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विश्वविद्यालयों से विवाद नहीं समाधानों की अपेक्षा / प्रो. बृज किशोर कुठियाला

जेएनयू विवाद

जेएनयू में हुए घटनाक्रम ने  भारतीय समाज के सम्मुख कई प्रश्न उत्पन्न किए हैं। एक महत्वपूर्ण विषय वर्तमान में विश्वविद्यालयों की भूमिका का भी है।  सिद्धान्ततः नव ज्ञान का सृजन, वर्तमान ज्ञान का वितरण एवं भविष्य के बौद्धिक वर्ग को संस्कारित करने का कार्य मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों का माना जाता है। अधिक गहराई में जाएं तो ज्ञान और विद्या में भी भेद किया जाता है। ज्ञान, जानकारियों और सूचनाओं पर आधारित है जबकि विद्या उसका दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्ष है इसीलिए विश्वशिक्षालय न कहकर विश्वविद्यालय के नाम से इन संस्थाओं को जाना जाता है। नामकरण में विश्व का आधार भौगोलिक न होकर ज्ञान और विद्या के व्यापक एवं सम्पूर्ण रूप से सम्बद्ध है। अधिकतर विश्वविद्यालय नई पीढ़ी को विद्या दान का कार्य तो करते हुए दिखते हैं परन्तु शोध आधारित एवं प्रामाणिक नए ज्ञान की रचना का कार्य हमारे देश में कम गति से चल रहा है। इसलिए जब वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता का आंकलन किया जाता है तो भारत उसमें दिखाई नहीं देता। यदि विद्या दान का संख्यात्मक आंकलन हो तो संभवतः भारतीय विश्वविद्यालय विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में आएंगे।
परन्तु वर्तमान संदर्भ में विश्वविद्यालयों की भूमिका में एक और आयाम जुड़ता हुआ दिख रहा है और वह है राजनीतिक विचाराधाराओं का विश्वविद्यालयों में प्रतिपादन एवं दृढ़ीकरण करने का। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय ने जो स्वछन्द वातावरण बनाया है उसमें केवल मात्र वर्तमान व्यवस्थाओं और स्थितियों का विरोध ही नहीं है परन्तु देश और समाज के विघटन का भी विचार स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। क्या विश्वविद्यालयों के प्रांगण शत्रु देश के उद्देश्यों को सफल बनाने के समर्थन में भी उपयोग में किये जाने चाहिए? यक्ष प्रश्न तो इस समय यही उठकर खड़ा हुआ है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ हर विश्वविद्यालय में ही नहीं महाविद्यालयों और विद्यालयों में भी पढ़ाया जाता है और भविष्य के नागरिकों को संवाद के, स्वराज्य के संस्कार व्यक्तित्व में प्रविष्ट करवाये जाते हैं परन्तु साथ ही युवा वर्ग को चाहे वो किसी भी विषय का छात्र हो एक नागरिक के तौर पर उसको उस कर्त्तव्य का भी बोध करवाया ही जाता है जिसमें अधिकारों के साथ संयम का दायित्व भी होता है। क्या भारत को एक बार फिर से तोड़ने की भूमिका तैयार करने का अधिकार किसी विष्वविद्यालय के अध्यापक या विद्यार्थी वर्ग को हो सकता है?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भारत के सबसे अधिक प्रतिष्ठित शिक्षा के संस्थानों में माना जाता है। हर विश्वविद्यालय के संचालक-प्रबंधक इस विश्वविद्यालय को रोल मॉडल मानकर उस जैसे ही बनने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि प्रवेश की व्यवस्था से लेकर शिक्षण की प्रणाली एवं शोध केन्द्रित विद्या का विकास इस विश्वविद्यालय की विशेषताएं हैं। परन्तु क्या भारत के करदाता द्वारा दी गई राशि का एक महत्वपूर्ण अंश ऐसे विश्वविद्यालयों में देशद्रोही युवाओं के निर्माण के लिए प्रयोग होना चाहिए?

वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग बौद्धिक वर्ग के लिए सबसे अधिक प्रयोग होता है और होना भी चाहिए। परन्तु प्रश्न यह है कि बौद्धिक वर्ग का दायित्व केवल विषय को उठाना, बहस करना और अपने विचार को स्थापित करने तक ही सीमित होना चाहिए? समाज तो बौद्धिक वर्ग से कुछ और ही अपेक्षा करता है। समाज बौद्धिक वर्ग से समस्याओं के समाधान मांगता है। समाज की अपेक्षा वैचारिक वितण्डा के वातावरण में रहने की नही है। वर्षों तक जेएनयू में नक्सलवाद पर शोध हुआ और वहां से नक्सलवादी और माओवादी समर्थक भी बहुत बड़ी संख्या में आज जनजाति क्षेत्र में कार्यरत हैं। परन्तु समाज में व्याप्त विषमता की मात्रा को कम करने के व्यावहारिक उपाय अन्य विश्वविद्यालयों से तो आए हो सकते हैं परन्तु ऐसे कोई सुझाव या समाधान जेएनयू या जादवपुर विश्वविद्यालय से अब तक नहीं आए हैं। जेएनयू से अधिकतम विद्यार्थी नौकरशाही में जाते हैं। क्या उनमें से किसी ने कष्मीर समस्या या किसी अन्य विकट समस्या का समाधान निकालकर दिया है। ऐसा लगता है कि जेएनयू और ऐसे ही कई अन्य विश्वविद्यालयों में बौद्धिक विमर्श के संस्कारों का आधार हर प्रकार की व्यवस्था के विरोध पर आधारित है। केवल नकारात्मक दृष्टि रखना और उसी पर आधारित अभिव्यक्ति में निपुण होना यह उस विश्वविद्यालय के एक वर्ग के विद्यार्थियों की विषेषता हो जाती है। जिस प्रकार की वैचारिक स्वतंत्रता विष्वविद्यालय के अध्यापक और विद्यार्थी स्वयं व्यवहार में लाते हैं उसी स्वतंत्रता का विरोध वे करते हैं जब किसी अन्य वैचारिक अधिष्ठान की बारी आती है। यह तो साम्यवाद की परिभाषा नहीं है और न ही समाजवादी का व्यवहार है। अपने से अन्य विचार को न केवल झेलने का दम होना चाहिए परन्तु उसका सम्मान भी करेंगे तो ही वैचारिक परिपक्वता का मार्ग खुलता है।

विश्वविद्यालयों के प्रांगणों का प्रयोग समस्याएं उत्पन्न करने और उनको अधिक उलझाने के लिए तो नहीं होना चाहिए। वास्तव में तो विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों एवं अध्यापकों को समाधानों का स्रोत होना चाहिए। विश्वविद्यालय ऐसे मंच होने चाहिए जहां संवाद में सहयोग एवं सम्मान का भाव हो तथा विमर्श के माध्यम से समाधान तक पहुंचने का इमानदार संकल्प हो। देश के कृषि विश्वविद्यालयों ने खाद्यान्नों की कमी को पूर्ण करने के समाधान दिए हैं और दे रहे हैं। प्रौद्योगिकी के संस्थान तकनीक के माध्यम से विशेष समस्याओं के समाधान निकालते हैं और आम आदमी के जीवन को सरल एवं सुलभ बनाते हैं। सुपर कम्प्यूटर हो या क्रायोजनिक रॉकेट का इंजन हमारे प्रौद्योगिकी के संस्थानों ने असंभव को संभव कर दिखाया है। जेएनयू जैसे अन्य शिक्षा और विद्या के मंदिर ऐसे समाधानमूलक बनें और मानवीय समाज में विषमताओं के उत्सव न मनायें। इसके विपरीत जेएनयू के समाज विज्ञान व विज्ञान के विभिन्न स्कूल समानता एवं समरसता के लिए प्रामाणिक समाधान दें तो अपने नाम को सार्थक करेंगे।

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