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इन्हें आशीर्वाद दें कहें - तथास्तु / डॉ. दीपक आचार्य

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लोग अजीबोगरीब हैं। कोई अपने आपको अच्छा, स्वस्थ और मस्त दिखाना चाहता है तो दूसरी तरफ ऎसे भी लोग हैं जो खुद को हमेशा बीमार, मरियल-मुर्दाल, सुस्त और हताश-निराश दिखाना चाहते हैं।

इस मामले में हर इंसान का अपना खुद का मनोविज्ञान होता है जिसके अनुरूप वह अपने पूरे जीवन को एक साँचे में ढाल देता है और फिर उसके भीतर रहकर ही साँचे के अनुरूप अपने स्वभाव, कर्म और लोक व्यवहार का परिचय देता रहता है।

हर इंसान के भीतर अपने आपको अन्यतम स्वरूप में प्रकट करने की सारी क्षमताएं होती हैं। इसके बावजूद अधिकतर लोेग किसी न किसी को अपना आदर्श या रोल मॉडल बनाते हुए उसके अनुरूप अपने जीवन निर्माण की दशा और दिशा तय करते हैं, उसी के अनुसार अपने आपको बनाने का प्रयास करते हैं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो अधिकांश लोगों की जिन्दगी नकलची होती है और दूसरों की नकल के सहारे जिन्दगी गुजार लेने का स्वप्न साकार होता रहता है। बहुत कम लोग होते हैं जो अपनी सम्पूर्ण मौलिकता के साथ जीते हैं और अपनी विशिष्ट पहचान कायम करते हैं।

इसके अलावा के बहुत से लोग आडम्बरी जीवन जीते हैं और उनके हर विचार, मुद्रा, भावों और तमाम प्रकार के व्यवहार के मूल में दूसरों को प्रभावित करने का उद्देश्य रहता है। इस मामले में इनकी हर हरकत औरों पर निर्भर करती है।

बहुत कम लोग ऎसे हैं जो अपने आप में जीते हैं, साफगोई और सच्चाई पर चलते हैं और जैसे हैं वैसे ही दिखते भी हैं और उनका व्यवहार भी ऎसा ही होता है जिसमें किसी भी अंश में दोहरा-तिहरा चरित्र, कुटिलता या पाखण्ड नहीं होता।

ये लोग हमेशा मन-कर्म और वचन के सच्चे और पक्के होते हैं और इनकी मस्ती का यही राज होता है। इन्हें न औरों से कोई मतलब रहता है न औरों के लिए इनका कोई मतलब होता है।

इसके विपरीत अधिकांश लोगों की जिन्दगी में दोहरा-तिहरा चरित्र, झूठ-फरेब और लुच्चाई, औरों को प्रभावित करने या कि अपने काम निकलवाने के लिए हर तरह के अभिनयों का प्रकटीकरण और पाखण्डी व्यवहार सर्वाधिक ग्राह्य बना रहता है।

ये लोग अपनी नाकाबिलियत को छिपाने, कामचोरी भरे स्वभाव को बनाए रखने, जिम्मेदारी से बचे रहने और अपने लाभों के लिए दूसरों की सहानुभूति लूटने में माहिर होते हैं।

सच कहा जाए तो इन्हीं बैसाखियों के सहारे ये लोग पूरी की पूरी जिन्दगी तक गुजार लिया करते हैं। हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में ऎसे बहुत से लोग दिखते हैं जो सहानुभूति पाने के लिए सैकड़ों-हजारों बहाने करते रहते हैं और अपने कथन को साबित करने के लिए शरीर के सारे अंगों का इस प्रकार संचालन करते रहते हैं जिससे कि सामने वाला सही मान ले और पसीज जाए तथा उसे ढाढस बंधाने लगे।

