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ऎसे लोग मरते हैं कुत्तों की मौत / डॉ. दीपक आचार्य

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हमारे जीवन में माता-पिता, गुरु और ईश्वर के बाद उन सभी लोगों और संस्थाओं के प्रति श्रद्धा और आदर-सम्मान का भाव होना जरूरी है जो हमारे लिए रोजी-रोटी का प्रबन्ध करते हैं। चाहे वह कोई आश्रयदाता, सेठ, मालिक हो या फिर सरकारी, अद्र्ध सरकारी या निजी संस्थान, विभाग अथवा कार्यालय।

इन सभी के प्रति आत्मीय निष्ठा, वफादारी और इनसे जुड़ी सेवाओं और कार्यों के प्रति गांभीर्य का होना हर इंसान की जिन्दगी के लिए नितान्त अनिवार्य है। माता-पिता और गुरु के आशीर्वाद तथा भगवान की कृपा के बिना जीवन का आनंद नहीं पाया जा सकता है। इसलिए इनके प्रति चरम श्रद्धा का भाव रखें, उनकी सेवा करें और हमेशा यह प्रयत्न करें कि इन्हें किस प्रकार खुश रख जा सकता है।

इनकी मामूली खुशी भी हमारे लिए खुशहाली के कई भण्डार खोल सकती है।  और इनकी तनिक सी नाराजगी बरबाद करने को काफी है।

इसके बाद स्थान आता है उनका जो हमारे जीवन निर्वाह अथवा रोजी-रोटी का प्रबन्ध करते हैं। इन लोगों या संस्थानों की वजह से ही हमारा परिवार पलता है, हमारे शरीर का पोषण होता है और हम स्वाभिमान के साथ जीवन जीते हैं।

जरा कल्पना कीजिये कि किसी आकस्मिक वजह से तनख्वाह या पारिश्रमिक मिलना बंद हो जाए तो हमारा क्या होगा, हमारे परिवार का क्या होगा, हमारे सपनों और भावी जीवन का क्या होगा।

हमारी वह सारी मौज-मस्ती  गायब हो जाए, चेहरे का नूर उतर जाए, धींगामस्ती, फैशनी रहन-सहन और खान-पान सब कुछ भूल जाएं, कई तो बीमार पड़ जाएं, कई आत्महत्या कर लें और बचे-खुचे कुण्ठाओं और तनावों में जीते हुए जीवन को नारकीय ही समझ बैठें।

भगवान करे ऎसा न हो, लेकिन हो जाए तो अपने आप पर क्या  बीतेगी, उसके बारे में थोड़ा सा चिन्तन कर लें, तो अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाए।

बहुत सारे लोग तमाम प्रकार की व्यवस्थाओं में इस प्रकार के विद्यमान हैं जिन्हें लगता है कि रोजी-रोटी के नाम पर जो कुछ मिल रहा है, वह मौज उड़ाने के लिए ही है, काम-धाम से हमारा क्या लेना-देना।

ढेरों लोग हर बाड़े और गलियारे में ऎसे मिल ही जाते हैं जो अपने कर्तव्य कर्म तक से विमुख हैं, इनकी आँखें ही तब खुलती हैं जब कागज के टुकड़े पर गांधीजी के दर्शन कर लें, कुछ खनखनाहट सुन लें, अपनी उन्मुक्त मौज-मस्ती और भोग-विलास के संकेत पा लें, खूबसूरत सा उपहार सामने आ जाए अथवा अपने तन-मन की तृप्ति के लायक कोई सुनहरा मनोहारी बिम्ब सामने परोसा हुआ मिल जाए। अन्यथा ये अधमरे पड़े रहेंगे। कभी बीमारी का बहाना बनाएंगे, कभी और कुछ। और इसी तरह मौज उड़ाते हुए टाईमपास करते रहेंगे।

