफ चलायी थी, और जो आम तौर पर कालों के खिलाफ गोरों के बीच नस्लवादियों द्वारा चलायी जाती रहती

है । दक्षिण एशिया के आधुनिक राजनीति के गर्भ से निकलनेवाली यह एक अवांछनीय परिघटना है, जो उदारतावादी राजनीति और सेकुलर राष्ट्र के सिद्धान्त के खिलाफ सक्रिय रहती है ।’’१९

धर्म और राजनीति के गठबंधन से सांप्रदायिकता जन्म लेती है । आचार्य नरेन्द्र देव के शब्दों में - ‘‘धर्म एक व्यक्तिगत वस्तु है । वह राष्ट्र के कार्य में बाधक क्यों हो?.... किंतु वास्तविकता यह है कि धर्म को लोग राजनीति के लिए उपयोग करते हैं और जनता की सांप्रदायिक बुद्धि होने के

कारण जनता इन लोगों के हाथ में खेलती है ।’’२० इसप्रकार धर्म में जब सत्तामोह का जन्म होता है तब वह सांप्रदायिकता बन जाता है । वैभव सिंह धार्मिक संगठन और राजनीति के गठबंधन के बारे में यों कहते हैं - ‘‘सांप्रदायिकता एक खतरनाक राजनीतिक विचारधारा तो है ही, साथ ही यह परपीड़ा में आनन्द उठाने की आदिम मनोवृत्ति का भी हिस्सा है । इसी वजह से सांप्रदायिकता के उभार के समय हमें संकट में फंसे इंसान, जो दूसरे धर्म मज़हब का है, से हमदर्दी कम होती है बल्कि एक दुष्टतापूर्ण रोमांच हासिल होता है । इसमें समाज के लुंपेन क्लास और भद्र वर्ग में एक अद्भुत एकता स्थापित हो जाती है।’’२१ धार्मिक संगठन राजनीति करेंगे तो सांप्रदायिकता होगी और समाज के काम में परेशानी होगी ‘‘सांप्रदायिकता एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि धार्मिक संकीर्णता के आधार पर एक राजनीतिक प्रक्रिया है । राजनीति में ऐसा एक निहित स्वार्थ उभर रहा है और इसकी कोशिश करता है कि समाज में रूढ़िवाद और धार्मिक संकीर्णता बढ़े।

जब राजनीति में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आन्दोलन (उदारवादी या क्रांतिकारी आन्दोलन) नहीं रह जाते हैं, तब सांप्रदायिकता के आधार पर चलनेवाली राजनीति ही मुख्य राजनीतिक धारा रह जाती है ।’’२२ वस्तुतः सांप्रदायिकता व्यक्ति के नैतिक मूल्यों में अवमूल्यन तथा अमानवीकरण को उद्घाटित करती है । सत्ता के स्वार्थ ने व्यक्ति को इस स्थिति तक पहुँचा

दिया है जहाँ व्यक्ति का जीवन और मृत्यु का कोई महत्व नहीं है । सांप्रदायिकता का हर खेल अमानुषिकता को सुदृढ़ करता है । साँप्रदायिक भावना बढ़ाने में पण्डितों मुल्लाओं और पादरियों का हिस्सा कम नहीं है । साँप्रदायिक शक्तियाँ बहुत होशियारी से अपना खेल खेलती हैं । वे अपने समुदाय में यह भ्रम, पैदा करती है कि वे ही उसका अकेला शुभ चिंतक है । ‘‘सांप्रदायिकता मूलतः सत्ता का संघर्ष है और इसकी रणनीति समाज में मौजूद धार्मिक समूहों को केन्द्र में रखकर बनायी जाती है, इसलिए सांप्रदायिक दिमाग किसी सच्चे बहस में पड़ता ही नहीं, वह सिर्फ अपने और पराये का भेद पहचानते हैं।’’२३ कवयित्री कात्यायनी धर्म और सांप्रदायिकता के बारे में अपना मत प्रकट करते हुए कहती है कि ‘‘यह (सांप्रदायिकता) पूँजीवादी समाज में धर्म की राजनीति है। लेकिन सांप्रदायिकता का विरोध करते हुए धर्म दर्शन के विरुद्ध भी वैचारिक संघर्ष करना होगा, क्योंकि जनता में गहरी जड़ें जमाए धार्मिक रूढियाँ धार्मिक कट्टरपंथियों को मदद पहुँचाती हैं और जनता के धार्मिक रूढिबद्ध संस्कारों को उकसाने और मज़बूत बनाने का काम करते हुए धार्मिक कट्टरपंथी अपना उल्लू सीधा करने का काम करते हैं । सांप्रदायिकता के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष का परिप्रेक्ष्य सापेक्षतः अल्पकालिक होता है, जबकि धर्म के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है जो सर्वहारा आन्दोलन के प्रारंभिक दौर से लेकर समाजवादी संक्रमण की लंबी अवधि-तक लगातार जारी रहता है ।’’२४

संक्षेप में कहा जा सकता है कि धर्म का गलत इस्तेमाल सांप्रदायिकता है । दूसरे शब्दों में, जब धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म घुस चुका होता है तब सांप्रदायिकता जन्म लेती है । सांप्रदायिकता आम तौर पर इतिहास की गलत समझ और अबोधता की ज़मीन पर ही अपना काम करती है । अतः उसके खिलाफ का संघर्ष एक व्यापक सांस्कृतिक अभियान माँगता है । इस अभियान को लगातार जारी रखना भी चाहिए ।