किसी न किसी बहाने जब औरों की सहानुभूति पाने के लिए अभिनय करते हैं तब ये बड़े-बड़े और अनुभवी भिखारियों, बहुरूपियों और स्वांगियों को भी पीछे छोड़ दिया करते हैं। कोई कहेगा बीमार हूं, कोई अपने आपको अत्यन्त गरीब बताता रहेगा, कोई कहेगा खूब कर्ज है सर पर, कोई घर-परिवार की समस्या का दुखड़ा रोता रहेगा, कोई अपने काम-धंधे और दफ्तर का रोना रोता रहेगा।

कितने सारे ऎसे हैं जो कि अपने आपको इतना अधिक बीमार बताएंगे कि सामान्य काम-काज तक करने से भी बचने की कोशिश करते रहते हैं। किसी के द्वारा बीमारी के बहाने को देख कर ऎसा ही महसूस होगा कि जैसे थोड़े समय में मरने ही वाले हैं।

अधिकांश लोगों की आदत होती है अपने आपको गरीब, बीमार और असहाय मनवाने की। ये लोग अपने अभावों, दुःखों और पीड़ाओं का रोना रोते रहेंगे। कितना दुर्भाग्य है कि कर्तव्य कर्म की बात सामने आते ही अथवा कर्मस्थलों में रहते हुए ही इन लोगों को अपनी विवशता, बीमारी, टाईम न होने, काम में अशक्त महसूस करने और सौ तरह की मजबूरियां याद आ जाती हैं और बाड़ों से छूटने के बाद सब कुछ खत्म हो जाता है जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।

कर्तव्य स्थलों से छूटने के बाद इनकी सारी बीमारियां और परेशानियां अपने आप खत्म हो जाया करती हैं। इन लोगों की जन्मकुण्डली में जाने कैसे ग्रह-नक्षत्र टिके होते हैं कि  ड्यूटी के वक्त ही सारी समस्याएं और दुःख बने रहते हैं, उसके बाद कुछ नहीं।

किसी भी प्रकार की निष्काम सेवा, परोपकार या ड्यूटी का नाम सुनते ही सारे ग्रह-नक्षत्र अस्तव्यस्त हो जाते हैं और अपना घातक प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया करते हैं और वह भी ऎसा कि ये लोग अपने आपके भयंकर बीमार, दुःखी और परेशान होने का रोना रोने लगते हैं। और परेशानियां भी एक-दो नहीं, खूब सारी पीड़ाओं का बखान एक साथ होने लगता है।

इन दिनों ऎसे लोगों का चलन खूब चल पड़ा है। जिसे देखे, मिलने पर अपने आपको बीमार दिखाते हुए यही कहता है- क्या करूं, बीमार हूँ, दवाइयां ले रहे हैं। काम भी नहीं होता, थोड़ा सा कुछ कर लो, थक जाते हैं आदि-आदि।

अपने आपको जानबूझकर परेशान, बीमार और दुःखी बताने वाले इन सभी लोगों से जब भी पाला पड़े। इन्हें अपनी ओर से जी भर कर आशीर्वाद देें और कहें - तथास्तु।

इन लोगों को पता ही नहीं है कि बिना किसी वजह से बीमारी, तनाव, दुःखों, अभावों और परेशानियां का बहाना बनाते रहने की आदत अपने लिए कभी भी कोई भीषण समस्या पैदा कर सकती है।

हर आदमी के जीवन में रोजाना कुछ सैकण्ड का समय ऎसा आता ही आता है जिसमें अपने मुँह से जो कुछ निकलता है वह शत-प्रतिशत सत्य हो ही जाता है। हो सकता है हम हमेशा  दुखड़ा रोते रहते हैं और इसी दौरान वह क्षण आ ही जाए तो क्या हो।

पर बहानेबाज और नौटंकी करने वाले लोग कभी भी बाज नहीं आते। वे अपनी करनी करते ही चले जात हैं। ये लोग समझाने से नहीं समझते। कूए में गिरने के बाद ही इन्हें अक्ल आती है।

इन लोगों के लिए अपना एक ही फर्ज है और वह यह कि जब-जब भी ये लोग बहाने बनाएं, अपना दुखड़ा रोयें, काम से जी चुराने के लिए बहाने बताएं, उन्हें पूरे मन से आशीर्वाद दें और कहें - तथास्तु।

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