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केवल औपचारिकता नहीं है अभिवादन और चरणस्पर्श / डॉ.दीपक आचार्य

केवल औपचारिकता नहीं है

अभिवादन और चरणस्पर्श

- डॉ.दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

किसी को नमस्कार कर देना, किसी के आगे सर झुका कर विनम्रता अभिव्यक्त करना, हाथ मिलाना और चरणस्पर्श करते हुए श्रद्धा का प्रकटीकरण कर देने से जुड़ी शारीरिक क्रियाएं मात्र औपचारिकता और शिष्टाचार ही नहीं हैं बल्कि इनके पीछे कई गूढ़ार्थ छिपे हुए हैं।

इंसान को भगवान ने बुद्धि, विवेक और समझदारी के साथ ही सामने वालों के चरित्र, गुणावगुण और स्वभाव को पहचानने की भरपूर क्षमताएं दी हैं जिनके अनुरूप बर्ताव किए जाने की परंपरा भी है और विधान भी। 

यह भाव मुद्राएं और शारीरिक क्रियाएं अपने पीछे ढेरों रहस्य समेटे हुए हैं। दुनिया में करोड़ों लोग हैं जिनमें बहुत सारे लोगों के सम्पर्क में हम आते हैं। इनमें सामान्य से लेकर महान-महान तक शामिल हैं।

किसी आदमी को उसके पद, प्रतिष्ठा और वैभव के आधार पर मूल्यांकित नहीं किया जा सकता जैसा कि आजकल हो रहा है। सारी दुनिया उन्हीं लोगों के पीछे दीवानी हो जाती है जो उनके जायज-नाजायज स्वार्थ पूरे करने में मददगार साबित होते हैं या भविष्य में काम होने की कोई संभावना हो, जो अपने अपराधों और गलत कामों पर परदा डालने की क्षमता रखते हैं अथवा हमें सभी प्रकार के कुकर्मों के परिणामों से अभय प्रदान करने का सामथ्र्य जिनमें है।

हम अपनी पूरी जिन्दगी में उन्हीं लोगों के प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा का सार्वजनीन प्रदर्शन करते हैं जो हमारे स्वार्थ को पूरा करने में मदद कर सकते हैं अथवा जिनके बारे में हमारे मन में यह होता है कि ये लोग कभी हमारे काम आ सकने की स्थिति में होंगे। कई मामलों में हम इन दुष्टों के पाँव इसलिए भी पकड़ते रहते हैं ताकि वे हमारा कुछ बिगाड़ा न कर डालें।

इन लोगों के लिए कुछ और करो न करो, भीड़ के सामने दोनों हाथ जोड़कर, सर झुकाकर अभिवादन कर लो, विनम्रता की प्रतिमूर्ति बनकर हाथ मिला हो, उनके पाँव छू लो, बस काफी है। बड़े लोगों की कमजोरी यही होती है। वे भीड़ के सामने यही दिखाना चाहते हैं कि कितने सारे लोग उनके पाँव छूकर अपनी दिली श्रद्धा का इज़हार करते हैं।

इन महान लोगों का अहंकार इसी से परिपुष्ट होता है और वे अपने आपको ईश्वर के समकक्ष मान लिया करते हैं। आजकल चरण स्पर्श की कल्चर खूब बढ़ी हुई है। खूब सारे लोगों की भीड़ सर्वत्र जमा हो जाती है जिसके लिए पाँव छूना किसी धार्मिक और सामाजिक रस्म से कम नहीं होता।

जिन लोगों को भगवान के सामने हाथ जोड़ने में शर्म आती है, अपने माँ-बाप, गुरुजनों और बुजुर्गों के पाँव छूने में जिन लोगों को लज्जा का अनुभव होता है, वे लोग इन मलीन चित्त और दुष्ट बुद्धि वाले लोगों के पाँव छूने को अपना गौरव समझते हैं।

ये लोग अपनी जिन्दगी में हजारों लोगों के पाँव छूने का रिकार्ड कायम करते रहते हैं। इनके लिए पाँव छूने का मतलब सामने वाले के दिल में अपने प्रति स्नेहसिक्त स्थान बनाना होता है। न केवल सांसारिक बल्कि संसार से विरक्ति पा चुके बड़े-बड़े बाबा लोग भी उन शिष्यों और भक्तों पर खास श्रद्धा रखते हैं जो कि रोजाना उनके पाँव छूने को अपनी जीवनचर्या का अंग बना चुके होते हैं।

बड़े लोगों को कोई गिफ्ट नहीं दे सको, उनके लिए मालाओं और बुके का इंतजाम न कर सको, दान-दक्षिणा, दाना-पानी या चुग्गे की व्यवस्था न कर सको, उनके लिए दैहिक भोग-विलास और क्षणिक आनंद का कोई इंतजाम न कर सको तो कोई बात नहीं, चरण स्पर्श का मोहमुग्ध उपाय कामदेव के बाणों से कम नहीं है।

हर कोई खुश हो जाता है इतने सारे लोगों द्वारा अपने पावन कहे जाने वाले चरण कमलों का स्पर्श करवा कर।  और तो और बड़े-बुजुर्ग तक अपनी आयु, बुद्धि और कौशल से कम लोगों के चरण स्पर्श करते हुए अपने आप को धन्य समझने लगते हैं। और अपने आपको बड़े मानने वाले अपेक्षाकृत कम आयु वाले लोग हद दर्जे की बेशर्मी के साथ सब चुपचाप देखते रहकर अपने हाथ सर पर रखकर आशीर्वाद तक दे डालते हैं।