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समाज तथा व्यक्ति जीवन में राजनीति और धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है । धर्म बेशक मानवनिर्मित है । देश काल की माँग के अनुसार मनुष्य के आचरण, शील व दायित्व को बारे में महामनीषियों द्वारा की गई एवं संग्रहीत बातें ही धर्म का आधार है । मानवीय सभ्यता के विकास यात्रा में धर्म की अनिवार्यता को पूरी तरह से कभी भी नकारा नहीं गया है । पर धर्म का गलत इस्तेमाल सांप्रदायिकता है । जब धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म दखल देता है, तब धर्म अपनी सामाजिक पहचान खोकर संस्थागत धर्म में तब्दील होता है । संस्थागत धर्म सत्तामोही होता है। सत्ता को हडपने के लिए धर्म राजनीति का सहारा लेता है । यों धर्म और राजनीति का गठबंधन यानी सांप्रदायिकता देश एवं जनता के लिए खतरा बनता है ।भारतीय संस्कृति, समाज, भाषा और राजनीति के तेज़ी से बदलते चेहरे की झलक विभाजन संबन्धी कहानियों में मिलती है । विभाजन के समय जो नरसंहार हुआ वह भारतीय इतिहास की नहीं, विश्व इतिहास की एक ऐब ही है । विभाजन सांप्रदायिकता के बहाने राजनीतिक स्वार्थ मात्र रह गया । आज़ादी के बाद देश में धर्म और राजनीति को अलग करना आवश्यक था, यह नहीं किया गया । उसके विपरीत धर्म के आधार पर चुनावों के लिए वोट बटोरने की होड़ चल पड़ी। इससे भेद-भाव बढ़ा, सांप्रदायिकता को बल मिला । सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक दंगों की शिकार अक्सर आम जनता ही है । भारत के सामाजिक परिवर्तन में आम आदमी का महत्वपूर्ण योगदान है । वे समाज के बदलाव के दौर में यह नहीं जानती कि वह सचमुच कौन है? किस समूह का है ? उसकी पहचान क्या है ? नेताओं का काम होता है उन्हें यह सब बताना और समझाना । लेकिन वे आम जनता को असली शत्रु के विरुद्ध लड़ने के बजाय आपस में अपने मित्रों, भाइयों के विरुद्ध लड़वाते हैं । सही दुश्मन हमेशा बचता रहता है ।

-:सन्दर्भ ग्रंथ सूचीः-

१. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा -डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में सामाजिक चिंतन, पृ. ४९

२. सूर्यनारायण भट्ट - धर्म और जीवन, पृ. १२

३. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा -डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में सामाजिक चिंतन, पृ. ४९

४. भीष्म साहनी - आज की अतीत, पृ. ३९२

५. वही - पृ. ३९३

६. शंभूनाथ - धर्म का दुःखान्त, पृ. १७

७. कृष्णकुमार - प्राचीन भारत का सांस्कृतिक इतिहास - पृ. ४२

८. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - धर्म और समाज, पृ. ४६

९. राही माजूम रज़ा - छोटे आदमी की बड़ी कहानी, पृ. १६

१०. भीष्म साहनी - आज की अतीत, पृ. २८७

११. विनोदशाही - विचारधारा, विज्ञान, सांस्कृति और धर्म, समयांतर - पृ. २६

१२. राज किशोर - नैतिकता के नए सवाल, पृ. ४३

१३. भीष्म साहनी - आज की अतीत, पृ. २९१

१४. राही माज़ूम रज़ा - लगता है बैकार हो गये हम (भुमिका में)

१५. शंभूगुप्त - हंस - मई २००४, पृ. २४

१६. राजेन्द्र मोहन भटनागर - दंगे क्यों, पृ. ८२

१७. राजकिशोर - अयोध्या और उससे आगे - पृ. १०४

१८. हबीब तनवीर - नुक्कड जनम संवाद - जुलाई दिसंबर २००१, पृ. ११०

१९. अभयकुमार दुबे - बीच बहस में सेकुलरवाद - पृ. ४८४

२०. आचार्य नरेन्द्र देव - साहित्य शिक्षा और संस्कृति, पृ. ५६

२१. किशन पटनायक - विकल्पहीन नहीं है दुनिया, पृ. २०८

२२. वही - पृ. २०८

२३. राजकिशोर - एक अहिन्दू का घोषणापत्र - पृ. ४३-४४

२४. कात्यायनी - धर्म मार्क्सवाद और भारतीय वामपंथ - समयांतर, पृ. ४४

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लेखक परिचय

नाम- यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

पिता- श्री मुरारी लाल उपाध्याय

जन्मतिथि- 06-06-1987

शिक्षा- M.A. (हिंदी) B.Ed., NET-JRF

संप्रति- शोधार्थी, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (म0प्र0

पता- माहौर गली, कोरी मोहल्ला,

रामनगर, मुरैना (म0प्र0) - 476001

मोबाईल- 07489651919

Email- dr.yaduupadhyay@gmail.com

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