जो लोग अपने निर्धारित कर्तव्य कर्म से मुँह मोड़ते हैं, किसी काम से अपने पास आने वालों को निराश करते हैं, उनसे कुछ उम्मीद रखते हैं, तभी काम करते हैं, जो मिल रहा है उसमें संतोष न रखकर ऊपरी ही ऊपरी कमाई और पराये संसाधनों का आनंद पाने के चक्कर में लगे रहते हैं, दिन भर चाय-काफी की थड़ियों और होटलों में आवाजाही करते हुए समय निकालते हैं, वे सारे के सारे लोग भले ही अपने आपको कितना ही खुश समझें, मगर ये दरिद्री, आलसी और प्रमादी लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते।

ये निठल्ले, नुगरे और कामचोर लोग एक समय बाद ऎसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं अथवा अकाल मौत को प्राप्त हो जाते हैं कि इनका हराम से कमाया पूरा का पूरा संचित द्रव्य एक झटके में बाहर निकल जाता है।

इनका पैसा इनके खजानों में आने के बाद से ही बाहर निकलने के तमाम रास्तों पर पैनी नज़र रखता है और जैसे ही कोई सा कारण बनता है, यह पैसा लपक कर बाहर भाग जाता है। 

अक्सर कुछ लोगों के बारे में सुना जाता है कि ये लोग जिन संस्थानों और प्रतिष्ठानों में काम करते हैं वहां के लिए इनके मन में कोई श्रद्धा नहीं होती। इन्हें केवल अपने वेतन-भत्तों और पारिश्रमिक से ही मतलब रहता है। चाहे संस्थानों में ईंटें खिर रही हों, पत्थर निकल रहे हों, जंगली झाड़-झंखाड़ पसरे हुए हों, बिजली बेकार खर्च हो रही हो, पानी फिजूल बह रहा हो, संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा हो, संस्थानों में समय पर काम-काज नहीं हो रहे हों, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

किसी धर्मशाला में वक्त-बेवक्त चहलकदमी के लिए आ जाने वाले पथिक की तरह आएंगे और टाईमपास करके चले जाएंगे। कोई इनसे पूछे कि कितना काम किया, तो शर्म के मारे मुँह लटकाने के सिवा इनके पास कोई चारा नहीं होता। ये कुछ काम किए हों, तब तो कह पाने की स्थिति में हों।

यही कारण है कि इन लोगों की वजह से समाज और देश तरक्की नहीं कर पा रहा है, पृथ्वी पर बिना कारण इन निकम्मों और बेशर्म पापियों का भार बढ़ रहा है और जनता के गाढ़े परिश्रम, हमारे किसानों की दिन-रात मेहनत, श्रमिकों के त्याग आदि से अर्जित धनराशि से ऎसे-ऎसे लोग मौज उड़ा रहे हैं जो भिखारियों से भी गए बीते हैं।

अपने आपको देखें, कभी आत्मचिन्तन करें।  अपने कार्यस्थलों पर समय पर जाएं, पूरे समय रहें, ईमानदारी से काम करें और हमेशा यह प्रयास करें कि अपने संस्थान की छवि दिन ब दिन कैसे अच्छी बने, साख कायम करे और जो रोजी -रोटी देता है, चाहे वह मालिक हो या सरकार, इसकी पूरी बजाएं। ईमान-धरम का खाएंगे तो अपने शरीर पर लगेगा, काम आएगा, पीढ़ियों तक अपनी कीर्ति-पताका फहरेगी। ईमानदारी से कमाया और मेहनत का ही खाएं।

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, दलाली और बेईमानी का न खाएं। ऎसा किया तो बाद में नालायक खा जाएंगे, मरने के बाद भी बरसों तक लोग अपने नाम का रोते हुए गालियों की बौछारें करते रहेंगे, बीमारी में खर्च हो जाएगा या खुद को ऎसे कीड़े पड़ेंगे कि सारा माल निकल जाएगा, और खटिया में पड़े-पड़े पीड़ा भुगतनी पड़ेगी सो अलग। और यह भी न हुआ तो कुत्तों की मौत तो मरना ही है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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