परंपरागत सभ्यता और संस्कृति के मूलभूत सिद्धान्तों को भुला बैठे हम लोग अपने क्षुद्र स्वार्थों और तुच्छ कामों के लिए इन दिनों जो कुछ दिग्दर्शन करा रहे हैं वह साँस्कृतिक अधःपतन ही कहा जा सकता है।

आदर-सम्मान और श्रद्धा की अभिव्यक्ति के लिए सामने वाले व्यक्ति का पात्र होना जरूरी  है। जो पात्र है उसे समुचित सम्मान मिलना ही चाहिए। लेकिन जो अपात्र है उसे जो हाथ जोड़ता है, हाथ मिलाता है, पाँव छूता है वह पाप का भागी होता है और उसके पापों की गठरी से कुछ पाप अपने खाते में डाल लेता है।

अभिवादन और चरणस्पर्श दोनों ही प्रक्रियाएं सूक्ष्म रूप से इंसान के भीतर विद्यमान ऊर्जाओं के प्रवाह से संबंधित हैं। यह ऊर्जा नकारात्मक भी हो सकती है और सकारात्मक भी। शास्त्र या विज्ञान दोनों की दृष्टि से  देखा जाए तो ऊर्जा का संचरण भरे हुए से खाली की ओर होता है और इस मामले में यदि कोई व्यक्ति नकारात्मकता से भरा हुआ है, पापों का पर्याय है, अंधेरों का संवाहक और आश्रयदाता है तो उसके पाप और नकारात्मक ऊर्जा उस इंसान की ओर संवहित होंगी जो कि उन्हें अभिवादन कर रहा है, हाथ मिला रहा है अथवा पाँव छू रहा है।

इस नकारात्मकता में केवल पाप ही नहीं होते बल्कि सामने वाले की बीमारियां, व्यभिचारी व्यक्तित्व, चरित्रहीनता और भ्रष्टाचार के लक्षणों, अहंकार, कुटिलता और आसुरी भावों का भी सम्मिश्रण होता है। 

यही कारण है कि भारतीय परंपरा में केवल उन्हीं लोगों को हाथ जोड़ने और चरणस्पर्श करने का विधान है जो कि दिव्यताओं से भरे हुए है ताकि इनकी सकारात्मक ऊर्जाओं का कुछ अंश उन लोगों को प्राप्त हो सके, जो उनके प्रति श्रद्धा भाव से अभिवादन कर पाँव छूते हैं।

हममें से अधिकांश लोगों के जीवन में असफलता, मलीनता और पिछड़ेपन का यह भी एक बहुत बड़ा कारण है। हम जिन लोगों को व्यक्तित्व के मामले में पहाड़ समझने का भ्रम पाले हुए होते हैं उनमें से अधिकांश लोग कूड़े-करकट के किसी डंपिंग यार्ड में बने कचरे के पहाड़ से कम नहीं होते जिनमें सभी प्रकार के दुर्गुण और मलीनताओं का समावेश होता है और इन लोगों को पापों का पहाड़ कहना अधिक उपयुक्त होता है।

इनके प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने और पाँव छूने से हमारे पूर्वज व देवी-देवता नाराज होते ही हैं, पराये पापों का आयात करने से हमारे खाते में पापों का भण्डार बढ़ता जाता है। हमारे चेहरे से ओज-तेज गायब हो जाने, मलीनता और कालापन आ जाने, तरह-तरह की बीमारियों से घिर जाने और निराशा-हताशा में जीने का भाव आ जाने का यह भी एक प्रमुख कारण है।

हाथ जोड़ने, हाथ मिलाने और पाँव छू लेने की आदत बना लेना अपने आप में मुसीबतों का आमंत्रण है। इसे केवल लोकाचार और खुश करने की कला समझना मूर्खता ही है। जीवन का कोई सा क्षेत्र हो, उन्हीं लोगों को आदर-सम्मान एवं श्रद्धा दें जो वास्तव में इसके हकदार हैं, ऎरो-गैरों-नत्थूगैरों के प्रति आदर दर्शाने वाले इंसान की जिन्दगी भले ही ऊपर से सफल दिखे, मगर इनका अंत बुरा होता है और आने वाले सौ जन्मों में भी इस नालायकी से खफा होकर भगवान इन्हें मनुष्य नहीं बनाता। अभिवादन-चरणस्पर्श और साष्टांग दण्डवत के वैज्ञानिक-शास्त्रीय महत्व को समझें और इसका परिपालन करें।

समाज और देश की ढेरों समस्याओं का यह भी एक कारण है कि अपात्र लोगों को हमने बेवजह आदर-सम्मान और श्रद्धा देकर इतना अधिक ऊपर चढ़ा दिया है वे सारे हमें अपने अधीन और गुलाम समझने लगे हैं और धरती तथा जमीनी हकीकत से इतने दूर हो गए हैं कि धड़ाम से गिरने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है, और गिरेंगे तो हम जैसे उन लोगों को ले डूबेंगे जो इन लोगों को अभिवादन  और चरणस्पर्श कर आसमान की ऊँचाई पर चढ़ा दिया करते हैं।

जैसी करनी वैसी भरनी तो हमें भुगतनी ही पड़ेगी। समझ जाएं तो  ठीक वरना इस जन्म में तो हम अपनी मनुष्यता खो ही बैठेंगे, अगले जन्मों में भी इंसान नहीं बन पाएंगे।

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